Telegram Join our Telegram Channel for Daily Latest News Updates! Join Now ×

कलेक्टर ही हर फरियाद सुनेंगे तो तहसीलों में बैठे अफसर किसलिए? जनसुनवाई में बुजुर्ग की मौत ने खोल दी जवाबदेही की परतें

शिवपुरी। कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में 70 वर्षीय बादल सिंह यादव की मौत ने प्रशासनिक व्यवस्था के सामने सिर्फ एक संवेदनशील सवाल नहीं, बल्कि जवाबदेही का बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि जब जिले की हर छोटी-बड़ी समस्या लेकर जनता को आखिरकार कलेक्टर की जनसुनवाई में ही पहुंचना पड़ रहा है, तो फिर तहसील स्तर पर बैठे अधिकारियों की जिम्मेदारी आखिर क्या है?

बादल सिंह यादव ग्राम सड़बूड़, तहसील बदरवास से अपनी पत्नी के उज्ज्वला गैस कनेक्शन को कोलारस से बदरवास स्थानांतरित कराने की समस्या लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे थे। उन्हें टोकन नंबर 32 मिला, लेकिन अपनी बारी आने से पहले ही उनकी तबीयत बिगड़ गई और उनकी मौत हो गई। मौत का वास्तविक कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद स्पष्ट होगा, इसलिए इसे प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन यह घटना उस व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़ा करती है, जिसमें एक बुजुर्ग को अपनी समस्या के लिए जिला मुख्यालय तक आना पड़ा।

WhatsApp Channel Join Now
Telegram Channel Join Now

सवाल सीधा है—यदि तहसील स्तर पर ही जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए तो फिर इतनी बड़ी संख्या में आवेदक कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में क्यों पहुंच रहे हैं? बारिश हो, भीषण गर्मी हो या आर्थिक परेशानी—दूरदराज के गांवों से लोग किराया खर्च कर घंटों सफर करके जिला मुख्यालय पहुंचते हैं। इनमें बुजुर्ग, महिलाएं और कमजोर आर्थिक स्थिति वाले लोग भी होते हैं। क्या शासन की मंशा यही है कि आम आदमी को अपनी छोटी-सी समस्या के लिए जिला मुख्यालय तक दौड़ लगानी पड़े?

और यदि हर मामले में अंतिम समाधान कलेक्टर को ही करना है, तो तहसील में एसडीएम, तहसीलदार और संबंधित विभागीय अधिकारी आखिर किस जिम्मेदारी के लिए बैठे हैं? उनके कार्यालयों का काम केवल आवेदन लेना और उसे आगे भेज देना है या फिर समस्या का समाधान करना भी उनकी जिम्मेदारी है?

यहां प्रशासन को अब एक ठोस जवाबदेही का सिस्टम बनाने पर विचार करना चाहिए। जिस तहसील से संबंधित शिकायत कलेक्टर की जनसुनवाई में पहुंचती है, पहले यह देखा जाए कि वह शिकायत तहसील स्तर पर क्यों नहीं सुलझी। यदि संबंधित अधिकारी के पास अधिकार और संसाधन होने के बावजूद मामला अनावश्यक रूप से लंबित रहा और आवेदक को जिला मुख्यालय तक आना पड़ा, तो संबंधित अधिकारी से जवाब मांगा जाए। बार-बार ऐसी शिकायतें आने पर संबंधित अधिकारी की कार्यप्रणाली की समीक्षा और नियमानुसार कार्रवाई की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती?

