₹2208 करोड़ की लोअर उर परियोजना: नौ साल में नहर से ज्यादा उलझा जमीन और भुगतान का हिसाब, ₹5.10 करोड़ की अनियमितता पर FIR फिर भी कई सवाल बाकी

बिभागीय निष्क्रियता के चलते आज भी मुआब्जे को भटक रहे किसान जमीन छीनी मुआब्ज़ा भी आज तक नहीं :-
31 गांव, 4299 किसान और 239.99 हेक्टेयर जमीन से शुरू हुई परियोजना में मुआवजे के 97 देयकों की जांच; कंप्यूटर ऑपरेटर की भूमिका पर सरकारी रिकॉर्ड और कंपनी के कथित न्यायालयीन जवाब में विरोधाभास, जमीन के रकबे से लेकर पाइप-स्टील के भुगतान तक सवाल
शिवपुरी ब्यूरो। लोअर उर वृहद सिंचाई परियोजना को मंजूरी मिले करीब नौ साल हो चुके हैं। 25 अप्रैल 2017 को ₹2208.03 करोड़ की प्रशासनिक स्वीकृति मिली और 27 अगस्त 2018 से नहर निर्माण शुरू हुआ। परियोजना का उद्देश्य पिछोर-खनियाधाना क्षेत्र सहित संबंधित इलाकों की कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा से जोड़ना था। लेकिन 2017 से 2026 तक की फाइलें देखने पर कहानी केवल बांध और नहर बनाने की नहीं रह जाती। जमीन अधिग्रहण, किसानों के मुआवजे, भुगतान की प्रक्रिया, पाइप-स्टील की खरीद, निर्माण गुणवत्ता और अधिकारियों की निगरानी—हर स्तर पर अलग-अलग समय में सवाल उठे। आज भी नहर का काम पूरा नहीं हुआ है और सरकारी रिकॉर्ड में जून 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य दर्ज है।

परियोजना के लिए 31 गांवों के 4299 किसानों की 239.99 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहण के दायरे में आई। नहर के लिए ₹44.29 करोड़ मुआवजा स्वीकृत हुआ। 10 जुलाई 2024 को विधानसभा में दिए गए लिखित जवाब के अनुसार 3183 किसानों को ₹34,55,77,383 का भुगतान हो चुका था, जबकि 1116 किसानों की ₹9,73,44,761 राशि लंबित थी। यही वह हिस्सा है जहां से मामला गंभीर हुआ। 1 जनवरी 2019 से 31 मई 2023 तक के 97 भुगतान देयकों की जांच कराई गई और जांच में ₹5,10,71,616 की अनियमितता सामने आने की जानकारी सरकार ने विधानसभा में दी। इसके बाद अपराध क्रमांक 375/2024 में प्रकरण दर्ज हुआ। दो भू-अर्जन शाखा कर्मचारियों को निलंबित किया गया और तत्कालीन आहरण-वितरण अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। सरकारी जवाब में पुलिस कार्रवाई और आरोपियों की गिरफ्तारी का भी उल्लेख है। अंतिम दोष तय होना न्यायालय की प्रक्रिया का विषय है।
एक कंप्यूटर ऑपरेटर के सिर पर कितना बोझ और विभाग की जिम्मेदारी कहां?
