सरकारी स्कूलों पर कलेक्टर की सीधी नजर: अब रजिस्टर नहीं, बच्चों की आंखों में तलाशा जाएगा पढ़ाई का सच

अफसर स्कूलों में उतरे तो शुरू हुई जमीनी पड़ताल; सवाल बड़ा है—जब सरकारी स्कूलों पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं तो गांव का बच्चा बेहतर शिक्षा के लिए प्राइवेट स्कूल क्यों जाए?
शिवपुरी। सरकारी स्कूलों में अब केवल शिक्षक की हाजिरी नहीं, पढ़ाई की गुणवत्ता भी सवालों के घेरे में होगी। कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट अर्पित वर्मा ने जिले की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर जिस तरह सख्ती दिखाई है, उससे स्कूलों में लंबे समय से चली आ रही केवल कागजी निगरानी की व्यवस्था को जमीन पर परखने की कोशिश शुरू हुई है। कलेक्टर के निर्देश के बाद संयुक्त कलेक्टर अनुराग निंगवाल सहित जिला स्तरीय अधिकारी अचानक सरकारी स्कूलों में पहुंचे और उपस्थिति पंजी से लेकर कक्षाओं तक की पड़ताल की। अधिकारियों ने बच्चों से सीधे संवाद किया, यह समझने का प्रयास किया कि कक्षा में वास्तव में क्या पढ़ाया जा रहा है और विद्यार्थी कितना समझ पा रहे हैं। मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता, परिसर की स्वच्छता, शौचालयों की स्थिति और स्कूल भवन की व्यवस्थाएं भी जांची गईं। बिना उचित कारण और अनुमति के अनुपस्थित मिलने वाले शिक्षकों पर कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है, लेकिन अब सवाल इससे आगे का है—जो शिक्षक स्कूल में मौजूद है, क्या उसके पढ़ाए बच्चों का परिणाम भी उतना ही मजबूत है? क्योंकि उपस्थिति रजिस्टर में एक हस्ताक्षर शिक्षक की मौजूदगी तो साबित कर सकता है, लेकिन बच्चे की कॉपी, उसका सीखने का स्तर और परीक्षा परिणाम ही बताएगा कि शिक्षा वास्तव में कितनी हुई।

सरकारी स्कूलों में प्रशिक्षित एवं योग्य शिक्षक सेवाएं दे रहे हैं और शासन उनके वेतन, प्रशिक्षण, भवन, सुविधाओं तथा विभिन्न शैक्षणिक योजनाओं पर लगातार संसाधन खर्च करता है। ऐसे में सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही होनी चाहिए कि सरकारी स्कूलों का शैक्षणिक स्तर और परीक्षा परिणाम निजी स्कूलों से किसी भी मायने में कम क्यों रहें? गांव का गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार बेहतर शिक्षा के लिए फीस, वाहन और अन्य खर्च का बोझ उठाकर निजी स्कूल की ओर क्यों जाए? अगर सरकारी स्कूल में शिक्षक नियमित हों, पढ़ाई गुणवत्तापूर्ण हो, बच्चों का सीखने का स्तर मजबूत हो और परीक्षा परिणाम शानदार हों तो अभिभावक सरकारी स्कूल को मजबूरी नहीं बल्कि अपनी पहली पसंद बना सकते हैं।

यहां एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है—यदि सरकारी स्कूलों की व्यवस्था वास्तव में इतनी बेहतर बना दी जाए कि पढ़ाई और परिणाम पर पूरा भरोसा पैदा हो जाए, तो क्या सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षक तथा अन्य शासकीय अधिकारी-कर्मचारी भी अपने बच्चों की शिक्षा के लिए इन स्कूलों को भरोसेमंद विकल्प के रूप में नहीं देखेंगे? यह किसी व्यक्ति या कर्मचारी पर आरोप नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता को परखने का एक सकारात्मक पैमाना हो सकता है। जब सरकारी तंत्र से जुड़े परिवार भी सरकारी स्कूलों की शिक्षा पर भरोसा करेंगे तो ग्रामीण अभिभावकों का मनोबल बढ़ेगा और समाज में यह संदेश जाएगा कि सरकारी स्कूल केवल गरीब परिवारों के बच्चों के लिए विकल्प नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मजबूत केंद्र हैं।
कलेक्टर की पहल का वास्तविक असर तभी दिखाई देगा जब औचक निरीक्षण की यह कार्रवाई आगे भी लगातार जारी रहे और स्कूलों के प्रदर्शन को केवल निरीक्षण रिपोर्ट नहीं, बल्कि बच्चों के सीखने के स्तर, परीक्षा परिणाम, शिक्षक उपस्थिति और जवाबदेही से जोड़ा जाए। बेहतर परिणाम देने वाले स्कूलों और शिक्षकों को प्रोत्साहन मिले तथा कमजोर प्रदर्शन वाले विद्यालयों को सुधार के लिए आवश्यक शैक्षणिक सहयोग दिया जाए। निजी स्कूलों की संख्या कम करना लक्ष्य नहीं होना चाहिए; लक्ष्य यह होना चाहिए कि सरकारी स्कूल इतने मजबूत बनें कि अभिभावक बेहतर शिक्षा के लिए निजी स्कूल की ओर जाने को मजबूर न हों। क्योंकि एक दिन का औचक निरीक्षण सुर्खियां जरूर बना सकता है, लेकिन लगातार सुधरता परीक्षा परिणाम ही बताएगा कि सरकारी स्कूलों में सचमुच बदलाव आया है या नहीं।
कलेक्टर अर्पित वर्मा की सख्ती ने शुरुआत कर दी है, अब निगाह इस बात पर रहेगी कि यह सख्ती स्कूल के गेट से आगे बढ़कर कक्षा, बच्चे की कॉपी और परीक्षा परिणाम तक कब पहुंचती है। अगर यह अभियान निरंतरता के साथ चला तो शिवपुरी में सरकारी शिक्षा व्यवस्था के लिए यह एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। जिस दिन गांव का अभिभावक यह कहने लगे कि “मेरे बच्चे को अच्छी शिक्षा के लिए प्राइवेट स्कूल भेजने की जरूरत नहीं, हमारे सरकारी स्कूल में ही बेहतर भविष्य तैयार हो रहा है”, उसी दिन माना जाएगा कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था ने असली बाजी जीत ली।
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