खेत हमारी, फैसला तुम्हारा?” — शिवपुरी में किसानों की जमीन पर बिना अनुमति पाइपलाइन, मुआवज़े का खेल फिर सवालों में —

मंटेना कम्पनी सहित बिभागीय अधिकारियों ने करोड़ो की उर नहर परियोजना को बना डाला लूट का अड्डा—
शिवपुरी। जिले के पिछोर क्षेत्र में चल रही उर नहर परियोजना अब विकास से ज्यादा विवाद की पहचान बनती जा रही है। करोड़ों की इस परियोजना पर काम कर रही मन्टेना कंपनी और जल संसाधन विभाग पर किसानों ने गंभीर आरोप लगाए हैं—बिना अनुमति, बिना मुआवज़ा और बिना सूचना… सीधे खेतों में जेसीबी उतारकर पाइपलाइन डाली जा रही है।
किसानों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी इसी परियोजना के नाम पर उनकी जमीन खोद दी गई, लेकिन मुआवज़ा आज तक पूरा नहीं मिला। अब दोबारा वही कहानी दोहराई जा रही है—ना सहमति, ना कागज़, ना भुगतान… सिर्फ दबंगाई।
” हम अनुमति नहीं लेते…” — अधिकारियों का चौंकाने वाला जवाब
जब पीड़ित किसानों ने विभागीय अधिकारियों से सवाल किए तो जवाब और भी हैरान करने वाला मिला—
“हम किसानों से अनुमति नहीं लेते, ऐसे ही काम चलता है।”
यह बयान न सिर्फ नियमों की अनदेखी को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि सिस्टम में बैठे लोग खुद कानून को कितनी गंभीरता से लेते हैं।
मुआवज़ा या ‘महाघोटाला’?
ग्रामीणों का आरोप है कि पहले चरण में करोड़ों रुपये का मुआवज़ा वितरण हुआ, लेकिन वह असली हकदारों तक नहीं पहुंचा। विभाग और कंपनी की मिलीभगत से फर्जीवाड़ा कर रकम हड़प ली गई। अब जब दोबारा खुदाई हो रही है, तो किसानों के जख्म फिर हरे हो गए हैं।
कानून क्या कहता है?
नियम साफ हैं—किसी भी सरकारी परियोजना में किसान की या किसी भी व्यक्ति बिशेष जी निजी भूमि का उपयोग करने से पहले भूमि स्वामी की अनुमति जरूरी है।
उचित मुआवज़ा तय कर उसका भुगतान अनिवार्य है।
पूरी प्रक्रिया लिखित और पारदर्शी होनी चाहिए।ले
लेकिन पिछोर में यह नियम सिर्फ किताबों तक सीमित नजर आ रहे हैं।
अंडरग्राऊंड पाईप लाइन बिना किसानों की अनुमति लिए डालना कही न कही कम्पनी और बिभागीय अधिकारियों की हिटलर शाही को प्रदर्शित करता है।
अभी खेत खाली हो जाने पर मंटेना कस्मोनी बिभागीय अधिकारियों के सस्थ मिलकर गाँवो मे किसानों के खेतो मे से अंडरग्राउंड पानी की पाइपलाइन डाल रही है इसी क्रम मे बीरपुर और अन्य ग्रामो मे यह कार्य किया जा रहस है जब ग्रामीणो ने बिभागीय अधिकारियों से पूछा की बिना किसानों की अनुमति और मुआब्ज़ा दिये कैसे आप हमारी निजी जमीन मे से पासिप लाइन डाल रहे है तो बिभागीय अधिकारी ने कहाँ की इसमे कोई मुआब्ज़ा नाही मिलता और हर किसान को सूचित नाही किया जाता जबकी नियमानुसार अगर् बस्त करे तो किसी भी किसान की निजी भूमि का शासशीय योजनासो मे उपयोग हेतु संबंधित किसान की अनुमति लेना आबश्यक है लेकिन बिभागीय अधिकारियों की हिटलरशाही और मांटेना कमोनी की दबंगाई के आगे सारे नियम कसनून फैल नजर आ रहे है।
किसान पूछ रहे—अब जाएं तो जाएं कहाँ।
सबसे बड़ा सवाल यही है। जब शिकायत सुनने वाले ही नियम तोड़ने लगें, तो किसान किस दरवाजे पर जाए? प्रशासन की चुप्पी और विभाग की कार्यप्रणाली ने ग्रामीणों में आक्रोश पैदा कर दिया है।
*विकास या वसूली का मॉडल?*
उर नहर परियोजना, जो किसानों की सिंचाई और समृद्धि का जरिया बननी थी, अब उन्हीं किसानों के लिए मुसीबत बनती दिख रही है। बिना सहमति जमीन कब्जाना और मुआवज़े में गड़बड़ी—यह विकास नहीं, बल्कि एक खतरनाक ट्रेंड की ओर इशारा करता है।
अब देखना होगा—क्या प्रशासन इस मामले में संज्ञान लेकर कार्रवाई करता है या फिर किसानों की जमीन पर ‘विकास’ का बुलडोजर यूं ही चलता रहेगा…
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