शिवपुरी में गौमाता की जमीन पर कब्जों का जाल! कलेक्टर चलाएं जिलेभर में मुहिम, गौचर भूमि को मिले अतिक्रमण से मुक्ति

सड़को पर भटकता गौवंश, गांवों में चरागाह भूमि पर कब्जों की शिकायतें; पंचायतवार सर्वे और निष्पक्ष कार्रवाई से कलेक्टर जिले में स्थापित कर सकते हैं नई मिसाल
शिवपुरी। शिवपुरी जिले में गौमाता के संरक्षण की बात हो और गांवों की उस जमीन की अनदेखी हो जाए, जो पशुओं की चराई के लिए दर्ज है, तो तस्वीर अधूरी ही रहेगी। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में गौचर भूमि पर कब्जे, खेती, बाड़बंदी और पक्के निर्माण की शिकायतें सामने आती रही हैं। कुछ स्थानों पर ऐसी जमीन दूसरे लोगों को बेचने या हस्तांतरित करने की बातें भी सुनने में आती हैं। इन मामलों की राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर जांच हो, तो साफ हो सकेगा कि गांवों की कितनी चरागाह भूमि सुरक्षित है और कितनी अपने मूल उपयोग से बाहर हो चुकी है।

गांवों में चराई की जमीन कम होने का असर पशुपालकों पर पड़ता है। वहीं, सड़कों और राजमार्गों पर भटकते गौवंश तथा वाहनों की चपेट में आकर होने वाली मौतों की घटनाएं चिंता बढ़ाती हैं। हर दुर्घटना का कारण चरागाह भूमि पर कब्जा नहीं है, लेकिन गांवों में उपलब्ध चराई भूमि सुरक्षित रहे तो गौवंश के बेहतर प्रबंधन में निश्चित रूप से मदद मिल सकती है।
हिंदू धर्म और भारतीय परंपरा में गौमाता को पूजनीय स्थान प्राप्त है। गाय को माता मानकर उसकी सेवा करना हमारी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। ग्रामीण जीवन में गाय का महत्व दूध, कृषि और आजीविका से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में गौचर भूमि की रक्षा केवल राजस्व विभाग का काम नहीं, बल्कि गौसेवा की भावना को जमीन पर उतारने का भी विषय है। गौमाता के लिए श्रद्धा तभी व्यापक अर्थ प्राप्त करती है, जब उसके संरक्षण के लिए उपलब्ध संसाधनों को भी सुरक्षित रखा जाए।

