खनियाधाना का एक युग विदा हुआ, कल निकलेगी महाराज भानु प्रताप सिंह की अंतिम यात्रा

रियासत के राजसी वैभव से लेकर लोकतंत्र की राजनीति तक का सफर देखा, पीछे छोड़ गए खनियाधाना के इतिहास और राष्ट्रभक्ति की विरासत
खनियाधाना। खनियाधाना की मिट्टी आज शोक में है। यहां के राजपरिवार की एक महत्वपूर्ण कड़ी और पूर्व विधायक महाराज भानु प्रताप सिंह का निधन हो गया। उनकी अंतिम यात्रा कल निकाली जाएगी। महाराज भानु प्रताप सिंह का जाना केवल एक राजपरिवार के सदस्य की विदाई नहीं, बल्कि खनियाधाना के उस इतिहास के एक जीवंत अध्याय का अवसान है, जिसकी जड़ें रियासत के दौर से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों तक जाती हैं।
खनियाधाना कभी एक स्वतंत्र रियासत थी और यहां के प्रतापी शासक महाराज खलक सिंह जूदेव का नाम आज भी राजसी वैभव से कहीं अधिक उनकी राष्ट्रवादी चेतना और क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े प्रसंगों के कारण याद किया जाता है। यही वह इतिहास है, जिसके कारण हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस के आसपास खनियाधाना का नाम फिर चर्चा में आता है—महाराज खलक सिंह और महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की उस चर्चित कहानी के कारण, जिसे खनियाधाना की पीढ़ियां आज तक सुनाती आई हैं।
कहा जाता है कि महाराज खलक सिंह झांसी से अपनी विदेशी कार से खनियाधाना लौट रहे थे। रास्ते में कार में खराबी आने पर वे सड़क किनारे रुक गए। तभी अचानक पीछे से तेज आवाज हुई। पलटकर देखा तो वहां एक कारतूस पड़ा था और उसके साथ जहरीला सांप। सामने मौजूद उस अचूक निशानेबाज युवक की प्रतिभा ने महाराज का ध्यान खींचा। कहा जाता है कि वही युवक आगे चलकर चंद्रशेखर आजाद के नाम से देश के स्वतंत्रता संग्राम का अमर क्रांतिकारी बना। स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा में यह भी माना जाता है कि महाराज खलक सिंह ने ही उन्हें ‘आजाद’ नाम से पुकारा और खनियाधाना की सीतापाठा की धरती पर उनके कुछ समय रहने तथा बुंदेलखंड में क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ने की स्मृतियां आज भी जीवित हैं।
महाराज भानु प्रताप सिंह, महाराज खलक सिंह जूदेव के वारिस थे। उन्होंने राजसी विरासत के साथ लोकतांत्रिक भारत का दौर भी देखा और पिछोर से विधायक के रूप में सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका निभाई। जीवन के अंतिम समय तक उनका जुड़ाव खनियाधाना की अपनी रियासत और बसई कोठी से बना रहा। उनकी धर्मपत्नी स्वर्गीय पद्मा राजे भी शिवपुरी में भाजपा जिलाध्यक्ष के पद पर रह चुकी थीं। इस तरह यह परिवार केवल खनियाधाना के राजसी इतिहास का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि बदलते भारत के सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन से भी जुड़ा रहा।
कल जब महाराज भानु प्रताप सिंह की अंतिम यात्रा निकलेगी, तब खनियाधाना केवल अपने महाराज को विदा नहीं करेगा, बल्कि अपने उस दौर की एक जीवित स्मृति को भी अंतिम प्रणाम करेगा, जिसमें रियासत थी, राजसी परंपराएं थीं, स्वतंत्रता की बेचैनी थी और राष्ट्र के लिए कुछ कर गुजरने वाले लोगों की कहानियां थीं। समय बदल गया, राजसत्ता चली गई, लेकिन इतिहास की स्मृतियां आज भी खनियाधाना की हवाओं में मौजूद हैं।
महाराज भानु प्रताप सिंह को सादर नमन।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिवार को यह अपार दुख सहने की शक्ति दें।
विनम्र श्रद्धांजलि।
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