इंदौर में D.Ed.-B.Ed. के 51 शिक्षकों के दस्तावेज फर्जी मिलने का खुलासा, शिवपुरी में जांच समितियां बनाकर विभाग ने साधी चुप्पी आखिर क्यों ?

शासन के आदेश, डीईओ के निर्देश और समितियों के गठन के बाद भी जांच के नतीजे गायब! आखिर कब खुलेगी फर्जी अंकसूचियों की पोल, किस स्तर पर अटकी कार्रवाई?
शिवपुरी ब्यूरो। इंदौर में शिक्षक भर्ती के दस्तावेजों की पड़ताल में 51 शिक्षकों के प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने की जानकारी सामने आने के बाद अब शिवपुरी में भी D.Ed.-B.Ed. अंकसूचियों की जांच को लेकर सवाल उठने लगे हैं। यहां शासन के निर्देश पर जांच के लिए पत्र जारी हुए, संकुलों तक आदेश पहुंचे और समितियां भी गठित कर दी गईं, लेकिन जांच कहां तक पहुंची, कितने दस्तावेजों का सत्यापन हुआ और अब तक क्या निष्कर्ष निकला—इसका स्पष्ट ब्यौरा सामने नहीं आया है। जब आदेश भी जारी हो गए और जांच समितियां भी बन गईं, तो फिर नतीजों पर चुप्पी क्यों? कहीं जांच की पूरी प्रक्रिया सरकारी फाइलों तक सिमटकर तो नहीं रह गई? अब जिला शिक्षा विभाग को इसका जवाब देना चाहिए।

विधायक के पत्र से शासन तक पहुंचा मामला, फिर जिला स्तर पर कार्रवाई के निर्देश
सैलाना विधायक कमलेश्वर डोडियार ने 11 जुलाई 2026 को पत्र क्रमांक 459 के माध्यम से फर्जी D.Ed.-B.Ed. अंकसूचियों और शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के आधार पर नियुक्त शिक्षकों की जांच कराने की मांग उठाई थी। इसके बाद लोक शिक्षण संचालनालय, मध्यप्रदेश ने 13 अगस्त 2026 को पत्र क्रमांक यूसीआर/डी/103/2026/1629 जारी कर नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए। शिवपुरी जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने भी संबंधित अधिकारियों और संकुलों तक जांच संबंधी निर्देश पहुंचाए तथा प्राचार्यों और लिपिकों की समितियां गठित करने की कार्रवाई की।
जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के पत्र क्रमांक शिकायत-1/2026/6071, दिनांक 7 सितंबर 2026 में फर्जी D.Ed.-B.Ed. शैक्षणिक अर्हता और अंकसूचियों के आधार पर नियुक्त शिक्षकों की प्रदेशव्यापी जांच कर तत्काल कार्रवाई करने के निर्देशों का उल्लेख है। पत्र में नियमानुसार कार्रवाई और निर्धारित समय-सीमा में प्रतिवेदन उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया है। यानी मामला जिला स्तर तक पहुंच चुका है और जांच की जिम्मेदारी भी तय की गई है। अब सवाल है कि संबंधित समितियों ने कितने दस्तावेजों की पड़ताल की और उनकी रिपोर्ट किस स्थिति में है?

इंदौर में 51 शिक्षकों के दस्तावेज फर्जी, शिवपुरी में सत्यापन का हिसाब कौन देगा?
इंदौर के सांवेर में वर्ष 2006-07 की संविदा शिक्षक भर्ती से जुड़े दस्तावेजों का बोर्ड रिकॉर्ड से मिलान किए जाने पर 51 शिक्षकों के दस्तावेज फर्जी पाए जाने की जानकारी सामने आई। कुछ मामलों में अंकसूचियां बोर्ड के रिकॉर्ड में नहीं मिलीं, जबकि एक ही रोल नंबर पर अलग-अलग अंकसूचियां होने जैसी गंभीर विसंगतियों की बात भी सामने आई।
यह मामला बताता है कि नियुक्ति के समय प्रस्तुत शैक्षणिक दस्तावेजों का मूल रिकॉर्ड से सत्यापन कितना जरूरी है। शिवपुरी में भी इसी तरह निष्पक्ष और प्रमाण-आधारित जांच की आवश्यकता है। हालांकि इंदौर में सामने आए 51 मामलों को शिवपुरी से जोड़कर कोई संख्या बताना उचित नहीं होगा। शिवपुरी में वास्तविक स्थिति संबंधित बोर्डों और विश्वविद्यालयों के सत्यापन के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। लेकिन विभाग को यह बताना चाहिए कि जांच की प्रक्रिया किस स्तर पर है और अब तक कितनी प्रगति हुई है।

