426 करोड़ की सड़क… धूल में उड़ते सवाल, बिखरी गिट्टी और गायब सुरक्षा इंतजाम!

पिछोर–दिनारा NH-346 की जमीनी तस्वीर ने खोली निर्माण की परतें; सड़क की मजबूती से लेकर नालियों, प्रदूषण और किसानों के मुआवजे तक जांच की दरकार
ब्पिछोर। पिछोर से दिनारा तक करीब 426 करोड़ रुपए की लागत से बन रही NH-346 पर विकास की तस्वीर तो दिखाई दे रही है, लेकिन उसी तस्वीर के बीच कुछ ऐसे दृश्य भी हैं जिन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल है। सड़क किनारे बिखरी गिट्टी, निर्माण सामग्री के बीच से निकलते वाहन, उड़ती धूल और जगह-जगह सुरक्षा इंतजामों की कमी—ये सब मिलकर सड़क निर्माण की निगरानी पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

सड़क बनना अच्छी बात है, लेकिन सवाल यह है कि करोड़ों की सड़क बनाते समय मानकों और सुरक्षा का कितना ख्याल रखा जा रहा है। निर्माणाधीन हिस्सों में वाहन चालकों को सुरक्षित रास्ता देने के लिए बैरिकेडिंग, चेतावनी संकेत, रिफ्लेक्टर और स्पष्ट डायवर्जन जरूरी हैं। खासकर रात के समय स्थिति और गंभीर हो जाती है। दोपहिया वाहन चालकों के फिसलने की शिकायतें सामने आ रही हैं तो इसे महज छोटी परेशानी मानकर टालना ठीक नहीं होगा।
मगर कहानी सड़क के ऊपर दिखाई दे रही गिट्टी और धूल तक सीमित नहीं है।

CC सड़क की असली मजबूती उसकी चमक से नहीं, उसकी परतों से सामने आएगी।
सड़क की वास्तविक मोटाई कितनी है? कंक्रीट की strength निर्धारित मानक के अनुरूप है या नहीं? DLC और PQC की परत कितनी है? नीचे का base और sub-base कितना मजबूत है? compaction, joints, dowel-tie bars और curing का काम मानक के मुताबिक हुआ है या नहीं?
इन सवालों का जवाब मौके पर core cutting और concrete strength test से मिल सकता है। इसके साथ Measurement Book और BOQ में दर्ज काम का जमीन पर हुए निर्माण से मिलान हो जाए तो तस्वीर और साफ हो जाएगी। कागज में जितनी मात्रा दर्ज है, क्या उतना ही काम सड़क में दिखाई दे रहा है—यह सवाल तकनीकी जांच से ही खत्म होगा।

