शराब के धंधे के लिए खाकी को कुचलने का दुस्साहस! दिलीप पुरी की मौत ने खोली तस्करी की परतें, हरदा से गुजरात तक फैला था नेटवर्क, आबकारी निगरानी पर भी सवाल

1800 लीटर से अधिक शराब, ट्रक में बने गुप्त चैंबर, एस्कॉर्ट गाड़ियां और लाइसेंसी दुकानों से कथित सप्लाई। 2 नवंबर की अलसुबह थाना प्रभारी दिलीप पुरी की जान गई तो जांच में ऐसा नेटवर्क सामने आया, जिसकी कड़ियां कई जिलों और गुजरात तक जुड़ती दिखाई दीं। अब सवाल है कि शराब का यह कारोबार किस व्यवस्था के भरोसे फलता रहा?
शिवपुरी /देवास। मध्यप्रदेश में शराब की तस्करी रोकने निकले थाना प्रभारी दिलीप पुरी को शायद अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि जिस ट्रक की जांच के लिए वह आगे बढ़ रहे हैं, वही उनकी जिंदगी का आखिरी पड़ाव बन जाएगा। 2 नवंबर 2026 की अलसुबह करीब 1:30 बजे देवास जिले के खातेगांव क्षेत्र में इंदौर-बैतूल मार्ग पर सैंडलपुर फाटे के पास हुई घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। पुलिस के मुताबिक अवैध शराब से भरे ट्रक को रोकने की कोशिश के दौरान चालक ने वाहन दौड़ा दिया। ट्रक के पिछले पहिए की चपेट में आने से थाना प्रभारी दिलीप पुरी की मौत हो गई, जबकि आरक्षक सोहन जाट घायल हुए।
ट्रक की तलाशी हुई तो उसके भीतर छिपाकर रखी गई 1800 लीटर से अधिक शराब बरामद हुई। वाहन में विशेष गुप्त चैंबर बनाए गए थे और पुलिस जांच में एस्कॉर्ट गाड़ियों के इस्तेमाल की बात भी सामने आई। यानी यह केवल कुछ पेटियों को चोरी-छिपे ले जाने का मामला नहीं था। शराब कहां से निकलनी है, किस रास्ते से गुजरना है और कहां पहुंचानी है, इसकी बाकायदा व्यवस्था होने के संकेत मिले।
जांच की कड़ी हरदा जिले के टिमरनी तक पहुंची। पुलिस के अनुसार शराब की खेप लाइसेंसी दुकानों से जुड़ी थी और इसे गुजरात पहुंचाया जाना था, जहां शराबबंदी लागू है। यहां सबसे बड़ा सवाल आबकारी विभाग की निगरानी पर खड़ा होता है। दुकानें लाइसेंसी, स्टॉक का हिसाब सरकारी रिकॉर्ड में और शराब की खेप गुप्त चैंबरों में दूसरे राज्य की ओर रवाना! आखिर इस पूरी प्रक्रिया में विभागीय निगरानी कहां थी? क्या स्टॉक और परिवहन का मिलान नहीं हुआ या इस कारोबार के पीछे कोई ऐसा संगठित तंत्र काम कर रहा था जिसने व्यवस्था की कमजोरियों का फायदा उठाया?
मामले में हरदा की तीन शराब दुकानों के लाइसेंस निलंबित किए गए और टिमरनी के सहायक जिला आबकारी अधिकारी अमर सिंह बघेल सहित दो आबकारी आरक्षकों को निलंबित किया गया। पुलिस जांच में सात लोगों की भूमिका सामने आने की जानकारी भी दी गई है। इनमें कथित नेटवर्क के संचालक, कारोबारी, परिवहनकर्ता और राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े व्यक्ति का नाम भी आया है। पुलिस ने मुख्य आरोपी बताए गए राहुल जायसवाल सहित कई लोगों को गिरफ्तार किया है। ट्रक चालक गजेंद्र उर्फ अक्कू रावत की गिरफ्तारी की भी बाद की रिपोर्टों में पुष्टि हुई है। बाकी आरोपियों और फरार लोगों की भूमिका का फैसला जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होगा।
यहां एक तथ्य और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देवास जिले में सितंबर और अक्टूबर के दौरान जहरीली शराब से 13 लोगों की संदिग्ध मौतों के बाद प्रदेश में अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई चल रही थी। उसी जिले में तस्करी की खेप रोकने पहुंचे पुलिस अधिकारी की जान चली गई। यानी एक तरफ शराब से आम लोगों की जान जाने का मामला, दूसरी तरफ उसी अवैध कारोबार को रोकने वाले अधिकारी की मौत। यह स्थिति प्रशासन और आबकारी व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दिलीप पुरी के परिवार को एक करोड़ रुपये की सहायता और पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति के तहत उपनिरीक्षक बनाने की घोषणा की है। पुलिस ने भी पूरे नेटवर्क पर कार्रवाई तेज की है। लेकिन इस मामले की असली सफलता तब मानी जाएगी जब शराब की सप्लाई से लेकर पैसा लगाने वालों और अंतिम खरीदार तक हर कड़ी का हिसाब सामने आए। लाइसेंसी दुकानों से निकले स्टॉक का मिलान हो, परिवहन के दस्तावेज जांचे जाएं और यदि किसी अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति की मिलीभगत प्रमाणित होती है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई हो।
दिलीप पुरी की शहादत को केवल श्रद्धांजलि और मुआवजे तक सीमित नहीं किया जा सकता। जिस तस्करी को रोकने के लिए उन्होंने अपनी जान गंवाई, उस कारोबार की जड़ें यदि नहीं उखाड़ी गईं तो कार्रवाई अधूरी रह जाएगी। पुलिसकर्मी सड़क पर अपराधियों से मुकाबला करते हैं, लेकिन उनके पीछे एक ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए जो उन्हें सुरक्षा, सूचना और संसाधन उपलब्ध कराए। आबकारी विभाग की जवाबदेही भी इसी कसौटी पर तय होनी चाहिए।
अब प्रदेश को एक ट्रक, एक चालक और कुछ गिरफ्तारियों से आगे का जवाब चाहिए। शराब किसने उपलब्ध कराई, किसने रास्ता बनाया, किसने स्टॉक का हिसाब संभाला और किसकी निगरानी में इतनी बड़ी खेप राज्य की सीमा पार करने निकली? इन सवालों की तह तक पहुंचना ही दिलीप पुरी की शहादत का वास्तविक सम्मान होगा। खाकी की जान की कीमत केवल घोषणाओं से नहीं, अपराध के पूरे नेटवर्क को कानून के सामने लाने से चुकाई जा सकती है।
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