और इससे भी बड़ा सवाल—कलेक्टर जनसुनवाई में किसी शिकायत के निराकरण के स्पष्ट निर्देश देते हैं, फिर भी तहसील या संबंधित विभाग में उसका समाधान नहीं होता तो उसकी जवाबदेही किसकी है? क्या केवल फाइल पर कलेक्टर का आदेश लिख देने से जिम्मेदारी पूरी हो जाती है? यदि आदेश के बाद भी समस्या जस की तस रहती है तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई, इसका भी रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए।

जनसुनवाई को केवल आवेदन लेने और उन्हें संबंधित विभाग को भेजने की रस्म बनने से रोकना होगा। हर शिकायत को एक समयसीमा, जिम्मेदार अधिकारी और अंतिम निराकरण से जोड़ना होगा। जिला प्रशासन चाहे तो तहसीलवार यह भी समीक्षा कर सकता है कि किस तहसील से कितनी शिकायतें कलेक्टर की जनसुनवाई में पहुंचीं, उनमें कितनी ऐसी थीं जिनका समाधान स्थानीय स्तर पर हो सकता था और कितनी शिकायतों का कलेक्टर के निर्देश के बाद भी समय पर निराकरण नहीं हुआ।

क्योंकि अगर हर छोटी समस्या का समाधान कलेक्ट्रेट में ही होना है, तो फिर तहसील स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था जनता के लिए कितनी उपयोगी रह गई है? और यदि तहसील के अधिकारी जनता की समस्या हल करने के लिए ही नियुक्त हैं, तो फिर उनकी जवाबदेही भी उतनी ही स्पष्ट क्यों न हो?

जनता को कलेक्टर तक पहुंचने का अधिकार जरूर है, लेकिन जनता को कलेक्टर तक पहुंचने के लिए मजबूर होना प्रशासन की सफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था की समीक्षा का कारण होना चाहिए।

बादल सिंह यादव की मौत का कारण जांच और पोस्टमार्टम से स्पष्ट होगा, लेकिन उनकी मौत के बाद उठे सवालों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। अब जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें तहसील में बैठा अधिकारी यह समझे कि उसके सामने आने वाली हर फरियाद जिला मुख्यालय की सीढ़ियां चढ़ने से पहले ही न्याय पा जाए।

क्यों न ऐसी व्यवस्था बने कि जिस तहसील की शिकायत बार-बार कलेक्टर की जनसुनवाई में पहुंचे, वहां की प्रशासनिक कार्यप्रणाली की स्वतः समीक्षा हो और लापरवाही पाए जाने पर नियमानुसार संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय हो?

आखिर जनसुनवाई का मतलब कलेक्टर तक पहुंचना नहीं, बल्कि समस्या का समाधान होना है। और जब तक यह फर्क प्रशासनिक व्यवस्था में नहीं आएगा, तब तक जनसुनवाई में उमड़ती भीड़ जनता की समस्या से ज्यादा निचले स्तर की व्यवस्था की कहानी कहती रहेगी।

📢 सूचना एवं विज्ञापन हेतु निवेदन: यदि आपके क्षेत्र से जुड़ी कोई महत्वपूर्ण स्थानीय खबर, सामाजिक गतिविधि या जनहित से संबंधित जानकारी है, तो कृपया प्रकाशन के लिए हमारे न्यूज़ पोर्टल के साथ साझा करें। विज्ञापन एवं प्रचार-प्रसार हेतु भी आप हमसे संपर्क कर सकते हैं। संपर्क करने के लिए कांटेक्ट उस पेज पर जाये। धन्यवाद्!

Was this article helpful?
YesNo

Live Cricket Info

संजीव पुरोहित

मैं संजीव पुरोहित, शिवपुरी (मध्य प्रदेश) से हूँ और शिवपुरी मेल का चीफ एडिटर हूँ। मेरा उद्देश्य स्थानीय और जनहित से जुड़ी सच्ची, निष्पक्ष व ज़मीनी खबरें आप तक पहुँचाना है। ताज़ा अपडेट के लिए Telegram और WhatsApp पर हमारे साथ जुड़ें।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Back to top button
Close

Ad Blocker Detected

We rely on advertising revenue to support our journalism and keep this website running. Please consider disabling your ad blocker to continue accessing our content.