TET का फॉर्म या विभागीय दबाव? आखिरी तारीख से पहले शिक्षकों में उबाल

बिना स्पष्ट लिखित आदेश फॉर्म भराने की कोशिशों का विरोध, शिक्षक संगठनों ने भी उठाई आवाज—सवाल, आदेश है तो सामने क्यों नहीं?
ब्यूरो। शिवपुरी। शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET का फॉर्म भरने की आखिरी तारीख नजदीक आते-आते सरकारी स्कूलों में परीक्षा से ज्यादा उस तरीके को लेकर चर्चा शुरू हो गई है, जिस तरीके से शिक्षकों से आवेदन कराने की कोशिश की जा रही है। शिक्षकों का कहना है कि उनसे फॉर्म भरने के लिए कहा जा रहा है और कई जगह इसे लेकर दबाव भी बनाया जा रहा है। दूसरी ओर विभिन्न शिक्षक संगठनों की ओर से भी इसका विरोध सामने आने की बात कही जा रही है। ऐसे में मामला अब सिर्फ एक परीक्षा के आवेदन का नहीं रहा, बल्कि सीधे-सीधे इस सवाल पर आ खड़ा हुआ है कि आखिर शिक्षकों से फॉर्म भरवाने का लिखित आदेश है कहां?
शिक्षकों की आपत्ति TET शब्द से नहीं, बल्कि प्रक्रिया को लेकर है। उनका कहना है कि यदि शासन अथवा सक्षम विभाग ने शिक्षकों के लिए आवेदन अनिवार्य किया है तो उसका स्पष्ट आदेश शिक्षकों के सामने रखा जाए। आदेश में क्रमांक क्या है, तारीख क्या है और किस सक्षम अधिकारी ने जारी किया है—यह सब साफ होना चाहिए। आखिर सरकारी कर्मचारी से उसकी सेवा और भविष्य से जुड़ा कोई कदम उठाने के लिए कहा जा रहा है तो केवल मौखिक निर्देशों के भरोसे पूरी कवायद क्यों?
यही सवाल अब शिक्षक संगठनों के विरोध को भी धार दे रहा है। अलग-अलग शिक्षक संगठन अपने-अपने स्तर पर TET को लेकर आपत्ति दर्ज करा रहे हैं और शिक्षकों से फॉर्म भरने के लिए बनाए जा रहे कथित दबाव पर सवाल उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि विभाग के पास स्पष्ट नियम और आदेश है तो उसे छिपाने या मौखिक रूप से चलाने की जरूरत ही क्या है? एक कागज सामने रखिए और पूरी स्थिति साफ हो जाएगी। लेकिन जब आदेश दिखाए बिना केवल निर्देश दिए जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े होते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि यदि कोई शिक्षक फॉर्म नहीं भरता तो उसके खिलाफ क्या होगा? क्या किसी नियम में इसके लिए कार्रवाई का प्रावधान है? क्या वेतन, उपस्थिति, सेवा पुस्तिका या पद से संबंधित किसी प्रक्रिया को TET आवेदन से जोड़ा गया है? यदि हां, तो वह प्रावधान शिक्षकों को बताया जाना चाहिए। यदि नहीं, तो फिर फॉर्म भरने के लिए दबाव किस अधिकार के तहत बनाया जा रहा है? यही वह बिंदु है जहां TET की परीक्षा पीछे छूट जाती है और सरकारी आदेश की वैधानिकता तथा प्रशासनिक अधिकार का सवाल सामने आ जाता है।
अंतिम तारीख नजदीक होने से स्थिति और संवेदनशील हो गई है। शिक्षक एक तरफ समयसीमा से जूझ रहे हैं और दूसरी तरफ संगठनों के विरोध के बीच यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर उनके लिए वास्तव में अनिवार्य क्या है। विभाग यदि चाहता है कि शिक्षक TET में शामिल हों तो उसे साफ-साफ नियम बताने चाहिए, लिखित आदेश सामने रखना चाहिए और भ्रम की स्थिति खत्म करनी चाहिए। शिक्षक को आदेश मानने में आपत्ति नहीं होती, लेकिन आदेश के नाम पर मौखिक दबाव को आदेश मान लेना भी किसी नियम का हिस्सा नहीं हो सकता।
यहां सवाल किसी अधिकारी या विभाग की छवि बनाने-बिगाड़ने का नहीं है। सवाल बेहद सीधा है—सरकारी शिक्षक से फॉर्म भरवाया जा रहा है तो उसका सरकारी आधार क्या है? यदि आदेश है तो उसे सामने आने में देर क्यों? यदि आदेश नहीं है तो दबाव क्यों? और यदि अलग-अलग शिक्षक संगठन विरोध कर रहे हैं तो उनकी आपत्तियों पर विभाग की तरफ से स्पष्ट जवाब क्या है?
TET को लेकर सरकार और विभाग की अपनी नीति हो सकती है, लेकिन उसे लागू करने का रास्ता भी उतना ही साफ होना चाहिए। क्योंकि सरकारी व्यवस्था में आदेश कागज पर होता है, हवा में नहीं।
अब आखिरी तारीख से पहले शिक्षा विभाग को यही तस्वीर साफ करनी होगी—TET का फॉर्म शिक्षकों की परीक्षा है या विभागीय दबाव की नई कसौटी? आदेश है तो सामने रखिए, नियम है तो बताइए और यदि सिर्फ मौखिक निर्देश हैं तो फिर शिक्षकों के सवालों का जवाब दीजिए।
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