मनीखेड़ा बना मनीखेड़ा घोटाला?” करोड़ों बह गए… लेकिन शिवपुरी की जनता आज भी बूंद-बूंद पानी को मोहताज मेंटीनेन्स के नाम पर लाखो स्वाहा फिर भी प्यासे कंठ!


मनीखेड़ा में पानी कम, भ्रष्टाचार ज्यादा! करोड़ों डूबे… शिवपुरी फिर भी प्यासा!”
“करोड़ों की जल योजना फेल! नेता मालाओं में व्यस्त, जनता पानी के लिए त्राहि-त्राहि”
“करोड़ों खर्च, फिर भी सूखे कंठ—आखिर किसके संरक्षण में चल रहा खेल?”
“एक इंजीनियर, करोड़ों का खेल और प्यासा शिवपुरी!”
शिवपुरी। शहर की प्यास बुझाने के नाम पर शुरू हुआ मनीखेड़ा जल परियोजना अब सवालों, भ्रष्टाचार और जनता के गुस्से का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी है। करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी शिवपुरी की जनता आज पानी के लिए डिब्बे, कट्टियां और बाल्टियां लेकर दर-दर भटकने को मजबूर है। हालात इतने बदतर हैं कि शहर के कई इलाकों में लोग सुबह से रात तक सिर्फ पानी के इंतजार में जिंदगी काट रहे हैं, जबकि जिम्मेदार नेता फूल-मालाओं और स्वागत समारोहों में व्यस्त दिखाई देते हैं।
सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए थे कि मनीखेड़ा प्रोजेक्ट से “हर घर पानी” पहुंचेगा, लेकिन वर्षों बाद भी यह परियोजना अधूरी, अव्यवस्थित और भ्रष्टाचार के आरोपों में डूबी नजर आ रही है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर ऐसा कौन सा राजनीतिक संरक्षण है, जिसके चलते इस पूरी परियोजना की जिम्मेदारी वर्षों से एक ही इंजीनियर—सचिन चौहान—के हाथों में सौंप रखी गई है?
शहर में चर्चा है कि परियोजना की शुरुआत से लेकर आज तक करोड़ों रुपए मेंटेनेंस, नई पाइप लाइन, मशीन सुधार और तकनीकी कार्यों के नाम पर खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन नतीजा शून्य है। जनता पूछ रही है कि जब परियोजना लगातार फेल हो रही है तो आखिर प्रभारी अधिकारी को अब तक हटाया क्यों नहीं गया?

विधायक बोले—“मेरी अध्यक्ष नहीं सुनती”… सांसद बोले—“मुझे विवाद में मत घसीटो!”
सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि पानी जैसे गंभीर मुद्दे पर जनप्रतिनिधि भी खुलकर बोलने से बचते नजर आ रहे हैं। स्थानीय विधायक जिम्मेदारी नगर पालिका अध्यक्ष पर डालते दिखाई देते हैं, जबकि सांसद का कथित जवाब है—“मुझे विवादों में मत घसीटो।”
उधर जनता सवाल कर रही है कि अगर जनता को पानी तक नहीं दिला सकते, तो फिर चुनाव के समय किए गए वादों का क्या हुआ?
“मेंटेनेंस” या करोड़ों का खेल?
सूत्रों की मानें तो मनीखेड़ा प्लांट में लगी मशीनों के मेंटेनेंस के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए निकाले जा रहे हैं। लेकिन इस खर्च का हिसाब कौन रख रहा है? कौन जांच कर रहा है कि आखिर इतने पैसे जाने के बाद भी मोटरें बंद क्यों पड़ जाती हैं, सप्लाई ठप क्यों हो जाती है और शहर प्यासा क्यों रहता है?
अब तो सोशल मीडिया पर भी जनता खुलकर विरोध करने लगी है। लोग सीधे-सीधे आरोप लगा रहे हैं कि यह परियोजना अब “जल योजना” कम और “भ्रष्टाचार योजना” ज्यादा बन चुकी है।
कलेक्टर पहुंचे तो बंद मोटरें अचानक चालू!
हाल ही में जब कलेक्टर ने परियोजना की हकीकत देखने का प्रयास किया, तब बताया गया कि कई दिनों से मोटरें बंद थीं। लेकिन शहर में चर्चा यह भी है कि निरीक्षण के दौरान जानबूझकर हालात खराब दिखाए गए और कलेक्टर के जाते ही दूसरे दिन सप्लाई फिर शुरू हो गई।
अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर जनता को बेवकूफ बनाया जा रहा है या प्रशासन को?

जनता का फूटा गुस्सा शिवपुरी की जनता अब खुलकर कह रही है—
“हमें भाषण नहीं, पानी चाहिए!”
“अगर प्रभारी पानी नहीं दे पा रहा तो उसे हटाओ!”
“करोड़ों खर्च हुए, हिसाब दो!”
शहर के सूखे कंठ अब सिर्फ पानी नहीं, जवाब भी मांग रहे हैं। आखिर करोड़ों रुपए गए कहां? क्यों वर्षों से एक ही अधिकारी इस परियोजना पर जमे हुए हैं? और क्यों हर बार जांच की बातें सिर्फ फाइलों में दफन होकर रह जाती हैं?
अगर इस पूरे प्रोजेक्ट की निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई बड़े नाम बेनकाब हो सकते हैं। लेकिन फिलहाल शिवपुरी की जनता के हिस्से में सिर्फ इंतजार, टैंकर और प्यास ही आई है।
Live Cricket Info






