पत्रकारिता का नया चेहरा: कलम से ज्यादा कनेक्शन की कीमत, खबर से ज्यादा विज्ञापन का वजन!

कभी खबर से सत्ता की नींद उड़ती थी, अब खबर छापने से पहले विज्ञापन, संबंध और नाराजगी का हिसाब लगाया जाता है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ खड़ा तो है, मगर उसकी कलम कितनी स्वतंत्र है, यह विचार करने का विषय है।
व्यंग्य | आज की पत्रकारिता पर
एक दौर था जब पत्रकार खबर की तलाश में निकलता था। जेब में कुछ पैसे, हाथ में डायरी और मन में सच सामने लाने का जुनून होता था। आज दौर बदल गया है। कई जगह खबर की तलाश से पहले संपर्कों की सूची देखी जाती है। किस अधिकारी तक पहुंच है, किस नेता के साथ तस्वीर है और कौन कितना विज्ञापन दिला सकता है, यह सब पत्रकारिता की नई योग्यता बनता जा रहा है।
अब पत्रकार की पहचान खबर से नहीं, मोबाइल की गैलरी से होने लगी है!
किस मंत्री के साथ फोटो है, किस कलेक्टर के साथ सेल्फी है और किस कार्यक्रम में मंच पर जगह मिली है, यही कई लोगों के लिए पत्रकारिता का परिचय बन गया है। जनता की समस्या पर जवाब मांगने से ज्यादा अधिकारियों के साथ तस्वीर खिंचवाना उपलब्धि समझा जाने लगा है। खबर का असर कितना हुआ, यह बाद की बात है, फेसबुक पर पोस्ट कितनी चली, इसकी चिंता पहले है।
खबर की पुष्टि बाद में, ब्रेकिंग सबसे पहले चाहिए!
सोशल मीडिया ने पत्रकारिता को नई ताकत दी है, लेकिन जल्दबाजी की बीमारी भी बढ़ाई है। बिना पुष्टि की खबर, पुरानी घटना को नया बताकर परोसना, दूसरे की खबर पर अपना लोगो लगाना और किसी की पोस्ट उठाकर अपने नाम से चलाना आम होता जा रहा है। तथ्य अधूरे हों तो भी हेडलाइन धमाकेदार होनी चाहिए। आखिर पाठक को खबर पढ़ने से पहले चौंकना भी तो चाहिए!
अब प्रशासन भी सोशल मीडिया पर अपनी खबर का प्रसारक है!
एक समय था जब पत्रकार प्रशासनिक कार्रवाई की जानकारी जुटाने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाते थे। अब कई बार कार्रवाई की तस्वीरें, वीडियो और उपलब्धियों का ब्यौरा अधिकारियों के सोशल मीडिया पेज पर पहले ही पहुंच जाता है। प्रशासन अपने काम की जानकारी जनता तक पहुंचाए, यह अच्छी बात है, लेकिन जब काम से ज्यादा उसके प्रचार की चमक दिखाई देने लगे तो मूल उद्देश्य पीछे छूटने का खतरा रहता है। अब खबर की दौड़ में पत्रकार के सामने एक नई चुनौती भी है—घटना की जानकारी जुटाना ही नहीं, बल्कि प्रचार और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर भी समझना।
विज्ञापनदाता नाराज तो खबर भी बीमार!
कई जगह खबर का महत्व इस बात से तय होने लगा है कि उससे किसका नुकसान होगा और किसका विज्ञापन बंद हो सकता है। आम आदमी की शिकायत पर खबर लिखना आसान है, लेकिन मामला किसी प्रभावशाली व्यक्ति या विज्ञापनदाता का हो तो कलम की रफ्तार धीमी पड़ने लगती है। कहीं खबर दब जाती है तो कहीं उसे इतना इंतजार कराया जाता है कि मुद्दा ही खत्म हो जाता है।
कहीं खबर के नाम पर कमीशन, तो कहीं पत्रकारिता के नाम पर पीआर!
सरकारी निर्माण में गड़बड़ी हो, सड़क की गुणवत्ता खराब हो या किसी विभाग में अनियमितता की शिकायत, पत्रकार का काम उसकी तह तक जाना है। मगर कुछ जगह खबर को भी लेन-देन के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। दूसरी तरफ प्रेस नोट को बिना जांचे खबर बना देना भी आसान रास्ता बन गया है। किसी की प्रशंसा में लिखी प्रचार सामग्री और जनहित में की गई पत्रकारिता के बीच का अंतर समझना जरूरी है।
पदनामों की भरमार, जिम्मेदारी का पता नहीं!
कहीं जिला ब्यूरो प्रमुख, कहीं संभागीय प्रभारी, कहीं राष्ट्रीय संवाददाता तो कहीं विशेष प्रतिनिधि। पदनामों की लंबी फेहरिस्त है। कई बार एक ही आयोजन में इतने पदाधिकारी मिल जाते हैं कि खबर लिखने वाला ढूंढना मुश्किल हो जाता है। पद बड़ा होना बुरी बात नहीं, लेकिन उसके साथ पत्रकारिता की समझ, भाषा पर पकड़ और जनता के प्रति जवाबदेही भी होनी चाहिए।
सत्ता से नजदीकी उपलब्धि और सवाल पूछना दुश्मनी समझ लिया गया!
पत्रकार का काम किसी नेता का विरोध करना नहीं, न ही किसी अधिकारी की प्रशंसा में कसीदे पढ़ना है। उसका काम सही बात सामने रखना है। लेकिन जब पक्षधरता पेशे से बड़ी हो जाए तो जनता के सवाल पीछे छूट जाते हैं। जो सवाल पूछे वह विरोधी और जो तारीफ करे वह अपना! यही सोच लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर करती है।
इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। आज अनेक पत्रकार सीमित संसाधनों में काम कर रहे हैं। वेतन की अनिश्चितता, आर्थिक दबाव और खबरों के कारण पैदा होने वाले जोखिमों के बीच भी वे जनता की आवाज उठाते हैं। उनके पास न बड़ा कार्यालय है, न महंगी गाड़ी, लेकिन उनकी खबर से किसी जरूरतमंद को न्याय मिलता है तो वही उनकी सबसे बड़ी कमाई है।
आखिर पत्रकारिता की असली पूंजी न प्रेस कार्ड है, न पदनाम, न किसी बड़े व्यक्ति के साथ तस्वीर और न ही सोशल मीडिया के हजारों फॉलोअर। उसकी असली पूंजी जनता का भरोसा है।
बाजार में पहचान के कई रास्ते हैं, प्रचार के अनेक साधन हैं और पदनामों की भी कमी नहीं। मगर पत्रकारिता की असली पहचान आज भी उसी कलम से है, जो बिकती नहीं और जिसके शब्दों पर जनता भरोसा करती है।
क्योंकि जिस दिन पत्रकार खबर लिखने से पहले यह सोचने लगेगा कि किसका फायदा होगा और किसकी नाराजगी मोल लेनी पड़ेगी, उस दिन खबर तो छपेगी, लेकिन पत्रकारिता पीछे छूट जाएगी!
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