आज फिर झाड़ू, फिर फोटो, फिर गांधी को प्रणाम… सवाल यह कि 3 अक्टूबर को बापू कहां होंगे?”

“2 अक्टूबर को हाथ में उठी झाड़ू अगले दिन फोटो से उतरकर व्यवस्था और समाज की आदत बन जाए।”
बापू ने सत्य, अहिंसा, स्वराज और स्वच्छता को जीवन बनाया; सत्ता ने उनके नाम पर अभियान बनाए, अब सवाल धरातल का है
शिवपुरी। आज 2 अक्टूबर है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 157वीं जयंती। देशभर में बापू को श्रद्धांजलि दी जा रही है। कहीं माल्यार्पण होगा, कहीं स्वच्छता अभियान चलेगा, कहीं नेता और अधिकारी हाथ में झाड़ू लेकर तस्वीर खिंचवाते नजर आएंगे। सोशल मीडिया पर गांधी के विचारों, स्वच्छ भारत और सेवा के संदेशों की बाढ़ आएगी। लेकिन गांधी जयंती के इस शोर के बीच एक सवाल ऐसा है, जो तस्वीरों और नारों से आगे जाकर जमीन पर जवाब मांगता है—क्या गांधी के विचार हमारे जीवन, व्यवस्था और राजनीति में सिर्फ एक दिन दिखाई देते हैं या पूरे साल?
2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी ने राजनीति को केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं माना। सत्य, अहिंसा, आत्मअनुशासन, स्वदेशी, स्वावलंबन, सामाजिक समानता और जनसेवा उनके सार्वजनिक जीवन के मूल आधार रहे। दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन तक उन्होंने सत्याग्रह को संघर्ष का माध्यम बनाया और ब्रिटिश सत्ता के सामने अहिंसक जनशक्ति खड़ी की। चंपारण, असहयोग आंदोलन, दांडी मार्च और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे अध्यायों ने उन्हें केवल स्वतंत्रता आंदोलन का नेता नहीं, बल्कि जनआंदोलन की एक अलग राजनीतिक परंपरा का प्रतीक बना दिया।
गांधी के लिए स्वच्छता केवल सड़क पर झाड़ू लगाने का काम नहीं थी। सरकारी अभिलेखों में भी दर्ज है कि गांधी सार्वजनिक स्वच्छता को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे और अपने आदर्श गांव की कल्पना साफ गलियों और बेहतर स्वच्छता व्यवस्था के साथ करते थे।
यही कारण है कि आज केंद्र की राजनीति में भी गांधी के नाम और स्वच्छता के संदेश का बड़ा स्थान है। 2 अक्टूबर 2014 को केंद्र सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन शुरू किया था। ग्रामीण स्वच्छता अभियान का घोषित लक्ष्य केवल शौचालय बनाना नहीं, बल्कि व्यवहार परिवर्तन, स्वच्छता और ठोस-तरल कचरा प्रबंधन को आगे बढ़ाना था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण स्वच्छता कवरेज 2014 के 39 प्रतिशत से बढ़कर 2019 में 100 प्रतिशत दर्ज की गई और इसके बाद मिशन के दूसरे चरण में ओडीएफ प्लस तथा कचरा प्रबंधन पर जोर दिया गया।
लेकिन यहीं से गांधी जयंती का असली सवाल शुरू होता है।
अगर स्वच्छता केवल अभियान है तो अभियान खत्म होते ही गंदगी क्यों लौट आती है? अगर स्वच्छता संस्कार है तो सार्वजनिक स्थानों पर कचरा कौन फेंक रहा है? नालियों में गंदगी, सड़कों के किनारे कचरे के ढेर, प्लास्टिक का बेतरतीब इस्तेमाल और कचरा प्रबंधन की कमजोरियां आखिर किसकी जिम्मेदारी हैं? और सबसे बड़ा सवाल—क्या झाड़ू हाथ में लेने से स्वच्छता आती है या व्यवस्था को रोज ईमानदारी से चलाने से?
आज केंद्र से लेकर राज्यों और स्थानीय निकायों तक स्वच्छता को लेकर योजनाएं, अभियान और बजट मौजूद हैं। 2026 में भी केंद्र सरकार का स्वच्छता अभियान केवल एक दिन की गतिविधि नहीं, बल्कि निरंतर व्यवहार परिवर्तन और नागरिक भागीदारी पर जोर दे रहा है।
फिर तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखना जरूरी है।
गांधी का चश्मा स्वच्छ भारत मिशन का प्रतीक बन गया, लेकिन क्या वह चश्मा व्यवस्था की कमियां भी देख रहा है?
आज 2 अक्टूबर को झाड़ू लेकर फोटो खिंचवाना आसान है। असली परीक्षा तब है जब कैमरा सामने न हो। जब अधिकारी रोज सफाई व्यवस्था की समीक्षा करें। जब नगर निकाय कचरा उठाने की व्यवस्था को नियमित रखें। जब नागरिक सड़क को अपना घर समझें। जब जनप्रतिनिधि केवल अभियान में नहीं, पूरे साल अपने क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं के लिए जवाबदेह रहें। और जब प्रशासनिक व्यवस्था में स्वच्छता को कार्यक्रम नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिम्मेदारी माना जाए।
गांधी ने जिस ‘स्वराज’ की बात की थी, उसका अर्थ केवल अंग्रेजों से आजादी नहीं था। उसमें व्यक्ति के आत्मअनुशासन से लेकर समाज की जिम्मेदारी और शासन की जवाबदेही तक का भाव जुड़ा था। इसलिए आज गांधी को याद करने का अर्थ केवल उनकी प्रतिमा पर फूल चढ़ाना नहीं, बल्कि यह देखना भी है कि सत्य कितना बचा है, सार्वजनिक जीवन में सेवा का भाव कितना बचा है और व्यवस्था में जवाबदेही कितनी दिखाई देती है।
राजनीतिक सत्ता चाहे केंद्र की हो या मध्यप्रदेश की—गांधी का नाम सभी के लिए सम्मान का विषय है। लेकिन गांधी का सम्मान केवल भाषणों में नहीं, नीतियों के धरातलीय असर, प्रशासन की कार्यप्रणाली और नागरिकों के व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।
आज नेता झाड़ू उठाएं, अधिकारी श्रमदान करें और नागरिक स्वच्छता अभियान में शामिल हों—यह अच्छी तस्वीर है। मगर गांधी की कसौटी तस्वीर के अगले फ्रेम में है।
क्या 3 अक्टूबर को भी वही झाड़ू चलेगी?
क्या 4 अक्टूबर को भी वही स्वच्छता रहेगी?
क्या 5 अक्टूबर को भी व्यवस्था उतनी ही सक्रिय रहेगी?
क्योंकि अगर जवाब ‘नहीं’ है तो फिर सवाल झाड़ू का नहीं, नियत और व्यवस्था के स्थायी संस्कार का है।
गांधी जयंती हर साल आती है। गांधी के विचार भी हर साल दोहराए जाते हैं। मगर बापू की असली जरूरत उस एक दिन नहीं, उन 364 दिनों में है जब कोई कैमरा नहीं होता, कोई मंच नहीं होता और कोई माला चढ़ाने वाला सामने नहीं होता।
शायद गांधी को इससे बड़ी श्रद्धांजलि और कोई नहीं होगी कि 2 अक्टूबर को हाथ में उठी झाड़ू अगले दिन फोटो से उतरकर व्यवस्था और समाज की आदत बन जाए।
Live Cricket Info








