शिवपुरी में BRCC-APC चयन पर घमासान: पात्रता के नाम पर किसकी राह रोक रहे जिम्मेदार? झाबुआ के आदेश ने खोली नियमों की बहस, गृह ब्लॉक की तैनाती पर भी पेच!
पात्रता सूची पर आपत्तियां, झाबुआ के आदेश से उठे सवाल; BAC-CAC और BRCC-APC के नियमों में एकरूपता की मांग, चयन से पहले सभी शर्तें सार्वजनिक करने की उठी आवाज।

शिवपुरी ब्यूरो। शिक्षा विभाग में BRCC और APC के पदों पर चयन की प्रक्रिया शिवपुरी में सवालों के घेरे में है। चयन की परीक्षा अभी बाकी है, लेकिन पात्रता को लेकर उठी आपत्तियों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अभ्यर्थियों का आरोप है कि उच्च2 योग्यता और सेवा संबंधी नियमों की अलग-अलग व्याख्या हो रही है, तो कहीं उच्च पद का प्रभार संभालने वाले शिक्षकों की पात्रता पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—जब चयन शासन के नियमों से होना है, तो पात्रता तय करने में एकरूपता क्यों नहीं दिखाई दे रही?
मामले में असली पेच पात्रता सूची को लेकर है। कुछ अभ्यर्थियों का कहना है कि निर्धारित अर्हताएं पूरी करने के बावजूद उन्हें अपात्र घोषित किया गया। उनकी आपत्ति है कि विभाग ने यदि किसी शिक्षक को नियमानुसार उच्च पद का प्रभार दिया है, तो चयन के समय उसके प्रभार आदेश और उसमें दर्ज शर्तों पर विचार होना चाहिए। यह सही है कि उच्च पद का प्रभार अपने आप BRCC-APC की पात्रता सुनिश्चित नहीं करता, लेकिन किसी को अपात्र ठहराने के लिए भी संबंधित शासनादेश, निर्धारित योग्यता और सेवा शर्तों का स्पष्ट आधार होना चाहिए। यदि नियमों के आधार पर फैसला हुआ है, तो विभाग उस नियम और उसके अनुप्रयोग को सामने रखने से पीछे क्यों रहे?
वहीं, इसी मामले में एक और बात जनचर्चा का विषय बनी हुई है। शिवपुरी में गृह विकासखंड से बाहर के ब्लॉक में नियुक्ति को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं की जा रही है, हालांकि, यह जांच और नियमों के तुलनात्मक अध्ययन का विषय है कि दोनों जिलों में जारी निर्देशों की शर्तें क्या हैं और शिवपुरी में इस मामले को लेकर असमंजस क्यों बना हुआ है।
विवाद केवल पात्रता तक सीमित नहीं ह को BAC-CAC जैसे दायित्व सौंपे जाने और BRCC-APC चयन में पात्रता के अलग-अलग आकलन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। अभ्यर्थियों की आपत्ति है कि समान परिस्थितियों वाले शिक्षकों के मामलों में अलग-अलग मापदंड अपनाए गए हैं या नहीं, इसकी जांच होनी चाहिए। यदि दोनों पदों की पात्रता अलग-अलग नियमों से तय होती है, तो विभाग इसे स्पष्ट करे; लेकिन यदि किसी अभ्यर्थी के साथ नियमों की गलत व्याख्या के कारण अन्याय हुआ है, तो उसे सुधारना भी विभाग की जिम्मेदारी है। चयन प्रक्रिया में किसी की पसंद-नापसंद नहीं, दस्तावेज और नियम बोलने चाहिए।
गृह विकासखंड में ही पदस्थापना की तैयारी है या नियमों का पालन होगा? यह सवाल भी चयन प्रक्रिया के साथ उठ रहा है। अभ्यर्थियों के बीच चर्चा है कि दूसरे जिलों में आवेदन के समय ही अन्य विकासखंडों में पदस्थापना की सहमति ली जा रही है, जबकि शिवपुरी में इस संबंध में स्थिति साफ नहीं है। इस दावे की पुष्टि संबंधित आदेश और आवेदन प्रारूप से होना जरूरी है। फिर भी विभाग को यह बताना चाहिए कि गृह विकासखंड में पदस्थापना को लेकर लागू नीति क्या है और हितों के टकराव से बचने के लिए क्या व्यवस्था की गई है। यदि कोई स्पष्ट नियम लागू है, तो उसका पालन सभी पर समान रूप से होना चाहिए; यदि ऐसा कोई निर्देश नहीं है, तो भी चयन समिति को अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए।
अब सवाल जिला शिक्षा केन्द्र और चयन समिति की जवाबदेही का है। पात्रता सूची पर आपत्तियां हैं, तो उनका निराकरण रिकॉर्ड के आधार पर होना चाहिए। किसी अभ्यर्थी को अपात्र घोषित करने का कारण स्पष्ट हो, दस्तावेजों की जांच समान मानकों पर हो और पदस्थापना की नीति चयन से पहले साफ की जाए। यदि प्रक्रिया पारदर्शी है, तो जांच और स्पष्टीकरण से उसका भरोसा बढ़ेगा; और यदि कहीं त्रुटि है, तो समय रहते उसे सुधारने का अवसर भी रहेगा।
BRCC और APC के पद शिक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से जुड़े हैं। इन पदों पर चयन का असर केवल संबंधित शिक्षकों के भविष्य पर नहीं, बल्कि विभागीय कामकाज पर भी पड़ता है। इसलिए शिवपुरी में उठे सवालों को महज अभ्यर्थियों की नाराजगी बताकर खारिज करना उचित नहीं होगा। चयन से पहले पात्रता पर संदेह और पदस्थापना से पहले नीति पर अस्पष्टता—इन दोनों का जवाब विभाग को देना ही होगा।
इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्तमान में चयन प्रक्रिया के लिए आवेदन आमंत्रित किए जा रहे हैं और इसी दौरान नियमों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप सामने आ रहे हैं। यदि अभ्यर्थियों के बीच प्रक्रिया की शर्तों को लेकर असमंजस या नाराजगी है, तो प्रशासन की जिम्मेदारी है कि भर्ती से संबंधित शासन के सभी नियम, पात्रता की शर्तें और पदस्थापना संबंधी निर्देश स्पष्ट रूप से सार्वजनिक करे। इससे प्रत्येक आवेदक को समान जानकारी मिलेगी और चयन प्रक्रिया को लेकर अनावश्यक विवाद की गुंजाइश कम होगी। जब तक नियम सभी अभ्यर्थियों के सामने स्पष्ट नहीं होंगे, तब तक आपत्तियों और संदेहों का निराकरण मुश्किल बना रहेगा।
फिलहाल, इन आरोपों में कितनी सच्चाई है और कहां नियमों की गलत व्याख्या हुई है, इसकी पुष्टि करना संभव नहीं है। लेकिन यदि चयन प्रक्रिया को लेकर इस तरह के सवाल उठ रहे हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। जिला शिक्षा केन्द्र और चयन समिति को चाहिए कि पात्रता, आवेदन की शर्तों और गृह विकासखंड से बाहर पदस्थापना के संबंध में स्थिति स्पष्ट करें, ताकि चयन प्रक्रिया किसी विवाद की छाया में नहीं, बल्कि पारदर्शिता और समान नियमों के आधार पर संपन्न हो सके।
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