सागर में शराब नहीं बिकी, सिस्टम की निगरानी बिकी! 11 मौतों के बाद सबसे बड़ा सवाल—जहर गिलास तक पहुंचा कैसे?

बंडा के गांवों में मातम, अस्पतालों में जिंदगी की जंग; अवैध शराब की शिकायतों और प्रशासनिक निगरानी के बीच उठे सवाल—मौतों की जांच अब सिर्फ शराब बेचने वालों तक सीमित रही तो असली जवाब शायद फिर छूट जाएगा
सागर। एक गिलास शराब ने सागर के बंडा क्षेत्र के कई घरों में ऐसा सन्नाटा उतार दिया, जिसे कोई सरकारी मुआवजा भर नहीं सकता। शनिवार रात शराब पीने के बाद घूघर, नौराज, बराज और आसपास के गांवों में लोगों की तबीयत बिगड़ने लगी। देखते ही देखते अस्पताल पहुंचने वालों की संख्या बढ़ती गई और मौतों का सिलसिला शुरू हो गया। रविवार तक प्रशासन ने 11 मौतों की पुष्टि की। बड़ी संख्या में लोग अस्पतालों में उपचाररत हैं, जिनमें कुछ की हालत गंभीर बताई गई।
यह सिर्फ जहरीली शराब से हुई मौतों की खबर नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसके पास शराब की बिक्री और अवैध शराब पर निगरानी रखने का जिम्मा है। इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि शराब में जहर किसने मिलाया? सबसे बड़ा सवाल है—वह जहर लोगों के गिलास तक पहुंचा कैसे?
मौत के बाद पूरा सिस्टम मैदान में, पहले निगरानी कहां थी?
घटना सामने आते ही पुलिस, प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की टीमें गांवों में पहुंचीं। घर-घर स्क्रीनिंग शुरू हुई, मरीजों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया, संदिग्ध शराब के नमूने और अन्य साक्ष्य जुटाए गए। सरकार ने कार्रवाई करते हुए तीन आबकारी अधिकारियों को निलंबित किया है और जिम्मेदारी तय करने की बात कही है।
लेकिन यही कार्रवाई एक असहज सवाल भी छोड़ती है—क्या निगरानी तंत्र की सक्रियता हमेशा किसी की मौत के बाद ही दिखाई देगी?
यदि अवैध शराब का कारोबार कहीं चल रहा था, यदि नकली शराब की शिकायतें थीं या विभाग के संज्ञान में इसकी आशंका थी, तो उस सूचना का क्या हुआ—यह जांच का अहम हिस्सा होना चाहिए। मीडिया रिपोर्टों में ऐसी शिकायतों का भी उल्लेख सामने आया है। इसकी स्वतंत्र पुष्टि और शिकायतों पर हुई कार्रवाई का रिकॉर्ड जांच का विषय है।
यहां गलती सिर्फ एक शराब माफिया की तलाश से नहीं खुलेगी
जहरीली शराब बनाने वाला दोषी है तो उसे सजा मिलनी ही चाहिए और बेचने वाला दोषी है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जांच का रास्ता यहीं रुक गया तो तस्वीर अधूरी रहेगी।
किसने बनाई? किसने पहुंचाई? कहां से आई? किसने बेची? किसे इसकी जानकारी थी? किसने शिकायत की? शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई? और जिस इलाके में यह शराब पहुंची, वहां नियमित निगरानी किस स्तर पर हो रही थी?
इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि यह महज एक आपराधिक घटना थी या इसके पीछे लंबे समय से चल रही किसी आपूर्ति श्रृंखला ने प्रशासन की निगरानी को मात दी।
आम आदमी के स्वास्थ्य से बड़ा कोई राजस्व नहीं
शराब सरकार के लिए राजस्व का स्रोत हो सकती है, लेकिन किसी नागरिक की जिंदगी की कीमत उससे कहीं बड़ी है। अवैध शराब का कारोबार केवल कानून तोड़ने वालों की समस्या नहीं है। इसका सीधा असर गरीब और ग्रामीण परिवारों पर पड़ता है। एक व्यक्ति की मौत के साथ परिवार की आमदनी रुकती है, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और घर की पूरी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था हिल जाती है।
सागर की घटना ने इसी कठोर सच्चाई को सामने ला दिया है। अस्पतालों में भर्ती मरीजों की संख्या बताती है कि मामला सिर्फ 11 मौतों तक सीमित मान लेना भी जल्दबाजी होगी। स्वास्थ्य विभाग प्रभावित गांवों में घर-घर जाकर ऐसे लोगों की पहचान कर रहा है, जिन्होंने हाल में शराब पी थी और जिनमें लक्षण दिखाई दे रहे हैं।
जहर की पुष्टि जांच करेगी, लेकिन खतरे की तस्वीर साफ है
स्वास्थ्य अधिकारियों ने जहरीले पदार्थ, विशेषकर मिथाइल अल्कोहल विषाक्तता की आशंका का उल्लेख किया है, लेकिन अंतिम कारण की पुष्टि जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही होगी। यही वजह है कि इस घटना को लेकर सनसनी से ज्यादा जरूरी है तथ्य।

मौतों का आंकड़ा प्रशासन ने 11 बताया है। मरीज अस्पतालों में हैं। जांच चल रही है। संदिग्ध शराब और उसके स्रोत की पड़ताल हो रही है। जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई शुरू हो चुकी है। अब अगला कदम होना चाहिए—पूरी आपूर्ति श्रृंखला तक पहुंचना।
मौतों का हिसाब सिर्फ आरोपियों से नहीं, व्यवस्था से भी मांगना होगा
हर बड़ी त्रासदी के बाद कुछ गिरफ्तारियां होती हैं, कुछ अधिकारी निलंबित होते हैं और कुछ दिनों बाद मामला सुर्खियों से बाहर हो जाता है। लेकिन सागर की घटना को अगर उसी पुराने ढर्रे पर छोड़ दिया गया तो सवाल फिर वहीं खड़ा रहेगा—अगली जहरीली बोतल किस गांव में जाएगी?
इसलिए जांच का दायरा गांव में शराब बेचने वाले व्यक्ति से लेकर उसके स्रोत, परिवहन, वितरण और स्थानीय स्तर की निगरानी तक जाना चाहिए। जहां कहीं भी लापरवाही या मिलीभगत सामने आए, वहां जवाबदेही तय होनी चाहिए।
क्योंकि किसी गरीब के घर में मौत होने के बाद यह कहना कि “दोषी को बख्शा नहीं जाएगा” जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है यह पता लगाना कि दोषी को वहां तक पहुंचने दिया किसने।
सागर का सबसे बड़ा सवाल
सागर की धरती पर अब 11 परिवार उस जवाब का इंतजार कर रहे हैं, जो किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं मिलेगा। उन्हें जानना है कि उनके अपने तक वह शराब पहुंची कैसे। उन्हें जानना है कि अगर कहीं पहले से खतरे की सूचना थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई। उन्हें यह भी जानना है कि क्या सिस्टम ने खतरे को समय रहते पहचानने की कोशिश की या फिर मौतों के बाद ही मशीनरी जागी।
जांच पोस्टमार्टम से मौत का कारण बता देगी। पुलिस शराब का स्रोत खोज लेगी। प्रशासन आरोपियों पर कार्रवाई भी कर देगा। लेकिन सागर की इस त्रासदी का पूरा सच तब सामने आएगा, जब यह भी तय होगा कि जहर बनाने वाले हाथों के साथ निगरानी में हुई चूक की जिम्मेदारी किसकी थी।
क्योंकि यह सिर्फ 11 मौतों का मामला नहीं है। यह सवाल है कि जनता की जान बचाने के लिए बनाया गया सिस्टम आखिर उस वक्त कहां था, जब मौत का सामान गांवों तक पहुंच रहा था।
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