नाबालिग को बहला-फुसलाकर ले जाना पड़ा भारी, पॉक्सो कोर्ट ने सुनाई 20 साल की सजा

भौंती के अपराध क्रमांक 123/2023 में फैसला: धारा 5(एल)/6 पॉक्सो एक्ट में 20 वर्ष का सश्रम कारावास, धारा 363 में भी 3 साल की सजा
पुलिस जांच से डीएनए परीक्षण तक साक्ष्यों की पड़ताल, बचाव की नरमी की दलील भी नहीं आई काम
पिछोर। नाबालिग के साथ गंभीर लैंगिक अपराध के मामले में आखिरकार अदालत ने अपना फैसला सुना दिया। विशेष न्यायाधीश, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012, पिछोर ने विशेष प्रकरण क्रमांक 20/2023 में आरोपी सनी रजक को दोषसिद्ध करते हुए पॉक्सो एक्ट की धारा 5(एल)/6 के तहत 20 वर्ष के सश्रम कारावास और ₹3 हजार अर्थदंड की सजा सुनाई है। इसके साथ ही भारतीय दंड संहिता की धारा 363 के तहत 3 वर्ष के सश्रम कारावास और ₹2 हजार अर्थदंड से भी दंडित किया गया है।
18 अगस्त 2026 को घोषित यह फैसला पुलिस थाना भौंती के अपराध क्रमांक 123/2023 से संबंधित है। मामले में शासन की ओर से एजीपी अमित कुमार वर्मा ने पैरवी की, जबकि आरोपी की ओर से अधिवक्ता डी.एस. चौहान ने पक्ष रखा।
28 मई 2023 की घटना से शुरू हुई थी पूरी कहानी
न्यायालयीन निर्णय में दर्ज अभियोजन के अनुसार 28 मई 2023 को घटना हुई। अगले दिन 29 मई 2023 को पीड़िता के पिता ने थाना भौंती में रिपोर्ट दर्ज कराई। रिपोर्ट के अनुसार घटना वाले दिन परिवार के सदस्य खेत पर गए थे और वापस लौटने पर नाबालिग घर पर नहीं मिली। तलाश शुरू हुई तो मामला पुलिस तक पहुंचा।
पुलिस ने गुमशुदगी की सूचना के आधार पर कार्रवाई शुरू की और विवेचना आगे बढ़ने के साथ मामले में गंभीर धाराएं जुड़ती गईं। घटनास्थल का नक्शा तैयार हुआ, संबंधित लोगों के कथन दर्ज किए गए और पीड़िता के न्यायालयीन कथन भी कराए गए।
सिर्फ बयान नहीं, मेडिकल से डीएनए तक जांच
इस मामले की विवेचना में पुलिस ने केवल बयान दर्ज करने तक कार्रवाई सीमित नहीं रखी। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत अभियोजन दस्तावेजों में धारा 164 दंड प्रक्रिया संहिता का कथन, पीड़िता एवं आरोपी की मेडिकल रिपोर्ट, जब्ती पत्रक, घटनास्थल का नक्शा, गिरफ्तारी पंचनामा, पुलिस कथन, माता-पिता के बयान, सोनोग्राफी रिपोर्ट और डीएनए परीक्षण से संबंधित रिपोर्ट सहित कुल 26 से अधिक अभियोजन दस्तावेजों का उल्लेख है।
अभियोजन के अनुसार आरोपी के रक्त का नमूना लेकर डीएनए परीक्षण कराया गया और प्राप्त रिपोर्ट को प्रकरण में संलग्न किया गया। यानी पुलिस जांच में उपलब्ध दस्तावेजी, चिकित्सकीय और वैज्ञानिक साक्ष्यों को अदालत के सामने रखा गया।
26 अगस्त 2023 को चालान, 18 अक्टूबर को आरोप तय
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने 26 अगस्त 2023 को आरोपी के विरुद्ध अभियोग-पत्र न्यायालय में पेश किया। इसके बाद 18 अक्टूबर 2023 को आरोपों का निर्धारण हुआ। अभियोजन साक्ष्य की प्रक्रिया 22 नवंबर 2023 से शुरू हुई और न्यायालयीन रिकॉर्ड के अनुसार 5 अगस्त 2026 को निर्णय सुरक्षित किए जाने की कार्रवाई पूरी हुई। इसके बाद 18 अगस्त 2026 को फैसला घोषित किया गया।
लगभग तीन वर्ष तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए दोषसिद्धि का निर्णय दिया।
बचाव ने कहा—पहला अपराध है, अदालत ने अपराध की गंभीरता देखी
फैसले के अंतिम हिस्से में बचाव पक्ष की ओर से आरोपी के प्रति नरम रुख अपनाने की मांग की गई। दलील दी गई कि आरोपी का यह पहला अपराध है और वह लंबे समय से विचारण का सामना कर रहा है।
लेकिन अदालत के सामने सवाल केवल आरोपी की व्यक्तिगत परिस्थिति का नहीं था। मामला नाबालिग से संबंधित गंभीर लैंगिक अपराध का था। न्यायालय ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध परिस्थितियों, अभियोजन के साक्ष्यों और लागू कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए सजा निर्धारित की।
20 साल की सजा—पॉक्सो कानून की कठोरता सामने
अदालत ने पॉक्सो एक्ट की धारा 5(एल)/6 के तहत 20 वर्ष का सश्रम कारावास और ₹3,000 अर्थदंड लगाया। अर्थदंड नहीं देने पर 2 माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास भुगतना होगा।
वहीं धारा 363 भादंसं के तहत 3 वर्ष का सश्रम कारावास और ₹2,000 अर्थदंड लगाया गया। अर्थदंड अदा नहीं करने पर 1 माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास भुगतना होगा।
फैसले में दर्ज आदेश के अनुसार मूल सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
कानून की पकड़ से बचने की कोशिशों पर अदालत का फैसला भारी
यह मामला एक बार फिर बताता है कि नाबालिगों के खिलाफ अपराधों में कानून की प्रक्रिया लंबी हो सकती है, लेकिन साक्ष्य सामने आने के बाद न्यायालय का फैसला अपराध की गंभीरता के अनुरूप कठोर हो सकता है।
28 मई 2023 की घटना से शुरू हुआ मामला 18 अगस्त 2026 को 20 साल की सजा तक पहुंचा। पुलिस की विवेचना, मेडिकल परीक्षण, न्यायालयीन कथन, दस्तावेजी साक्ष्य और डीएनए परीक्षण जैसे पहलुओं की जांच के बाद अदालत ने दोषसिद्धि की।
संदेश सीधा है—बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ को कानून हल्के में नहीं लेता। अपराध के बाद चाहे कितने ही तर्क दिए जाएं, अदालत में अंतिम फैसला साक्ष्यों और कानून की कसौटी पर ही होता है।
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