40 लाख का बधियाकरण और 13,225 डॉग बाइट! खंडवा में सवालों के घेरे में नगर निगम की पूरी व्यवस्था

खंडवा। शहर में आवारा कुत्तों का आतंक अब सिर्फ गलियों और मोहल्लों की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि नगर निगम की कार्यप्रणाली और उस पर खर्च होने वाले सरकारी धन की जवाबदेही का बड़ा सवाल बन गया है। पिछले चार वर्षों में आवारा कुत्तों के बधियाकरण अभियान पर करीब 40 लाख रुपये खर्च किए जाने का दावा है, लेकिन इसी अवधि में 13,225 लोगों के डॉग बाइट का शिकार होने के आंकड़े सामने आए हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी शहर की जनता को आवारा कुत्तों से राहत क्यों नहीं मिली? इसी सवाल को लेकर नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष दीपक मुल्लू राठौर मंगलवार को कलेक्टर कार्यालय की जनसुनवाई में एक व्यक्ति को प्रतीकात्मक रूप से कुत्ते का रूप देकर पहुंचे। प्रदर्शन का अंदाज भले ही अनोखा था, लेकिन उसके पीछे उठाया गया सवाल बेहद गंभीर है—अगर 40 लाख रुपये खर्च हुए हैं तो उसका असर शहर की सड़कों पर क्यों दिखाई नहीं देता? आखिर चार वर्षों में कितने कुत्तों का बधियाकरण किया गया, किस एजेंसी से कराया गया, प्रति कुत्ते कितना भुगतान हुआ, कुल कितनी राशि जारी हुई, काम का सत्यापन किस अधिकारी ने किया और अभियान के बाद आवारा कुत्तों की संख्या तथा डॉग बाइट के मामलों में कितनी कमी आई—इन तमाम सवालों का हिसाब अब सार्वजनिक होना चाहिए। क्योंकि सरकारी योजना की सफलता सिर्फ फाइलों में दर्ज आंकड़ों और भुगतान से तय नहीं होती, बल्कि उसका परिणाम जमीन पर दिखाई देना चाहिए। यदि आज भी बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और राहगीरों को कुत्तों के झुंड से बचकर निकलना पड़ रहा है, दोपहिया वाहन चालकों के पीछे कुत्ते दौड़ रहे हैं और हजारों लोग डॉग बाइट का शिकार हो रहे हैं, तो फिर 40 लाख रुपये के खर्च की उपयोगिता पर सवाल उठना लाजिमी है।

मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह सिर्फ आवारा कुत्तों की संख्या का नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा और सरकारी धन के इस्तेमाल की पारदर्शिता का विषय है। नगर निगम को चाहिए कि पिछले चार वर्षों के बधियाकरण अभियान का पूरा रिकॉर्ड सामने रखे—कितने कुत्ते पकड़े गए, कितने का ऑपरेशन हुआ, उनकी पहचान और निगरानी कैसे की गई, किस संस्था या एजेंसी को काम दिया गया, अनुबंध की शर्तें क्या थीं, कितनी राशि का भुगतान हुआ और भुगतान से पहले वास्तविक कार्य का सत्यापन किस स्तर पर किया गया। यदि रिकॉर्ड में सब कुछ नियमों के अनुसार है तो उसे सार्वजनिक करने में किसी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए, लेकिन यदि खर्च और वास्तविक काम में अंतर मिलता है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। नेता प्रतिपक्ष ने इसी पूरे खर्च और अभियान के परिणाम की जांच कराने की मांग की है, वहीं अधिवक्ता सुनील चंदेल ने भी मामले को नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बताते हुए प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है। जनसुनवाई में व्यक्ति का कुत्ता बनकर पहुंचना भले ही प्रतीकात्मक प्रदर्शन रहा हो, लेकिन इसने नगर निगम के सामने एक ऐसा आईना जरूर खड़ा कर दिया है जिसमें अब सिर्फ आवारा कुत्ते नहीं, पूरी व्यवस्था दिखाई दे रही है। अब खंडवा की जनता जानना चाहती है कि 40 लाख रुपये कहां खर्च हुए, कितने कुत्तों का बधियाकरण हुआ और उसके बाद भी 13,225 डॉग बाइट के मामले क्यों सामने आए? यदि अभियान सफल था तो सड़क पर उसका परिणाम क्यों नहीं दिखा और यदि परिणाम नहीं आया तो जिम्मेदारी किसकी है? जनता को अब कागजों में चलने वाला अभियान नहीं, सड़कों पर दिखाई देने वाली सुरक्षा चाहिए और 40 लाख रुपये का ऐसा हिसाब चाहिए जिसे देखकर कोई सवाल बाकी न रहे। आखिर सवाल सिर्फ पैसों का नहीं, उन हजारों लोगों की सुरक्षा का है जो रोज इन्हीं सड़कों से गुजरते हैं।
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