इस पूरे मामले का शायद सबसे महत्वपूर्ण और कम चर्चा में आया पहलू कंप्यूटर ऑपरेटर रूपसिंह परिहार की भूमिका है। विधानसभा के आधिकारिक जवाब में पुलिस अधीक्षक की 21 जून 2024 की रिपोर्ट के हवाले से रूपसिंह परिहार को “प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटर, मंटेना कंपनी, पिछोर” बताया गया है। उसी सरकारी जवाब में उसे शासकीय कर्मचारी नहीं बताया गया है। दूसरी ओर उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट में पुलिस जांच के हवाले से कहा गया कि वह मंटेना में कंप्यूटर ऑपरेटर था और भू-अर्जन भुगतान से संबंधित दस्तावेज तैयार कर भू-अर्जन शाखा को भेजता था।
लेकिन यदि मंटेना कंपनी ने न्यायालय के समक्ष लिखित जवाब में यह कहा है कि रूपसिंह परिहार कंपनी में पदस्थ ही नहीं था, तो यह मामूली विरोधाभास नहीं है। यहां सवाल सिर्फ रूपसिंह का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जिसने उसके बनाए या भेजे गए दस्तावेजों को सरकारी भुगतान की प्रक्रिया में आगे बढ़ाया। वह वास्तव में किसके अधीन काम करता था? उसे भू-अर्जन से जुड़े दस्तावेज तैयार करने का अधिकार किसने दिया? विभागीय अधिकारी उसके दस्तावेज किस आधार पर स्वीकार कर रहे थे? भुगतान से पहले किसान का नाम, खसरा, रकबा, अवार्ड और बैंक खाता किसने सत्यापित किया? अगर वह मंटेना का कर्मचारी था तो कंपनी का रिकॉर्ड क्या कहता है और अगर वह कंपनी का कर्मचारी नहीं था तो विभागीय रिकॉर्ड में उसे मंटेना का कंप्यूटर ऑपरेटर किस आधार पर लिखा गया? इन दोनों दस्तावेजों का आमना-सामना किए बिना जिम्मेदारी तय करना अधूरा रहेगा।
और यहीं विभाग की जिम्मेदारी का सवाल सामने आता है। किसी निजी या संविदा व्यवस्था में काम करने वाले कंप्यूटर ऑपरेटर के स्तर पर दस्तावेज तैयार होना एक बात है, लेकिन उन दस्तावेजों के आधार पर सरकारी खजाने से भुगतान होना दूसरी बात। अंतिम भुगतान सरकारी तंत्र से हुआ। इसलिए यह देखना जरूरी है कि बिल किसने तैयार किया, किसने जांचा, किसने प्रमाणित किया, किसने स्वीकृत किया और किस अधिकारी ने भुगतान की प्रक्रिया पूरी कराई। केवल उस व्यक्ति को पकड़ लेना जिसने कंप्यूटर पर बिल तैयार किया, पूरी प्रशासनिक जिम्मेदारी का जवाब नहीं हो सकता।
मुआवजे की गड़बड़ी सिर्फ एक फाइल तक सीमित नहीं
मुआवजा प्रकरण में जांच के दौरान 97 देयकों की जांच हुई। सरकारी जवाब में अनियमित भुगतान की जानकारी सामने आने के बाद यह सवाल स्वाभाविक है कि बाकी भू-अर्जन प्रकरणों में भी इसी तरह का मिलान कराया गया या नहीं। 4299 किसानों के नाम, उनके खसरे, अधिग्रहित रकबे, अवार्ड की राशि और बैंक खातों का मिलान यदि एक बार स्वतंत्र रूप से करा दिया जाए तो यह साफ हो सकता है कि समस्या कुछ देयकों तक सीमित थी या भुगतान व्यवस्था में कहीं और भी कमी रही।
जमीन से जुड़े कुछ मामलों में अलग शिकायतें भी सामने आई हैं। चमरौआ के सर्वे नंबर 2891/1/1 को शासकीय चरनोई भूमि बताया गया है और इस पर मुआवजा दिए जाने का सवाल उठाया गया है। कुम्हर्रा के सर्वे नंबर 554 और 555 में वास्तविक रकबे और अवार्ड में दर्ज रकबे को लेकर शिकायत है। नदनवारा के कुछ सर्वे नंबरों को स्वीकृत नहर लाइन से बाहर बताते हुए अधिग्रहण पर सवाल उठाया गया है। खैरोदा के सर्वे नंबर 244 में भी वास्तविक और अवार्ड रकबे के अंतर की शिकायत सामने आई है। इन मामलों में आरोप सही हैं या नहीं, इसका फैसला शिकायत से नहीं बल्कि मूल खसरा, नक्शा, अधिग्रहण प्रकरण, अवार्ड, भुगतान रिकॉर्ड और मौके की जांच से होगा। यही जांच अब लंबित है। कलेक्टर को दी गई शिकायत एसडीएम पिछोर को भेजे जाने के बाद भी उसका स्पष्ट परिणाम सार्वजनिक नहीं हुआ है।
2020 में ही भुगतान और सामग्री को लेकर उठ चुके थे सवाल
