भ्रष्टाचार की खबर छापने से पहले लेनी होगी अनुमति? नए कानून से पत्रकारिता पर शिकंजे की आशंका, 21 बड़े मीडिया संस्थान पहुंचे सुप्रीम कोर्ट!

घोटाले उजागर करने से लेकर अफसरों की संपत्ति का हिसाब तलाशने तक पत्रकारिता के सामने कानूनी चुनौती; डिजिटल डेटा कानून में पत्रकारों को छूट नहीं मिलने पर देशभर में बहस, केंद्र ने कहा– खबर से पहले अनुमति जरूरी नहीं
नई दिल्ली। अगर कोई पत्रकार किसी अफसर की करोड़ों की संपत्ति का हिसाब तलाशे, सरकारी खजाने में सेंध लगाने वाले घोटाले की फाइलें खंगाले या सत्ता में बैठे लोगों के कारनामे जनता के सामने लाए, तो क्या उसे खबर छापने से पहले संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेनी पड़ेगी? क्या अब भ्रष्टाचार की पोल खोलने वाली पत्रकारिता भी कानूनी पचड़ों में उलझेगी? देश के मीडिया जगत में इन दिनों यही बहस गर्म है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां 21 बड़े मीडिया संस्थानों ने नए डिजिटल डेटा कानून को चुनौती दी है।
विवाद डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 को लेकर है। मीडिया संस्थानों की आपत्ति है कि इस कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं रखी गई। उन्हें आशंका है कि व्यक्तिगत जानकारी के इस्तेमाल और उसे सार्वजनिक करने से जुड़े प्रावधान खोजी पत्रकारिता के रास्ते में कानूनी बाधाएं खड़ी कर सकते हैं। खासकर उन खबरों में, जिनमें भ्रष्टाचार, आर्थिक अनियमितताओं और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के कामकाज की पड़ताल की जाती है।
घोटालेबाज की अनुमति लेकर ही खोलेंगे उसका राज?
मीडिया संगठनों की दलील है कि पत्रकारिता में कई बार ऐसे दस्तावेज और जानकारियां सामने लानी पड़ती हैं, जिन्हें संबंधित व्यक्ति सार्वजनिक नहीं करना चाहता। यदि किसी अधिकारी की संपत्ति, किसी कारोबारी के लेन-देन या किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटाने और प्रकाशित करने पर कानूनी जोखिम पैदा होता है, तो खोजी पत्रकारिता कैसे आगे बढ़ेगी?
यही चिंता अदालत में भी उठाई गई। मीडिया की ओर से दलील दी गई कि कानून का मौजूदा स्वरूप पत्रकारिता पर अप्रत्यक्ष दबाव और पूर्व-सेंसरशिप जैसी स्थिति पैदा कर सकता है।
21 मीडिया संस्थान सुप्रीम कोर्ट पहुंचे
देश के 21 बड़े समाचार प्रकाशकों का प्रतिनिधित्व करने वाली डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। 27 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। मीडिया की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दिवान ने पक्ष रखा। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित की गई है।
याचिका में कानून की धारा 44(3) को भी चुनौती दी गई है, जिसके जरिए सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) में बदलाव किया गया है। इससे व्यक्तिगत जानकारी और सार्वजनिक हित में सूचना हासिल करने के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर भी सवाल उठे हैं।
सरकार बोली- पत्रकार को अनुमति लेने की जरूरत नहीं
केंद्र सरकार की ओर से उठे विवाद पर सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 28 अक्टूबर को कहा कि पत्रकारिता के लिए किसी व्यक्ति से खबर प्रकाशित करने की अनुमति लेना जरूरी नहीं है। सरकार ने यह भी कहा कि पत्रकारों को अपने समाचार स्रोतों का खुलासा करने की बाध्यता नहीं है।
लेकिन मीडिया संस्थानों की चिंता का मूल मुद्दा यही है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट संरक्षण क्यों नहीं दिया गया? केवल मौखिक आश्वासन से भविष्य में पैदा होने वाली कानूनी अनिश्चितता कैसे खत्म होगी?
पत्रकार के हाथ बंधे तो जनता की आवाज कौन उठाएगा?
देश में कई बड़े घोटाले, सरकारी खरीद में गड़बड़ी, अधिकारियों की संदिग्ध संपत्तियां और जनहित से जुड़े मामले पत्रकारों की दस्तावेजी पड़ताल से ही सामने आए हैं। पत्रकारिता का असली काम सत्ता की तारीफ करना नहीं, बल्कि उससे जवाब मांगना भी है।
आज सवाल किसी एक समाचार चैनल, अखबार या पत्रकार का नहीं है। सवाल उस आम आदमी का है, जिसकी मेहनत की कमाई सरकारी योजनाओं और संस्थाओं में लुटती है और जिसकी आवाज मीडिया के जरिए सामने आती है।
यदि भ्रष्टाचार उजागर करने वाली खबरों के रास्ते में कानूनी डर खड़ा हो गया, तो फायदा किसे होगा? उस पत्रकार को, जो सच सामने लाना चाहता है, या उस प्रभावशाली व्यक्ति को, जो अपने खिलाफ खबर नहीं चाहता?
फिलहाल कानून पर कोई रोक नहीं लगी है और सुप्रीम कोर्ट ने इसकी वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। 17 नवंबर की सुनवाई अब इसलिए अहम है क्योंकि मामला सिर्फ मीडिया की आजादी का नहीं, बल्कि जनता के उस अधिकार का भी है, जिसके तहत वह जानना चाहती है कि उसके पैसे, उसके अधिकार और उसकी सरकार के साथ आखिर हो क्या रहा है।
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