लोअर उर परियोजना बना लूट का कोरीडोर!””शाशकीय जमीनो का मुआब्ज़ा,ज्यादा रकबे का खेल और 7500 करोड़ का “”मटेरियल घोटाला””- राजश्व-जल् संसाधन की मिलीभगत जांच के अभाव मे भर रही सिसकारियां

“कागजो मे खेत,हकीकत मे घोटाला!” लोअर उर परियोजना मे जमीन से ज्यादा मुआब्ज़ा,सरकारी जमीन भी बिकी -7500 करोड़ पर बड़ा सबाल ?
नहर लाइन से बाहर एबं शाशकीय भूमि का भी बाँट दिया मुआब्ज़ा आज भी मुआब्ज़ा बितरण भारी संदेह के घेरे से?
(सांजीव पुरोहित)
शिवपुरी /जिले की बहुचर्चित लोअर ओर परियोजना एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सूत्रों के हवाले से सामने आ रही जानकारी ने जल संसाधन और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप हैं कि भू-अर्जन प्रक्रिया में बड़े स्तर पर अनियमितताएं की गईं—जहां शासकीय जमीन का मुआवजा बांट दिया गया, वास्तविक रकबे से ज्यादा भुगतान किया गया और नहर लाइन से बाहर की जमीनों को भी अवार्ड में शामिल कर करोड़ों रुपये निकाले गए।
शासकीय जमीन पर निजी भुगतान का आरोप
ग्राम चमरौआ का मामला सबसे चौंकाने वाला बताया जा रहा है। यहां सर्वे नंबर 2891/1/1, जो कि वर्तमान में भी शासकीय चरनोई भूमि बताई जा रही है, उसका अवार्ड पारित कर सीमा पत्नी कमल सिंह के नाम भुगतान कर दिया गया। खास बात यह है कि तहसीलदार खनियाधाना की जांच रिपोर्ट में भी इस भूमि को शासकीय बताया गया है। सवाल उठता है—जब जमीन सरकारी थी, तो भुगतान किस आधार पर और किसके आदेश से हुआ?
रकबे से ज्यादा मुआवजा—कैसे संभव?
ग्राम कुम्हर्रा में सर्वे नंबर 554 और 555 का मामला भी कम गंभीर नहीं है। दोनों ही मामलों में कुल रकबा 0.12 हेक्टेयर के आसपास था, लेकिन अवार्ड 0.15 हेक्टेयर का पारित कर दिया गया। यह अंतर महज तकनीकी गलती है या सुनियोजित खेल—यह जांच का विषय है। राजपत्र में इसका प्रकाशन भी दर्ज है, जिससे मामला और गंभीर हो जाता है।
नहर लाइन से बाहर की जमीनों को भी किया शामिल
ग्राम नदनवारा के सर्वे नंबर 851, 421, 353, 855 और 355—जो कथित रूप से नहर लाइन के दायरे में ही नहीं आते—उन्हें भी अवार्ड में शामिल कर भुगतान कर दिया गया। यह सीधे-सीधे नियमों का उल्लंघन माना जा रहा है।
छोटे रकबे पर बड़े भुगतान
ग्राम खैरोदा में सर्वे नंबर 244 का कुल रकबा मात्र 0.08 हेक्टेयर बताया गया, लेकिन अवार्ड 0.59 हेक्टेयर का पारित कर दिया गया। यानी सात गुना से भी ज्यादा! यह गणना की गलती है या फिर मिलीभगत—यह सवाल अब प्रशासन के सामने है।
अवार्ड एक के नाम, भुगतान दूसरे को
ग्राम सेकरा में दो कुओं का अवार्ड रामदास के नाम पारित हुआ, लेकिन भुगतान में गड़बड़ी सामने आई—एक का पैसा जसुआ को दे दिया गया। यह सीधे-सीधे वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करता है।
मटेरियल के नाम पर हजारों करोड़ का खेल?
सबसे बड़ा और चौंकाने वाला आरोप परियोजना में मटेरियल सप्लाई को लेकर है। सूत्रों के अनुसार, लगभग 7.59 अरब रुपये (759 करोड़ से अधिक) का भुगतान संबंधित फर्म मंटेना मैक्स एम.पी.जे. जेवी को किया गया। आरोप यह भी है कि कंपनी ने मटेरियल सप्लाई करने के बजाय उसे बेच दिया। यदि यह सच है, तो यह सिर्फ अनियमितता नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर वित्तीय घोटाले की ओर संकेत करता है।
सुलगते दहकते सवाल जो चीख चीखकर जवाब मांगते हैं !
शासकीय जमीन पर निजी व्यक्तियों को मुआवजा किसने और क्यों दिया?
वास्तविक रकबे से ज्यादा भुगतान कैसे स्वीकृत हुआ?
नहर लाइन से बाहर की जमीनों को अवार्ड में शामिल करने की अनुमति किसने दी?
क्या यह सब महज लापरवाही है या सुनियोजित भ्रष्टाचार?
निष्कर्ष
ये सभी आरोप फिलहाल सूत्रों पर आधारित हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। लेकिन अगर इनमें जरा भी सच्चाई है, तो यह मामला करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों रुपये के घोटाले का रूप ले सकता है। अब निगाहें प्रशासन और जांच एजेंसियों पर टिकी हैं—क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी, या फिर यह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
(नोट: उपरोक्त सभी तथ्य आरोपों और सूत्रों पर आधारित हैं। आधिकारिक पुष्टि के बाद ही अंतिम सत्य सामने आएगा।)
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