लोअर उर परियोजना में भुगतान को लेकर सवाल 2024 की जांच के बाद पहली बार नहीं उठे। जनवरी 2020 की एक प्रकाशित रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि परियोजना में काम की प्रगति की तुलना में मंटेना कंपनी को बड़े भुगतान किए गए और पाइप तथा स्टील की सप्लाई को लेकर भी सवाल थे। उसी रिपोर्ट में ईओडब्ल्यू के तत्कालीन महानिदेशक के हवाले से कहा गया था कि यदि बिना काम के एडवांस भुगतान हुआ है तो टेंडर की शर्तों की जांच की जाएगी। यह उस समय की मीडिया रिपोर्ट और अधिकारियों के कथित बयानों का हिस्सा है, इसे वर्तमान में सिद्ध अनियमितता मानना उचित नहीं होगा।
लेकिन आज जब मुआवजा भुगतान में ₹5.10 करोड़ से अधिक की अनियमितता का सरकारी रिकॉर्ड सामने है, तब 2020 से जुड़े भुगतान और सामग्री के सवालों को भी फिर से दस्तावेजों के साथ देखना जरूरी हो जाता है। कितने पाइप खरीदे गए? कितने साइट पर पहुंचे? स्टॉक रजिस्टर में कितने दर्ज हैं? कितने पाइप वास्तव में नहर में लगे? कितने बिलों का भुगतान हुआ? भुगतान से पहले माप पुस्तिका में क्या दर्ज था? इन सवालों का जवाब बिल, चालान, स्टॉक रजिस्टर, गेट पास और MB को मौके के काम से मिलाकर ही मिल सकता है।
कलेक्टर कार्यालय की आग ने सवाल और बढ़ा दिए
मई 2024 में कलेक्टर कार्यालय की नाजिर शाखा में आग की घटना ने भी मामले को नया मोड़ दिया। उस समय मीडिया रिपोर्टों में यह सवाल उठा कि नाजिर शाखा में लोअर उर परियोजना के भू-अर्जन रिकॉर्ड भी रखे थे। कलेक्टर की ओर से अधिकांश फाइलें सुरक्षित होने की बात कही गई और मजिस्ट्रियल जांच के आदेश की जानकारी सामने आई। बाद में इसी मामले से जुड़े पुलिस प्रकरण में रूपसिंह परिहार सहित अन्य लोगों के नाम सामने आए। इसलिए आग की घटना और मुआवजा प्रकरण के बीच क्या संबंध था, कौन-से रिकॉर्ड प्रभावित हुए और कौन-से सुरक्षित रहे—इसका आधिकारिक जांच निष्कर्ष भी सार्वजनिक होना जरूरी है।
अब अधिकारियों के कार्यकाल का भी हिसाब जरूरी
परियोजना 2017 से चल रही है। इस दौरान एसडीओ, कार्यपालन यंत्री, भू-अर्जन अधिकारी और दूसरे जिम्मेदार अधिकारियों में बदलाव हुआ। इसलिए किसी एक व्यक्ति के सिर पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी डालने के बजाय हर कार्यकाल की फाइल देखना जरूरी है। जिन अधिकारियों के समय भू-अर्जन, निर्माण, माप, बिल और भुगतान की प्रक्रिया चली, उनके कार्यकाल में किसने क्या प्रमाणित किया, यह रिकॉर्ड से सामने आना चाहिए। सवाल यह नहीं कि कौन दोषी है; सवाल यह है कि किसके हस्ताक्षर पर कौन-सा भुगतान हुआ और उस समय जांच की जिम्मेदारी किसकी थी।
आज की स्थिति क्या है?
सितंबर 2026 में परियोजना अभी भी पूरी नहीं हुई है। सरकारी जवाब में नहर का काम जून 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य बताया गया है। उधर मुआवजा वितरण में अनियमितता का मामला FIR और विभागीय कार्रवाई तक पहुंच चुका है। जमीन के कुछ मामलों की शिकायतें जांच की मांग कर रही हैं और निर्माण की गुणवत्ता तथा भुगतान से जुड़े पुराने सवालों का पूरा सार्वजनिक हिसाब अभी सामने आना बाकी है। ऐसे में अब जरूरत किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने की नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया का दस्तावेजी ऑडिट कराने की है।
एक ही जांच में पांच चीजें सामने रखी जा सकती हैं—खसरा और वास्तविक जमीन, अवार्ड और वास्तविक रकबा, लाभार्थी और बैंक खाता, ठेकेदार का बिल और मौके का काम, तथा सामग्री का स्टॉक और जमीन पर उसका उपयोग। इसके साथ कंप्यूटर ऑपरेटर की वास्तविक नियुक्ति और उसके द्वारा तैयार दस्तावेजों की वैधानिक जिम्मेदारी भी साफ होनी चाहिए। अगर रिकॉर्ड सही हैं तो शिकायतों पर विराम लगेगा, और अगर रिकॉर्ड में अंतर है तो जिम्मेदारी उस स्तर तक पहुंचेगी जहां गलती हुई। ₹2208 करोड़ की परियोजना के मामले में जनता को इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए—काम का हिसाब साफ हो, जमीन का हिसाब साफ हो और सरकारी पैसे का रास्ता भी साफ दिखाई दे।
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