कानून के सामने विधायक भी बराबर, अब रैलियों में नियम सबके लिए बराबर होंगे?

पिछोर की तिरंगा बाइक रैली में विधायक प्रीतम लोधी का ₹300 का चालान—खुद स्वीकार की गलती, अब बड़ा सवाल: क्या अगली हर राजनीतिक रैली में बिना हेलमेट चलने वालों पर भी पुलिस ऐसी ही सख्ती दिखाएगी?
पिछोर। स्वतंत्रता दिवस के पहले ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के तहत पिछोर में निकली बाइक रैली देशभक्ति के नारों के बीच एक ऐसे घटनाक्रम की वजह से भी चर्चा में आ गई, जिसने कानून और राजनीतिक प्रभाव के बीच अक्सर खड़े होने वाले सवाल को फिर सामने ला दिया। भाजपा विधायक प्रीतम सिंह लोधी बिना हेलमेट बाइक चलाते मिले तो पुलिस ने उनका ₹300 का चालान काटा और विधायक ने बिना किसी विरोध के जुर्माना स्वीकार कर लिया। रिपोर्टों के मुताबिक विधायक ने अपनी गलती मानते हुए आगे से हेलमेट पहनकर बाइक चलाने और लोगों से भी यातायात नियमों का पालन करने की अपील की।
यह तस्वीर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सड़क पर कानून की किताब में विधायक और आम नागरिक के लिए अलग-अलग नियम नहीं हैं। कानून की असली ताकत तभी दिखाई देती है जब उसकी कार्रवाई प्रभावशाली व्यक्ति के सामने भी उतनी ही सहजता से हो, जितनी किसी सामान्य वाहन चालक के सामने। पिछोर की इस घटना में विधायक द्वारा चालान स्वीकार करना निश्चित रूप से एक सकारात्मक संदेश है, लेकिन इसके साथ ही पुलिस और प्रशासन के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है।
क्या अब पिछोर और पूरे शिवपुरी जिले में निकलने वाली हर राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक बाइक रैली में बिना हेलमेट चलने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर पुलिस इसी तरह कार्रवाई करेगी? क्या कार्यकर्ता हो, पदाधिकारी हो, नेता हो या आम नागरिक—हेलमेट के मामले में सबके लिए एक ही नियम लागू होगा? और यदि किसी रैली में सैकड़ों दोपहिया वाहन बिना हेलमेट निकलते हैं तो क्या पुलिस केवल रैली रोककर समझाइश देगी या कानून के मुताबिक चालान भी काटेगी?
दरअसल इस घटना ने पुलिस के सामने एक ऐसी कसौटी खड़ी कर दी है, जिस पर आने वाले दिनों में उसकी निष्पक्षता को परखा जाएगा। विधायक का चालान कटना खबर जरूर है, लेकिन उससे भी बड़ी खबर तब बनेगी जब इसके बाद पुलिस हर रैली में बिना हेलमेट चलने वाले लोगों के खिलाफ समान कार्रवाई करती दिखाई देगी।
रैली जनसेवा कार्यालय से शुरू होकर शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरी। हाथों में तिरंगा था, ‘भारत माता की जय’ और ‘हर घर तिरंगा’ के नारे थे और माहौल देशभक्ति से भरा हुआ था। लेकिन देशभक्ति के साथ अनुशासन भी जरूरी है। तिरंगा हाथ में लेकर यातायात नियम तोड़ना देशभक्ति का प्रमाण नहीं हो सकता। सड़क पर सुरक्षा नियमों का पालन करना भी नागरिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
विधायक ने खुद यह संदेश दिया कि जनप्रतिनिधि भी कानून से ऊपर नहीं हैं। अब गेंद पुलिस के पाले में है। क्या पुलिस इस संदेश को केवल विधायक के चालान तक सीमित रखेगी या इसे एक नियमित नीति बनाएगी?
क्योंकि आम आदमी के मन में सबसे स्वाभाविक सवाल यही है—अगर विधायक का बिना हेलमेट चालान हो सकता है तो फिर किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता, पदाधिकारी या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का क्यों नहीं?
और यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पहलू है। पुलिस की निष्पक्षता का मतलब केवल कार्रवाई करना नहीं, बल्कि एक जैसी परिस्थिति में एक जैसी कार्रवाई करना है।
पिछोर की यह घटना इसलिए एक मिसाल बन सकती है, बशर्ते पुलिस इसे केवल एक दिन की कार्रवाई बनाकर न छोड़ दे। यदि आने वाली रैलियों में भी बिना हेलमेट बाइक सवारों पर कार्रवाई होती है तो विधायक द्वारा खुद चालान स्वीकार करने का संदेश जमीन पर दिखाई देगा। लेकिन यदि अगली किसी राजनीतिक रैली में सैकड़ों लोग बिना हेलमेट दौड़ते नजर आए और पुलिस सिर्फ तमाशबीन बनी रही, तो जनता का सवाल फिर वही होगा—कानून सचमुच सबके लिए बराबर है या रैली देखकर नियम बदल जाते हैं?
विधायक ने अपना चालान कटवाकर कानून के सम्मान का संदेश दे दिया है। अब पुलिस को अपनी कार्रवाई से यह साबित करना है कि सड़क पर न नेता बड़ा है, न कार्यकर्ता और न आम आदमी—बड़ा सिर्फ कानून है।
15 अगस्त की तिरंगा रैली का यही संदेश सबसे सार्थक होगा—तिरंगा सिर पर हो तो हेलमेट भी सिर पर हो, और लोकतंत्र में पद चाहे जितना बड़ा हो, कानून उससे बड़ा ही रहे।
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