गरीब खाताधारकों की जमा पूंजी हड़पी, अब करोड़ों की संपत्तियों की जांच कब? सहकारी बैंक घोटाले में कलेक्टर के निर्देशों से बढ़ी हलचल

80.56 करोड़ के गबन प्रकरण में मुख्य आरोपी जमानत पर बाहर, कलेक्टर अर्पित वर्मा ने वसूली और कानूनी कार्रवाई के दिए निर्देश; अब बैंक के अधिकारियों-कर्मचारियों की संपत्ति की निष्पक्ष जांच और खाताधारकों की रकम वापसी भी बने प्राथमिकता
शिवपुरी। जिस बैंक में आम आदमी अपनी मेहनत की कमाई यह सोचकर जमा करता है कि जरूरत पड़ने पर यही पैसा उसके परिवार का सहारा बनेगा, उसी बैंक में यदि जिम्मेदार कर्मचारी और अधिकारी खाताधारकों की रकम के गबन के आरोपों में घिर जाएं, तो आम आदमी आखिर भरोसा करे तो किस पर? शिवपुरी जिला सहकारी केंद्रीय बैंक से जुड़े करोड़ों रुपये के गबन प्रकरण ने इसी भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की जमा पूंजी का सवाल अब केवल बैंकिंग अनियमितता तक सीमित नहीं, बल्कि जनता की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन गया है।

कोलारस शाखा के चर्चित मामले में 80.56 करोड़ रुपये के गबन और मुख्य आरोपी राकेश पाराशर को जमानत मिलने के बाद प्रशासन की सक्रियता बढ़ी है। कलेक्टर अर्पित वर्मा ने समीक्षा बैठक लेकर अधिकारियों को वैधानिक कार्रवाई तेज करने और गबन की रकम की वसूली के लिए निर्देश दिए हैं। आरोपी की जमानत निरस्त कराने की कानूनी संभावनाओं पर काम करने तथा प्रकरण से जुड़े दस्तावेज अभियोजन अधिकारी को उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया है।

लेकिन इस मामले में जनता की अपेक्षा केवल कानूनी कार्रवाई तक सीमित नहीं है। खाताधारकों का सबसे बड़ा सवाल उनकी फंसी हुई रकम है। जिन परिवारों ने अपनी छोटी-बड़ी बचत बैंक में जमा की, उन्हें अपनी ही पूंजी के लिए परेशान होना पड़े, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है। कार्रवाई की सफलता का पैमाना केवल बैठकें और निर्देश नहीं, बल्कि वसूली की प्रगति, दोषियों पर ठोस कार्रवाई और प्रभावित खाताधारकों को राहत मिलना होना चाहिए।
वेतन मामूली, संपत्तियां करोड़ों की? जांच हुई तो सामने आ सकती है पूरी तस्वीर
इस पूरे प्रकरण के बीच सहकारी बैंक की सभी शाखाओं में पदस्थ शाखा प्रबंधकों और कर्मचारियों की संपत्तियों की निष्पक्ष जांच की मांग भी प्रासंगिक हो जाती है। खासतौर पर उन अधिकारियों-कर्मचारियों की आय, संपत्ति और वित्तीय लेन-देन की जांच होनी चाहिए, जिनकी भूमिका संदिग्ध पाई गई हो या जिनके विरुद्ध अनियमितताओं से संबंधित ठोस शिकायतें हों। सेवानिवृत्त हो चुके कर्मचारियों को भी जांच के दायरे में लाने पर विचार किया जाना चाहिए, यदि उनके कार्यकाल से जुड़े मामलों में अनियमितता के साक्ष्य मिलते हैं।
आम खाताधारकों के बीच बैंक कर्मचारियों की कथित बेहिसाब संपत्तियों को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। हालांकि, किसी कर्मचारी की संपत्ति को अवैध घोषित करने से पहले उसकी आय, वैध स्रोतों और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच जरूरी है। इसलिए कलेक्टर को चाहिए कि वे सक्षम जांच एजेंसियों के माध्यम से शिकायतों और संदिग्ध संपत्तियों की तथ्यात्मक जांच कराने की पहल करें। यदि किसी ने अपने ज्ञात वैध स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित की है, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसी जांच केवल एक शाखा तक सीमित न रहकर जरूरत के अनुसार पूरे जिले की सहकारी बैंक शाखाओं तक पहुंचे, ताकि किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति को केवल पद या सेवानिवृत्ति का लाभ लेकर बच निकलने का अवसर न मिले।
जनता का पैसा वापस दिलाना ही प्रशासन की असली परीक्षा
कलेक्टर की पहल से अब उम्मीद जगी है कि गबन प्रकरण में कानूनी कार्रवाई और वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि प्रभावित खाताधारकों की पहचान, उनकी फंसी हुई रकम और भुगतान की वर्तमान स्थिति स्पष्ट की जाए। बैंक प्रबंधन वसूली के लिए समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करे और खाताधारकों को वास्तविक प्रगति की जानकारी दे।
बैंक जनता की जमा पूंजी की सुरक्षा के लिए होते हैं, न कि ऐसी स्थिति पैदा करने के लिए जिसमें अपनी ही रकम पाने के लिए लोगों को दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें। दोषियों की जवाबदेही तय करना, संदिग्ध संपत्तियों की जांच कराना और खाताधारकों को उनकी रकम वापस दिलाने के लिए प्रभावी प्रयास करना—इन तीनों मोर्चों पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि कलेक्टर के निर्देश जमीन पर कितनी तेजी से उतरते हैं। यदि वसूली के साथ संपत्तियों की निष्पक्ष जांच भी आगे बढ़ती है, तो इससे न केवल इस घोटाले की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकती है, बल्कि सहकारी बैंक व्यवस्था में जनता का डगमगाता भरोसा बहाल करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठ सकता है।
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