बिजली चोरी का आरोप अदालत में हुआ ‘फेल’, हजरत पाल बरी

धारा 135 का मामला नहीं हुआ साबित; विशेष न्यायालय ने साक्ष्यों की पड़ताल के बाद किया दोषमुक्त, जितेन्द्र समाधिया की पैरवी रही अहम
शिवपुरी। बिजली चोरी के आरोप में विद्युत विभाग द्वारा दर्ज कराया गया मामला विशेष न्यायालय में उस वक्त कमजोर पड़ गया, जब अदालत ने अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को आरोपी के विरुद्ध आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं माना। ग्राम राई निवासी हजरत पाल को विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 135 के आरोप से दोषमुक्त कर दिया गया।
मामले में आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जितेन्द्र समाधिया ने पैरवी की। गवाहों की जिरह से लेकर अंतिम बहस तक बचाव पक्ष ने अभियोजन के मामले को चुनौती दी और न्याय दृष्टांत भी न्यायालय के समक्ष रखे।
विभाग ने चेकिंग बताई, अदालत ने साक्ष्यों को परखा
प्रकरण के अनुसार विद्युत विभाग के डीजीएम सुबोध द्वारा लाइनमैन के साथ ग्राम राई में चेकिंग की कार्रवाई दर्शाते हुए हजरत पाल के विरुद्ध विद्युत चोरी का मामला दर्ज कराया गया था। इसके बाद धारा 135 के तहत परिवाद विशेष न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
मामला गंभीर था, लेकिन अदालत में आरोपों की अगली कसौटी साक्ष्य थे।
गवाही हुई तो बचाव पक्ष ने पूछे सवाल, जिरह में खुली परतें
सुनवाई के दौरान अभियोजन की ओर से प्रस्तुत साक्षियों के बयान हुए। आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जितेन्द्र समाधिया ने साक्षियों का प्रतिपरीक्षण करते हुए अभियोजन के दावों और उपलब्ध साक्ष्यों पर सवाल उठाए।
अंतिम तर्कों के दौरान बचाव पक्ष ने न्यायालय के समक्ष प्रासंगिक न्याय दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए कहा कि केवल आरोप या विभागीय कार्रवाई अपने आप में अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
अदालत का फैसला—‘युक्तियुक्त संदेह से परे’ साबित नहीं हुआ मामला
पूरे प्रकरण की विवेचना और प्रस्तुत साक्ष्यों के परीक्षण के बाद विशेष न्यायालय ने पाया कि परिवादी का परिवाद आरोपी के विरुद्ध युक्तियुक्त संदेह से परे प्रमाणित नहीं होता। इसी आधार पर अदालत ने हजरत पाल को विद्युत अधिनियम की धारा 135 के आरोप से दोषमुक्त कर दिया।
अब सवाल विभागीय कार्रवाई पर नहीं, साक्ष्य की मजबूती पर
अदालत के इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि बिजली चोरी जैसे गंभीर आरोपों में भी न्यायालय के सामने ठोस, विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य जरूरी हैं। इस मामले में अभियोजन आरोप को उस स्तर तक प्रमाणित नहीं कर सका, जिसके आधार पर दोषसिद्धि की जा सके।
हजरत पाल की ओर से पूरे प्रकरण में वरिष्ठ अधिवक्ता जितेन्द्र समाधिया ने पैरवी की।
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