नालियां अभी बनी हैं, कल टूट गईं तो जिम्मेदारी किसकी?
सड़क के साथ बन रही नालियां भी पड़ताल से बाहर नहीं रहनी चाहिए। कुछ स्थानों पर इनके निर्माण को लेकर मजबूती संबंधी सवाल उठ रहे हैं। नाली का बेस, कंक्रीट, मोटाई और ढाल कमजोर हुई तो बारिश के पानी का दबाव इसे ज्यादा दिन नहीं बचा पाएगा।
आज निर्माण के समय थोड़ी बचत और लापरवाही हुई तो कल टूटती नालियों की मरम्मत पर फिर सरकारी पैसा लगेगा। इसलिए नालियों की गुणवत्ता की भी तकनीकी जांच जरूरी है। सड़क करोड़ों की है तो उसके किनारे बनी नालियां भी सिर्फ दिखावे की संरचना नहीं हो सकतीं।
धूल के गुबार में विकास का मतलब कौन समझाएगा?
निर्माण स्थल से उड़ती धूल राहगीरों और आसपास रहने वाले लोगों के लिए परेशानी बन रही है। पानी का छिड़काव नियमित है या सिर्फ शिकायत के बाद? निर्माण सामग्री ढककर रखी जा रही है या नहीं? सड़क पर जमा मलबा समय पर हटाया जा रहा है या नहीं?
यदि धूल की शिकायत लगातार है तो संबंधित स्थानों पर वायु गुणवत्ता और धूल के स्तर की जांच कराने में भी कोई हर्ज नहीं। सड़क विकास के लिए बन रही है, आम आदमी को धूल फांकने के लिए नहीं।
गिट्टी-मुरम का हिसाब भी साफ होना चाहिए
निर्माण में इस्तेमाल हो रही गिट्टी, मुरम और दूसरी खनिज सामग्री के स्रोत की भी जांच जरूरी है। ई-रवन्ना, रॉयल्टी, खनन अनुमति और परिवहन रिकॉर्ड का मौके पर इस्तेमाल हो रही सामग्री से मिलान कराया जाए। इससे यह साफ होगा कि निर्माण में लग रही सामग्री वैध स्रोत से आ रही है या कहीं नियमों की अनदेखी तो नहीं हो रही।
किसानों की जमीन गई है तो मुआवजे का हिसाब भी सामने आए
सड़क के लिए जमीन देने वाले कुछ किसानों को मुआवजा नहीं मिलने अथवा अपेक्षा से कम राशि मिलने की शिकायतें भी स्थानीय स्तर पर सुनने को मिल रही हैं। इन शिकायतों का सच सरकारी रिकॉर्ड से सामने आ सकता है।
अवार्ड, खसरा, अधिग्रहित रकबा और भुगतान रिकॉर्ड सामने रखे जाएं। किसान की कितनी जमीन गई, कितनी राशि स्वीकृत हुई और वास्तव में कितनी राशि खाते में पहुंची—इसका हिसाब साफ होना चाहिए।
अब सिर्फ काम की रफ्तार नहीं, काम की गुणवत्ता भी देखे प्रशासन
करीब 426 करोड़ रुपए की इस परियोजना को लेकर जिला प्रशासन को मौके की स्थिति का संज्ञान लेकर निर्माण की तकनीकी गुणवत्ता, वर्क-जोन सुरक्षा, नालियों के निर्माण और धूल नियंत्रण की जांच करानी चाहिए। यदि पर्यावरणीय अथवा प्रदूषण संबंधी नियमों की अनदेखी सामने आती है तो प्रदूषण नियंत्रण विभाग को भी अपने स्तर पर जांच करनी चाहिए।
निर्माण पूरा होने का इंतजार करने के बजाय अभी जांच होगी तो कमियां उसी समय पकड़ी जा सकती हैं। सड़क बनने के बाद गड्ढे निकलें, नालियां टूटें और फिर मरम्मत के नाम पर सरकारी पैसा लगे—इससे बेहतर है कि निर्माण के वक्त ही निर्माण की परीक्षा हो।
आखिर यह सड़क किसी निजी जेब से नहीं, सार्वजनिक धन से बन रही है। इसलिए जनता को सिर्फ चमकती सड़क नहीं, मजबूत सड़क, सुरक्षित रास्ता और नियमों के मुताबिक निर्माण मिलना चाहिए।
426 करोड़ की सड़क में असली सवाल यह नहीं कि ऊपर से सड़क कितनी सुंदर दिख रही है। असली सवाल यह है कि उसके नीचे निर्धारित मोटाई और मजबूती है या नहीं, किनारे बनी नालियां कितनी टिकाऊ हैं, निर्माण सामग्री का स्रोत कितना साफ है, वर्क-जोन में आम आदमी कितना सुरक्षित है और धूल के बीच सांस ले रहे लोगों के लिए जिम्मेदार तंत्र ने क्या इंतजाम किए हैं।
अब जरूरत सड़क को दूर से देखने की नहीं, उसकी परत-दर-परत जांच की है। क्योंकि करोड़ों की सड़क अगर मानकों पर खरी उतरती है तो जांच उसका भरोसा बढ़ाएगी, और कहीं कमी है तो निर्माण पूरा होने से पहले ही उसकी कीमत सामने आ जाएगी।
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