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गांव-गांव शराब का बाजार, आबकारी विभाग की निगरानी बेअसर!

महिलाएं खुद पकड़ रहीं शराब बेचने वाले, विरोध के बाद भी नहीं थम रहा कारोबार; शासकीय दुकानों की संख्या, ब्रांड और रेट तक सार्वजनिक नहीं

शिवपुरी। जिले में शासकीय शराब दुकानों की व्यवस्था के समानांतर गांव-गांव शराब पहुंचने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। कहीं निजी ठिकानों से शराब मिलने की बात सामने आती है तो कहीं कमीशन पर गांवों तक शराब पहुंचाने की शिकायतें हैं। हालात यह हैं कि ग्राहक को कई जगह शासकीय दुकान तक जाने की जरूरत नहीं पड़ती। सवाल सीधा है—जब गांव में शराब आसानी से मिल रही है तो आबकारी विभाग की मैदानी निगरानी आखिर कहां है?

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सितंबर में शराब बिक्री के खिलाफ महिलाओं का आक्रोश भी कई इलाकों में सामने आया। कहीं शराब की पेटियां बाहर निकालकर नष्ट की गईं तो कहीं ग्रामीणों ने विरोध किया। 29 सितंबर को करैरा थाना क्षेत्र के समोहा गांव में महिलाओं द्वारा कथित शराब विक्रेता को पकड़ने और उसके पास मिली शराब नष्ट कर पुलिस को सौंपने की खबर सामने आई। उपलब्ध रिपोर्ट में इस घटना का उल्लेख है; व्यक्ति को खंभे से बांधने की बात की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

यह स्थिति अपने आप में विभागीय निगरानी पर सवाल खड़ा करती है। जब गांव की महिलाएं खुद शराब पकड़ रही हैं तो संबंधित आबकारी अमला वहां कब पहुंचता है—शिकायत के बाद या उससे पहले?

लाइसेंसी शराब बिक्री के लिए निर्धारित शर्तें, स्वीकृत दरें, स्टॉक और बिलिंग व्यवस्था लागू है। इसके बावजूद यदि शासकीय दुकान के बाहर शराब बिक रही है, बिना बिल बिक्री हो रही है या निर्धारित कीमत से अधिक वसूली की शिकायत है तो जांच सिर्फ अंतिम विक्रेता तक क्यों रुके? शराब वहां तक पहुंची कैसे और उसकी सप्लाई की कड़ी पर निगरानी किस स्तर पर टूटी?

उपनिरीक्षक स्तर के मैदानी अमले की सक्रियता भी जांच का विषय है। संबंधित अधिकारी अपने क्षेत्र में कितनी बार पहुंचते हैं, कितनी लाइसेंसी दुकानों का निरीक्षण करते हैं और शिकायत वाले गांवों में कितने औचक दौरे हुए—इसका रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। अवैध शराब कार्यालय में बैठकर नहीं पकड़ी जा सकती; उसके लिए गांव तक जाना पड़ेगा।

विक्रेता पकड़ा, सप्लाई लाइन तक पहुंच कब?

अगर कमीशन एजेंटों के जरिए गांवों तक शराब पहुंचने की शिकायतें सही हैं तो केवल अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति पर कार्रवाई से पूरा नेटवर्क नहीं टूटेगा। विभाग को यह पता लगाना होगा कि शराब का स्रोत क्या है, गांव तक वह किस रास्ते से पहुंच रही है और लाइसेंसी दुकानों से स्टॉक निकलने के बाद उसकी निगरानी कैसे होती है।

दूसरा बड़ा सवाल शासकीय शराब दुकानों की पारदर्शिता का है। जिले में कुल कितनी लाइसेंसी/शासकीय शराब दुकानें हैं, वे कहां-कहां हैं, किस दुकान पर कौन-कौन से ब्रांड उपलब्ध हैं और उनकी निर्धारित कीमत क्या है? आबकारी विभाग को यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।

ब्रांड और निर्धारित रेट सामने होंगे तो ग्राहक ओवररेटिंग या बिना बिल बिक्री की शिकायत अधिक ठोस तरीके से कर सकेगा। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि दुकानों पर नियमानुसार बिलिंग हो रही है या नहीं और इन दुकानों का नियमित निरीक्षण कितनी बार किया जा रहा है।

सवाल यह भी है कि जिन गांवों में बार-बार अवैध शराब की शिकायतें आती हैं, क्या विभाग ने उन्हें चिन्हित कर स्थायी निगरानी की व्यवस्था की है? कार्रवाई के बाद दोबारा उसी इलाके में शराब न बिके, इसके लिए क्या व्यवस्था है? एक-दो कार्रवाई के बाद फाइल बंद करना और लगातार निगरानी करना—दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है।

महिलाओं का लगातार सड़क पर उतरना और ग्रामीणों का खुद कथित शराब विक्रेताओं को पकड़ना बताता है कि समस्या को स्थानीय स्तर पर गंभीरता से महसूस किया जा रहा है। इसके बावजूद यदि गांवों में शराब उपलब्ध होने की शिकायतें बनी हुई हैं तो आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब प्रशासन को आबकारी विभाग से सिर्फ कार्रवाई की संख्या नहीं, बल्कि मैदानी निगरानी का हिसाब लेना चाहिए—कितने निरीक्षण हुए, कितनी लाइसेंसी दुकानों की जांच हुई, शिकायत वाले गांवों में कितने दौरे हुए, ओवररेटिंग और बिना बिल बिक्री पर कितनी कार्रवाई हुई और कार्रवाई के बाद दोबारा निगरानी कितनी की गई।

क्योंकि सवाल अब यह नहीं कि कितनी कार्रवाई हुई—सवाल यह है कि गांव-गांव शराब की उपलब्धता रुकी कितनी?

जब तक आबकारी विभाग शासकीय दुकानों की संख्या, स्थान, उपलब्ध ब्रांड और निर्धारित दरें सार्वजनिक नहीं करता और साथ ही गांवों में नियमित मैदानी निगरानी सुनिश्चित नहीं करता, तब तक अवैध शराब की बिक्री रोकने और शासकीय दुकानों पर नियम के मुताबिक बिक्री सुनिश्चित करने का दावा जमीन पर कसौटी पर रहेगा।

सरकारी दुकानें एक तरफ और गांव-गांव शराब का बाजार दूसरी तरफ—अब आबकारी विभाग को कागज नहीं, जमीन पर अपनी निगरानी दिखानी होगी।

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संजीव पुरोहित

मैं संजीव पुरोहित, शिवपुरी (मध्य प्रदेश) से हूँ और शिवपुरी मेल का चीफ एडिटर हूँ। मेरा उद्देश्य स्थानीय और जनहित से जुड़ी सच्ची, निष्पक्ष व ज़मीनी खबरें आप तक पहुँचाना है। ताज़ा अपडेट के लिए Telegram और WhatsApp पर हमारे साथ जुड़ें।

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