आबकारी विभाग के कर्णधार राहुल गुप्ता पर उठते सवाल :——

अवैध शराब के तांडव के बाद भी निगरानी तंत्र की व्यस्था पर बड़ा सवाल, एक अधिकारी के पास तीन बड़े मोर्चो की जिम्मेदारी आखिर क्यों?
शिवपुरी। शिवपुरी जिले में अवैध शराब को लेकर पिछले दिनों जो तांडव सामने आया, उसने पूरे जिले को हिलाकर रख दिया। कार्रवाई हुई, जिला प्रशासन को मैदान में उतरना पड़ा और हालात संभाले गए, यह अच्छी बात है। लेकिन इसके बाद सबसे बड़ा सवाल वहीं खड़ा है—आखिर जिस आबकारी विभाग की जिम्मेदारी ही अवैध शराब को रोकना है, उसके रहते हालात इतने बिगड़ने तक विभाग की निगरानी व्यस्था कहां थी? जिन-जिन क्षेत्रों में विरोध के स्वर मुखर हुए, वहां पदस्थ आबकारी उप निरीक्षक क्या लगातार अपने क्षेत्र में भ्रमण और चेकिंग कर रहे थे? क्योंकि अगर अधिकारी छह दिन लगातार अपने क्षेत्र में घूमे तो वहां की छोटी-बड़ी गतिविधियां उनकी नजर में रहेंगी और अवैध शराब का कारोबार तांडव का रूप लेने से पहले ही नियंत्रित किया जा सकता है। फिर सवाल यह है कि अगर सतत निगरानी हो रही थी तो हालात यहां तक पहुंचे कैसे और अगर निगरानी नहीं हो रही थी तो फिर जिम्मेदारी किसकी है? शराब तांडव के बाद आबकारी महकमे मे जिम्मेदार अधिकारियों जिन जिनके छेत्र मे तांडव होकर बिभाग की छवि धूमिल हुई उन पर क्या कार्रवाहिया की गयी या बरिष्ठ कार्यालय को भेजी गयी कारवाही की रिपोर्ट ?
इसी बीच आबकारी विभाग में जिला अबकारी अधिकारी के खसमखाश माने जाने वाले आबकारी उप नीरीक्षक राहुल गुप्ता की जिम्मेदारियां भी सवालों के घेरे में नहीं बल्कि सवालों के सामने जरूर खड़ी दिखाई देती हैं। बताया जा रहा है कि उनके पास शिवपुरी, पिछोर-खनियांधाना और आबकारी वेयरहाउस जैसी तीन महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। शिवपुरी जिले का मुख्य और बड़ा क्षेत्र, पिछोर-खनियांधाना जैसा बड़ा क्षेत्र और तीसरी ओर आबकारी वेयरहाउस, जो पहले भी विवादों में रह चुका है और जहां से माल चोरी होने जैसी खबरें सामने आ चुकी हैं तथा जांच भी हुई। ऐसे में सवाल किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, व्यवस्था से है—एक अधिकारी एक साथ तीन बड़े मोर्चों पर आखिर कितनी सतत निगरानी कर पाएगा? क्या वह तीनों जगह छह दिन लगातार पहुंच सकता है? अगर नहीं, तो फिर तीनों जगहों की जिम्मेदारी अलग-अलग अधिकारियों को देकर निगरानी मजबूत करने में दिक्कत क्या है? और अगर विभाग का मानना है कि एक अधिकारी तीनों जिम्मेदारियां बखूबी संभाल सकता है तो फिर उसका असर जमीन पर दिखाई भी देना चाहिए। अगर एक व्यक्ति तीनो बड़े छेत्र की जिम्मेदारिया बखूबी संभाल सकता है तो फिर एक साथ तीनो जगह 7 दिन कैसे उपस्थित रह पाएगा और जिन छेत्रो मे अबैध शराब को लेकर तांडव हुए उन छेत्रो मे इनके छेत्र की भी भूमिका संलिप्त रही मतलब सीधा है निगरानी व्यस्था मे भारी चूक रही निगरानी सिर्फ जिला कार्यालय और कागजो मे दिखती रही धरातल पर सुन्यता ही रही।
