181 पर अफसरों की क्लास, RTI पर कलेक्ट्रेट में ही दो महीने से अपील कैद!

शिवपुरी मेल की पड़ताल में खुली सूचना के अधिकार की जमीनी हकीकत
शिवपुरी ब्यूरो। जिले में 181 की शिकायतें समय-सीमा पार करती हैं तो अधिकारियों की समीक्षा होती है, जवाब-तलब किया जाता है। लेकिन सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी महीनों तक नहीं मिलती, अपीलें लंबित रहती हैं और आदेशों के बाद भी सूचना देने में आनाकानी होती है, तो जवाबदेही का यह पैमाना कहां गायब हो जाता है? शिवपुरी में RTI की जमीनी हकीकत जानने के लिए शिवपुरी मेल ने जब शिक्षा विभाग, जिला पंचायत, कलेक्ट्रेट और दूसरे सरकारी कार्यालयों में महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारी मांगी, तो तस्वीर चौंकाने वाली सामने आई। कई मामलों में महीनों बीत जाने के बाद भी जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी। कुछ प्रकरणों में अधिकारियों ने पत्र जारी किए, निर्देश दिए, लेकिन इसके बाद भी तहसील स्तर के अधिकारी वरिष्ठ कार्यालयों के आदेशों की अनदेखी करते हुए जानकारी देने से परहेज करते रहे। यानी कागजों पर आदेश जारी होते रहे और सूचना मांगने वाले का इंतजार खत्म नहीं हुआ।
सबसे गंभीर स्थिति तब सामने आई, जब कलेक्ट्रेट कार्यालय से संबंधित एक RTI प्रकरण में प्रथम अपील दायर की गई। अपील के बाद मामला कलेक्ट्रेट की प्रशासनिक शाखा में पहुंचा, लेकिन करीब दो महीने तक उसके लंबित रहने की स्थिति सामने आई। यह कोई छोटी बात नहीं है। जिस जिला कार्यालय से पूरे प्रशासन की निगरानी और विभागों की जवाबदेही सुनिश्चित होने की अपेक्षा की जाती है, वहीं अपील के निस्तारण में इतनी देरी का मामला सामने आए तो दूसरे विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। शिवपुरी मेल की ओर से अलग-अलग विभागों में मांगी गई सूचनाओं और सामने आए इन अनुभवों ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है—जब सूचना के अधिकार की हकीकत जानने के लिए जानकारी मांगी जाए और वही जानकारी समय पर न मिले, तो पारदर्शिता का दावा जमीन पर कितना मजबूत है?
RTI अधिनियम, 2005 की धारा 7(1) के तहत सामान्य मामलों में लोक सूचना अधिकारी को 30 दिनों के भीतर सूचना देनी होती है। सूचना नहीं मिलने या असंतोषजनक जवाब मिलने पर धारा 19(1) के तहत प्रथम अपील की जा सकती है। धारा 19(6) के अनुसार प्रथम अपील का निस्तारण सामान्यतः 30 दिनों में और लिखित कारण दर्ज कर अधिकतम 45 दिनों में किया जाना चाहिए। वहीं, धारा 20 में निर्धारित परिस्थितियों में सूचना आयोग द्वारा संबंधित लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माने और अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश का प्रावधान है। कानून में समय-सीमा और जवाबदेही दोनों मौजूद हैं, फिर भी यदि आवेदन और अपीलें महीनों तक लंबित रहती हैं, तो सवाल केवल देरी का नहीं, कानून के पालन की निगरानी का भी है।
यहां एक और सवाल प्रशासन से जवाब मांगता है। कलेक्ट्रेट सहित अलग-अलग विभागों में RTI के कितने आवेदन लंबित हैं? कितने मामलों में 30 दिन की अवधि निकल चुकी है? कितनी प्रथम अपीलें 45 दिन पार कर चुकी हैं? वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश जारी होने के बावजूद किन कार्यालयों में जानकारी नहीं दी गई और इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इन सवालों के जवाब विभागवार रिकॉर्ड और नियमित समीक्षा से ही सामने आ सकते हैं। इसके बावजूद यदि RTI की लंबित फाइलों की नियमित समीक्षा नहीं होती, तो नागरिक के अधिकार को समय पर लागू कराने की जिम्मेदारी आखिर कौन निभा रहा है?
कलेक्टर अर्पित वर्मा के सामने अब असली चुनौती केवल लंबित फाइलें गिनने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की है कि सूचना देने की कानूनी समय-सीमा का पालन क्यों नहीं हो रहा। कलेक्ट्रेट से लेकर तहसील और जिला स्तर के सभी विभागों से लंबित आवेदनों, प्रथम अपीलों, जारी निर्देशों और उनके अनुपालन की रिपोर्ट तलब की जानी चाहिए। कलेक्ट्रेट की प्रशासनिक शाखा में करीब दो महीने तक लंबित बताई जा रही प्रथम अपील की तारीखवार स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए। जहां देरी या आदेशों की अवहेलना की पुष्टि हो, वहां कानून के मुताबिक जिम्मेदारी तय की जाए।
आखिर 181 की शिकायत पर समय-सीमा का हिसाब रखा जा सकता है, तो RTI की फाइलों का क्यों नहीं? सूचना मांगने वाला नागरिक किसी अधिकारी की कृपा नहीं, कानून से मिला अपना अधिकार मांग रहा है। जब वही अधिकार पाने के लिए उसे महीनों इंतजार करना पड़े, तो यह व्यवस्था की समीक्षा का विषय है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि RTI की जानकारी क्यों नहीं मिल रही; सवाल यह है कि जानकारी न देने वालों से जवाब कौन मांगेगा और कलेक्ट्रेट से शुरू हुई इस पड़ताल की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
Live Cricket Info