ग्रामीण क्षेत्रों में यह शिकायत भी सुनने को मिलती है कि कुछ स्थानों पर प्रभावशाली लोगों ने चरागाह भूमि पर कब्जे कर रखे हैं। कहीं खेतों से लगी जमीन पर खेती किए जाने की बात है, तो कहीं पक्के निर्माण की। इन शिकायतों की सच्चाई खसरा, नक्शा, सीमांकन और राजस्व अभिलेखों की जांच से सामने आनी चाहिए। यदि किसी भी व्यक्ति का कब्जा अवैध पाया जाता है, तो उसकी राजनीतिक पहुंच या सामाजिक प्रभाव कार्रवाई में बाधा नहीं बनना चाहिए। सार्वजनिक भूमि के संरक्षण में कानून का एक ही पैमाना होना जरूरी है।
कलेक्टर की पहल से गांव-गांव सामने आएगा गौचर भूमि का हिसाब
शिवपुरी कलेक्टर जिले की सभी ग्राम पंचायतों में गौचर भूमि का सत्यापन कराने के लिए विशेष अभियान शुरू करें, तो यह जनहित में महत्वपूर्ण पहल होगी। प्रत्येक गांव में चराई के लिए दर्ज जमीन का कुल रकबा, खसरा नंबर, मौके पर उपलब्ध भूमि और अतिक्रमण की शिकायतों का पंचायतवार रिकॉर्ड तैयार कराया जाए। पटवारी और राजस्व निरीक्षक अभिलेखों का मिलान करें तथा संदिग्ध मामलों में तहसीलदार के माध्यम से सीमांकन कराया जाए।
ग्राम पंचायत सचिव और सरपंच से भी उनके क्षेत्र की गौचर भूमि का विवरण लिया जाए। जहां अतिक्रमण प्रमाणित हो, वहां नियमानुसार नोटिस, सुनवाई और वैधानिक प्रक्रिया पूरी कर कब्जा हटाने की कार्रवाई की जाए। आवश्यकता के अनुसार पुलिस प्रशासन राजस्व अमले को सहयोग दे। जिन मामलों में गौचर भूमि के विक्रय या हस्तांतरण की शिकायतें हैं, उनके दस्तावेजों की भी जांच हो और अनियमितता प्रमाणित होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 237 विशेष प्रयोजनों के लिए भूमि आरक्षित करने से संबंधित है। धारा 248 के तहत लागू परिस्थितियों में सरकारी भूमि तथा निर्धारित भूमि पर अनधिकृत कब्जे के विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है। मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 की धारा 56 भी सार्वजनिक स्थलों और चराई की भूमि से जुड़े अतिक्रमण के मामलों में प्रासंगिक है। संबंधित भूमि की राजस्व स्थिति और लागू कानूनी प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई होना आवश्यक है।
इस अभियान में पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है। पंचायतवार गौचर भूमि का रकबा, सत्यापित अतिक्रमण, जारी नोटिस, हटाए गए कब्जे और लंबित मामलों की जानकारी सार्वजनिक की जाए। कब्जा हटने के बाद सीमांकन के निशान सुरक्षित रखे जाएं और नियमित निरीक्षण हो, ताकि मुक्त कराई गई जमीन दोबारा अतिक्रमण की चपेट में न आए।
भाजपा सरकार गौ-संरक्षण के प्रयास कर रही है, अब गांवों की गौचर भूमि बचाने में सबकी भागीदारी जरूरी
मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार गौवंश के संरक्षण और गौशालाओं की व्यवस्था को लेकर विभिन्न प्रयास कर रही है। ऐसे में इन प्रयासों को गांवों की वास्तविक जरूरतों से जोड़ना भी जरूरी है। गौशालाओं की व्यवस्था के साथ चरागाह भूमि का संरक्षण हो, तो पशुपालन और गौवंश के प्रबंधन को अतिरिक्त सहारा मिल सकता है। हालांकि, इसके लिए भूमि का उपयोग उसके राजस्व रिकॉर्ड, निर्धारित उद्देश्य और लागू नियमों के अनुरूप ही सुनिश्चित करना होगा।
इस मुहिम को केवल प्रशासन की जिम्मेदारी मानकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों के विधायकों, जनप्रतिनिधियों और जमीनी कार्यकर्ताओं को भी गौचर भूमि की पहचान, अतिक्रमण की प्रमाणिक जानकारी जुटाने और प्रशासन को सहयोग देने में आगे आना चाहिए। गांवों में राजनीतिक पकड़ रखने वाले लोग यदि सार्वजनिक भूमि को बचाने के लिए साथ खड़े होते हैं, तो अभियान को सामाजिक समर्थन मिलेगा। जहां किसी भी दल से जुड़े व्यक्ति का अवैध कब्जा प्रमाणित हो, वहां भी निष्पक्ष कार्रवाई का समर्थन किया जाना चाहिए।
गौमाता के संरक्षण को लेकर राजनीतिक मंचों से व्यक्त की जाने वाली प्रतिबद्धता का एक व्यावहारिक रूप यह भी हो सकता है कि गांवों की चरागाह भूमि सुरक्षित रहे। गौसेवा किसी एक दल, संगठन या व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह धार्मिक आस्था, सामाजिक जिम्मेदारी और सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण से जुड़ा विषय है। इसलिए इस काम में दलगत मतभेदों से ऊपर उठकर सहयोग की आवश्यकता है।
गौमाता सड़कों पर भटकने को मजबूर न हो, चरागाह भूमि अपने काम आए
शिवपुरी कलेक्टर यदि पंचायतवार सर्वे, सीमांकन और अतिक्रमण के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई का अभियान शुरू करते हैं, तो इसका असर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है। पशुपालकों को चराई के लिए उपलब्ध भूमि का लाभ मिलेगा, गौशालाओं की व्यवस्थाओं को सहयोग मिल सकता है और सार्वजनिक भूमि को सुरक्षित रखने की दिशा में ठोस काम होगा।
गौमाता की सेवा केवल पूजा-पाठ, धार्मिक आयोजनों और गौशालाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसके लिए निर्धारित जमीन की रक्षा करना भी गौसेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। **शिवपुरी जिले की गौचर भूमि का वास्तविक हिसाब सामने आए, अवैध कब्जे नियमानुसार हटें और गांवों की यह साझा संपत्ति आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहे—कलेक्टर की एक सुनियोजित पहल इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम बन सकती है।
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