75 पेटी शराब पकड़ी, फिर गांव-गांव बिकती शराब क्यों नहीं दिखती?

जनता को पता, शराब बिकने की जगहों की चर्चा गांव-गांव में, फिर आबकारी विभाग की निगरानी कहां? क्या कार्रवाई के लिए हर बार शिकायत जरूरी है?
शिवपुरी । पिछोर में 75 पेटी शराब पकड़कर आबकारी विभाग ने बड़ी कार्रवाई जरूर की है, लेकिन इसी कार्रवाई ने विभाग की निगरानी व्यवस्था पर उससे भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जब आम जनता को गांव-गांव में कथित अवैध शराब बिक्री की जानकारी रहती है, शराब बेचने वालों और ठिकानों की चर्चा तक ग्रामीणों के बीच होती है, तो फिर आबकारी विभाग को इसकी भनक क्यों नहीं लगती? क्या अवैध शराब पकड़ने के लिए हर बार किसी शिकायत का इंतजार करना जरूरी है? आखिर शराब की अवैध बिक्री रोकना आबकारी विभाग की जिम्मेदारी है या जनता की?
14 अगस्त को लभेड़ा तिराहा स्थित पिछोर ढाबे पर आबकारी विभाग ने दबिश देकर देशी मदिरा, विदेशी मदिरा और बीयर की 75 पेटियां जब्त कीं, जिनकी अनुमानित कीमत करीब 3 लाख रुपए बताई गई है। एक आरोपी को गिरफ्तार कर मध्यप्रदेश आबकारी अधिनियम, 1915 की धारा 34(1) एवं 34(2) के तहत प्रकरण दर्ज किया गया। कलेक्टर अर्पित वर्मा, उपायुक्त आबकारी संदीप शर्मा के निर्देशन तथा जिला आबकारी अधिकारी शुभम दांगोड़े के नेतृत्व में हुई यह कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन अब इसी कार्रवाई के बाद विभाग से कुछ असहज सवाल पूछना भी जरूरी है।
जब एक ढाबे पर 75 पेटी शराब पहुंच गई तो निगरानी तंत्र को पहले क्यों पता नहीं चला? अगर विभाग को सूचना के बाद ही शराब का अवैध स्टॉक दिखाई देता है तो नियमित गश्त, निरीक्षण और निगरानी का क्या मतलब है? और यदि विभाग के पास क्षेत्र की गतिविधियों की नियमित जानकारी रहती है तो फिर गांव-गांव में कथित अवैध बिक्री की शिकायतें लगातार क्यों सामने आती हैं?
पिछोर और खनियाधाना क्षेत्र के ग्रामीणों की ओर से कई स्थानों पर अवैध शराब बिक्री, कथित कमीशन एजेंटों के माध्यम से शराब पहुंचाने, सरकारी शराब दुकानों से अधिक कीमत वसूलने तथा बिना बिल और बिना रेट लिस्ट शराब बेचने जैसी शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है। इन शिकायतों की स्वतंत्र पुष्टि जांच का विषय है, लेकिन यदि इनमें तथ्य है तो यह सवाल बेहद गंभीर है कि आबकारी विभाग का सूचना और निगरानी तंत्र आखिर काम कैसे कर रहा है?
क्या विभाग को सूचना देने का काम भी जनता ही करेगी?
आबकारी कानून का उद्देश्य ही शराब के अवैध निर्माण, परिवहन, कब्जे और बिक्री पर नियंत्रण रखना है। ऐसे में यह सवाल पूरी मजबूती से खड़ा होता है कि क्या विभाग की कार्रवाई शिकायत मिलने के बाद ही शुरू होगी? अगर किसी गांव में अवैध शराब बिक रही है, तो उसका पता लगाने के लिए क्या विभागीय अमले को ग्रामीणों के फोन का इंतजार करना चाहिए? क्या नियमित पेट्रोलिंग, दुकानों की जांच, स्टॉक का मिलान और संदिग्ध स्थानों की निगरानी नहीं होनी चाहिए?
एक तरफ विभाग ढाबे से 75 पेटी पकड़कर अपनी सक्रियता दिखाता है, दूसरी तरफ यदि गांवों में लंबे समय से अवैध शराब बिक्री की शिकायतें हैं तो दोनों तस्वीरों के बीच का विरोधाभास खुद कई सवाल पैदा करता है। जनता अगर किसी अवैध गतिविधि को देख सकती है तो जिम्मेदार विभाग की निगाह वहां तक क्यों नहीं पहुंचती?
आबकारी बिभागा की कवरवाही क्या अब ढाबे से निकलकर आगे गांवों की चौखट पर पहुंचेगी क्या ?
अब आबकारी विभाग के सामने असली चुनौती सिर्फ गिरफ्तार आरोपी तक सीमित रहने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की है कि बरामद शराब कहां से आई, किसने उपलब्ध कराई और क्या इसका कोई बड़ा सप्लाई नेटवर्क है। इसके साथ ही पिछोर-खनियाधाना क्षेत्र के उन गांवों में भी औचक जांच की जरूरत है जहां अवैध बिक्री की शिकायतें सामने आती रही हैं।
लाइसेंसी शराब दुकानों के स्टॉक, बिक्री रजिस्टर, परमिट और बिलों का मिलान, ओवररेटिंग की शिकायतों की जांच तथा बिना बिल-बिना रेट लिस्ट बिक्री के आरोपों की पड़ताल की जाए तो कई सवालों के जवाब सामने आ सकते हैं। यदि शिकायतें गलत हैं तो जांच के बाद स्थिति साफ हो जाएगी और यदि सही हैं तो जिम्मेदारों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
75 पेटी शराब जब्त होना बड़ी कार्रवाई है, लेकिन इससे भी बड़ी कार्रवाई तब होगी जब विभाग उन रास्तों को बंद करेगा जिनसे शराब कथित तौर पर गांव-गांव पहुंच रही है। क्योंकि जनता का सवाल सीधा है—जब शराब बिकने की खबर आम आदमी तक पहुंच जाती है, तो आबकारी विभाग तक क्यों नहीं पहुंचती? क्या हर अवैध शराब की बिक्री के लिए शिकायत जरूरी है, या विभाग की अपनी निगरानी व्यवस्था भी कोई जिम्मेदारी रखती है?
अब देखना यह है कि 75 पेटी की यह कार्रवाई एक ढाबे की दीवारों तक सीमित रहती है या पिछोर-खनियाधाना के गांवों तक पहुंचकर उस पूरे कथित नेटवर्क की पड़ताल करती है, जिसकी चर्चा ग्रामीणों के बीच पहले से होती रही है। कार्रवाई का असली पैमाना जब्ती की पेटियां नहीं, बल्कि अवैध शराब की सप्लाई की जड़ तक पहुंचना होगा।
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