सबसे बड़ा सवाल तो अवैध शराब के उन ठिकानों को लेकर है जिन्हें आम आदमी तक पहचानता है। जब आम आदमी को पता है कि शराब कहां बिक रही है तो आबकारी विभाग को क्यों नहीं पता? सरकारी शराब दुकानें चिन्हित हैं, फिर उन्हीं के आसपास या दूसरे स्थानों पर शराब की अवैध बिक्री कैसे चलती रहती है? जिस जगह कार्रवाई होती है, कुछ समय बाद वहां फिर वही कारोबार शुरू होने की शिकायतें कैसे सामने आ जाती हैं? दुकानें बंद होने के बाद शराब कहां उपलब्ध है, इसकी जानकारी आम लोगों तक पहुंच जाती है, लेकिन जिम्मेदार विभाग तक क्यों नहीं पहुंचती? क्या विभाग केवल शिकायत आने के बाद कार्रवाई करेगा या अपने स्तर पर भी लगातार निगरानी करेगा? सरकारी शराब दुकानों पर कौन-कौन से ब्रांड उपलब्ध हैं और उनकी कीमत क्या है, इसकी स्पष्ट जानकारी भी उपभोक्ता को मिलनी चाहिए, लेकिन इसकी जमीनी स्थिति भी जांच का विषय है। वहीं लाइसेंसी शराब ठेकेदारों की जिम्मेदारी भी तय होना चाहिए कि उनके क्षेत्र में अवैध बिक्री आखिर किस तरह चल रही है।
हालिया घटनाक्रम में जब जिला प्रशासन को मैदान में उतरकर व्यवस्था संभालनी पड़ी तो यह भी सवाल बनता है कि क्या आबकारी विभाग की अपनी निगरानी व्यवस्था पर्याप्त थी? अब यह भी देखना जरूरी है कि जिन आबकारी उप निरीक्षकों के कार्यक्षेत्र में विरोध और अवैध शराब को लेकर हालात बिगड़े, उनके स्तर पर क्या कार्रवाई या समीक्षा हुई। क्योंकि किसी एक-दो दिन की दबिश से समस्या खत्म नहीं होगी। जरूरत इस बात की है कि अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र में लगातार दिखाई दें, संदिग्ध स्थानों की निगरानी हो, कार्रवाई के बाद दोबारा उसी जगह कारोबार शुरू न हो और शराब ठेकेदारों की जिम्मेदारी भी तय हो।
मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष की छवि खराब करना नहीं है। मुद्दा यह है कि आबकारी विभाग की जिम्मेदारी आखिर जमीन पर दिखाई क्यों नहीं दे रही? अगर एक अधिकारी को तीन बड़ी जिम्मेदारियां दी गई हैं तो तीनों क्षेत्रों में सतत निगरानी कैसे हो रही है, यह विभाग को स्पष्ट करना चाहिए। क्योंकि अवैध शराब का कारोबार तब नहीं रुकता जब तांडव हो जाए और प्रशासन मैदान में उतर आए; वह तब रुकता है जब विभाग तांडव होने से पहले मैदान में मौजूद हो। अब शिवपुरी में आबकारी विभाग को कुर्सी से नहीं, अपने-अपने कार्यक्षेत्र में दिखाई देना होगा—तभी धूमिल होती छवि पर भरोसे की परत चढ़ सकेगी नाही तो हमेशा की तरह एक दो कार्रवाही करके फिर वाही गोरख धंधा शुरु होता रहेगा क्युकी जब तक जिला आबकारी अधिकारी सभी इप नीरीक्षकों को प्रथक प्रथक छेत्र बांटकर उन्हे छेत्र मे सतत निगरानी के लिए बाध्य नाही करेंगे तब तक धरातल पर अबैध शराब का बजार युही सजता रहेगा क्युकी निगरानी व्यस्था वाले अधिकारी कागजो मे आंकड़े भरते रहेंगे जमीनी स्तर पर अबैध शराब का कारोबार अपनी जड़े मजबूत करता रहेगा अभी भी समय है मनपसंद अधिकारिओ से मोह त्याग कर छेत्र मे जिम्मेदारी सौोई जाए और एक हि व्यक्ति को अधिक जिम्मेदारिया नाही सौपी जाए जिससे जमीन पर कार्य प्रभाबित न हो सके और जनता को बिभाग के प्रति विश्वास वैदा हो सके।
*कॉपी पेष्टर दूरी बनाये :-*
*क्रमश:—*
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