पहले भी गठित हुई जांच समिति, 34 शिक्षकों के सत्यापन का मामला भी सामने आया
शिवपुरी में शिक्षक नियुक्तियों से जुड़े दस्तावेजों की जांच का मामला पहले भी उठ चुका है। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, कलेक्टर के आदेश क्रमांक शिक्षा/शिकायत-1/2024/7792-7793, दिनांक 5 दिसंबर 2024 से जांच समिति गठित की गई थी। नवंबर 2025 में फर्जी D.Ed. अंकसूचियों से जुड़े एक मामले में 34 शिक्षकों के दस्तावेजों के सत्यापन की कार्रवाई का भी उल्लेख सामने आया था। यह संख्या संबंधित जांच में शामिल शिक्षकों की बताई गई थी, पूरे जिले की नहीं।
ऐसे में यह जानना जरूरी है कि पिछली जांचों का क्या परिणाम निकला, कितने दस्तावेजों का सत्यापन पूरा हुआ और कितने मामलों में आगे कार्रवाई की जरूरत पड़ी। नई समितियों को किन बिंदुओं पर जांच सौंपी गई है और पुरानी जांच से उसका क्या संबंध है, इसका स्पष्ट ब्यौरा भी सामने आना चाहिए। बार-बार जांच समितियां बनने के बावजूद निष्कर्षों की स्थिति स्पष्ट न हो तो विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सवाल सीधे हैं—कितनी अंकसूचियां जांच के लिए भेजीं, कितनी रिपोर्ट आईं?
जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय को स्पष्ट करना चाहिए कि कितने शिक्षकों की D.Ed.-B.Ed. अंकसूचियां संबंधित बोर्डों और विश्वविद्यालयों को सत्यापन के लिए भेजी गईं, कितने जवाब प्राप्त हुए और कितने मामले अब भी लंबित हैं। किन संकुलों ने जांच पूरी कर रिपोर्ट सौंपी और किनकी रिपोर्ट बाकी है? यदि सत्यापन शुरू हो चुका है तो उसकी प्रगति सार्वजनिक करने में क्या परेशानी है? और यदि जांच आगे नहीं बढ़ी, तो इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय की गई है?
समितियों का गठन जांच पूरी होने का प्रमाण नहीं है। पत्र जारी करना प्रशासनिक प्रक्रिया है, जबकि प्रस्तुत प्रमाणपत्रों की वास्तविकता की पुष्टि करना और संदिग्ध मामलों में नियमानुसार कार्रवाई करना असली जवाबदेही है। दस्तावेजों का सत्यापन संबंधित बोर्डों और विश्वविद्यालयों के मूल अभिलेखों से कराया जाना चाहिए, ताकि किसी निर्दोष शिक्षक पर गलत आरोप न लगे और फर्जी प्रमाणपत्र मिलने पर कार्रवाई भी प्रमाणों के आधार पर हो सके।
कलेक्टर करें समीक्षा, तय हो जांच पूरी करने की समय-सीमा
अब जिला शिक्षा अधिकारी को प्रत्येक समिति से लिखित प्रगति प्रतिवेदन लेकर जांच की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। कलेक्टर को भी पूरे मामले की समीक्षा कर सत्यापन पूरा करने की समय-सीमा तय करनी चाहिए, ताकि मामला अनिश्चितकाल तक फाइलों में न उलझा रहे। विभाग को यह भी बताना चाहिए कि जांच के निष्कर्ष कब तक सामने रखे जाएंगे और लंबित मामलों को पूरा करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
यह मामला सभी शिक्षकों को संदेह के घेरे में खड़ा करने का नहीं, बल्कि सही दस्तावेजों वाले शिक्षकों को संदेह से मुक्त करने और फर्जी प्रमाणपत्र प्रमाणित होने पर नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करने का है। इसलिए जांच का परिणाम तथ्यों और मूल रिकॉर्ड के आधार पर सामने आना चाहिए।
शासन का आदेश आया, पत्र जारी हुए, समितियां बनीं—अब जांच का हिसाब भी दीजिए। इंदौर में D.Ed.-B.Ed. से जुड़े 51 शिक्षकों के दस्तावेज फर्जी मिलने की जानकारी ने दस्तावेज सत्यापन की गंभीरता फिर उजागर की है। शिवपुरी में भी अब सवालों से बचने के बजाय जांच की प्रगति, सत्यापित दस्तावेजों की संख्या और लंबित मामलों की समय-सीमा स्पष्ट करना जरूरी है। क्योंकि सरकारी आदेश जारी करना जवाबदेही का अंत नहीं, शुरुआत है; समितियां बनाना उपलब्धि नहीं, सच्चाई सामने लाना असली परीक्षा है। अब देखना यह है कि शिवपुरी शिक्षा विभाग इस परीक्षा में कब तक परिणाम देता है।
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