रामलीला मैदान में विपक्ष ने फूंका चुनावी बिगुल, भाजपा ने भी संभाला मोर्चा; वोट की लड़ाई में आमने-सामने आए सियासत के दिग्गज

राहुल गांधी, खरगे, ममता, अखिलेश और तेजस्वी ने एक मंच से चुनाव आयोग को घेरा, CEC के इस्तीफे की मांग; भाजपा ने रैली को बताया राजनीतिक दिखावा, SIR को लेकर देशभर में तेज हुई सियासी खींचतान
नई दिल्ली।दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को विपक्ष की जुटी भीड़ से ज्यादा चर्चा उस राजनीतिक संदेश की रही, जिसे लेकर कांग्रेस और उसके सहयोगी दल दिल्ली पहुंचे थे। मंच पर राहुल गांधी थे तो उनके साथ मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जैसे नेता भी मौजूद थे। मुद्दा था वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), लेकिन निशाना सीधे चुनाव आयोग और केंद्र की भाजपा सरकार पर था। विपक्ष ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए साफ कर दिया कि वह इस मुद्दे को आसानी से छोड़ने वाला नहीं है।
‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ नाम से आयोजित इस रैली में विपक्ष ने चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर अपनी चिंता सामने रखी। खास बात यह रही कि अलग-अलग राज्यों में भाजपा से मुकाबला कर रहे दल एक मंच पर दिखाई दिए। यह केवल कांग्रेस का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि INDIA गठबंधन के उन नेताओं का साझा प्रदर्शन था, जिनके बीच कई मुद्दों पर मतभेद भी रहे हैं।
राहुल के निशाने पर मोदी-शाह, चुनाव आयोग पर लगाए गंभीर आरोप
राहुल गांधी ने अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को सीधे निशाने पर लिया। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है। राहुल ने कहा कि ज्ञानेश कुमार को पद से हटाया जाएगा और उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि वोट चोरी के आरोपों को लेकर आगे कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी।
कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने भी कहा कि जब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त पद पर बने रहेंगे, विपक्ष का विरोध जारी रहेगा। विपक्ष की मांग केवल SIR पर सफाई तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने चुनाव आयोग की जवाबदेही और नेतृत्व पर भी सवाल खड़े किए।
ममता-अखिलेश की मौजूदगी के पीछे भी है बड़ी राजनीति
इस रैली में ममता बनर्जी और अखिलेश यादव की मौजूदगी को सामान्य गठबंधन की औपचारिकता मानना ठीक नहीं होगा। पश्चिम बंगाल में ममता और उत्तर प्रदेश में अखिलेश भाजपा के सामने अपनी अलग राजनीतिक ताकत रखते हैं। बिहार से तेजस्वी यादव की मौजूदगी ने इस मंच को और व्यापक बनाया। फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, सुप्रिया सुले, डी. राजा और अन्य विपक्षी नेताओं ने भी इसमें भाग लिया। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की मौजूदगी ने इसे कई राज्यों के नेतृत्व का साझा आयोजन बना दिया।
राजनीतिक रूप से कांग्रेस के लिए यह जरूरी है कि वह क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर चले। वहीं क्षेत्रीय नेताओं के लिए भी राष्ट्रीय मुद्दों पर एक साझा मंच उपयोगी है। लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब चुनाव में सीटों का बंटवारा होगा और नेतृत्व को लेकर फैसले लेने पड़ेंगे। रामलीला मैदान में एक साथ खड़े होना आसान है, राज्यों में एक-दूसरे के राजनीतिक हितों को जगह देना उतना आसान नहीं।
भाजपा ने भी छोड़ी नहीं कोई कसर, भीड़ और आयोजन पर ही उठाए सवाल
विपक्ष की रैली के जवाब में भाजपा ने भी अपनी राजनीतिक गतिविधियां तेज रखीं। हरियाणा के रोहतक में भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने जवाबी सभा की, जबकि फरीदाबाद समेत अन्य स्थानों पर ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ के नाम से पदयात्राएं आयोजित की गईं। भाजपा नेताओं ने विपक्ष पर लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास फैलाने का आरोप लगाया।
रैली के बाद भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने राहुल गांधी के भाषण और भीड़ के दावों पर तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने दस लाख लोगों के आने की उम्मीद जताई थी, जबकि मैदान में बड़ी संख्या में कुर्सियां खाली थीं। भाजपा ने इसे विपक्ष के शक्ति प्रदर्शन की असफलता बताया। दूसरी ओर विपक्ष ने इसे जनता की आवाज और लोकतंत्र बचाने का अभियान बताया।
भाजपा ने रैली की तारीख को 1984 के सिख विरोधी दंगों की बरसी से जोड़कर भी कांग्रेस पर निशाना साधा। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी सहित भाजपा नेताओं ने आयोजन के समय पर सवाल उठाए। कांग्रेस ने इन आरोपों का विरोध किया। इस तरह SIR के मुद्दे के साथ 1984 का विवाद भी राजनीतिक बहस में शामिल हो गया।
SIR पर असली विवाद क्या है?
SIR यानी मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण। चुनाव आयोग के अनुसार इसका उद्देश्य मृत, स्थानांतरित, दोहरे और अपात्र मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को दुरुस्त करना है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम भी हटाए जा रहे हैं। इसी को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध हुआ है।
विपक्ष ने 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने का मुद्दा उठाया है। हालांकि हटाए गए सभी नामों को पात्र मतदाताओं का नाम कटना बताना सही नहीं होगा। चुनाव आयोग का पक्ष है कि सूची की सफाई जरूरी है और पात्र मतदाता निर्धारित प्रक्रिया से अपना नाम जुड़वा सकते हैं। यही वह विषय है जिस पर विपक्ष पारदर्शिता और जवाबदेही मांग रहा है, जबकि भाजपा आयोग की प्रक्रिया का समर्थन कर रही है।
2029 की तैयारी या अपनी-अपनी जमीन बचाने की कोशिश?
रामलीला मैदान की रैली को आने वाले लोकसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है। कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह विपक्षी राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत करे। ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के सामने अपने राज्यों में राजनीतिक पकड़ बनाए रखने के साथ राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव बढ़ाने का सवाल है। ऐसे में SIR ऐसा मुद्दा बन सकता है, जिस पर अलग-अलग दल कुछ समय तक एक साथ चल सकें।
दूसरी ओर भाजपा भी समझती है कि मतदाता सूची का विवाद लंबा चला तो यह चुनावी राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है। इसलिए पार्टी इसे प्रशासनिक प्रक्रिया बताकर विपक्ष के आरोपों का जवाब दे रही है। लेकिन केवल विपक्ष को घेरने से काम नहीं चलेगा। चुनाव आयोग को भी नाम जुड़ने, कटने और आपत्तियों के निस्तारण से जुड़े आंकड़े जनता के सामने स्पष्ट रखने होंगे।
रामलीला मैदान से उठी आवाज अब कितनी दूर जाएगी, यह आने वाले दिनों में तय होगा। विपक्ष ने अपनी एकजुटता दिखा दी है, भाजपा ने भी जवाबी मोर्चा खोल दिया है। लेकिन इस पूरे राजनीतिक संघर्ष में सबसे महत्वपूर्ण बात किसी पार्टी की जीत या हार नहीं, बल्कि आम मतदाता का वह भरोसा है, जिसके आधार पर लोकतंत्र चलता है। वोट की ताकत तभी है, जब हर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित हो।
Live Cricket Info








