अब नहीं चलेगी मौत की बसें!” बस हादसे के बाद प्रशासन सख्त — सुरक्षा मानकों पर कलेक्टर का बड़ा अल्टीमेटम!

जिला परिवहन अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सबालिया निशान कलेक्टर खुद उतरे मैदान मे !
शिवपुरी। हाल ही में हुए भीषण बस हादसे ने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया। मासूम जिंदगियों को निगल चुकी लापरवाही के बाद अब प्रशासन आखिरकार एक्शन मोड में नजर आ रहा है।
कलेक्टर अर्पित वर्मा ने बस संचालकों के साथ बैठक कर दो टूक चेतावनी दे दी है —
अब बिना सुरक्षा इंतजामों के सड़क पर दौड़ती बसें सीधे जप्त होंगी और संचालकों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
मंगलवार को आयोजित बैठक में बस संचालकों को साफ शब्दों में कहा गया कि हर यात्री बस और स्लीपर कोच में आपातकालीन खिड़की, अग्निशमन यंत्र, फर्स्ट एड बॉक्स और इमरजेंसी उपकरण अनिवार्य रूप से मौजूद होने चाहिए।
सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि कार्यशील स्थिति में।
कलेक्टर ने जिला परिवहन अधिकारी को जिलेभर में सघन चेकिंग अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं।
बैठक में मौजूद पुलिस अधीक्षक यांगचेन डोलकर भूटिया ने भी बस संचालकों को सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन करने की चेतावनी दी।
प्रशासन द्वारा जारी निर्देशों में साफ कहा गया है कि —
बसों में लगे अग्निशामक यंत्र समय-समय पर जांचे जाएं
इमरजेंसी एग्जिट हर समय खुलने योग्य और अवरोध रहित हो
शॉर्ट सर्किट रोकने के लिए वायरिंग और बैटरी की नियमित जांच हो
चालक और परिचालक को आग लगने की स्थिति में यात्रियों को सुरक्षित निकालने का प्रशिक्षण हो
धूम्रपान और ज्वलनशील पदार्थों पर पूर्ण प्रतिबंध रहे
फिटनेस, बीमा, परमिट, आरसी, टैक्स और ड्राइविंग लाइसेंस अद्यतन हों
ओवरलोडिंग करने पर कार्रवाई तय मानी जाए
स्लीपर बसों के लिए अतिरिक्त निर्देशों ने कई संचालकों की नींद उड़ा दी है।
प्रशासन ने साफ कहा है कि —
ड्राइवर पार्टीशन डोर तुरंत हटाए जाएं, स्लीपर बर्थ में खतरनाक स्लाइडर न हों, सभी कोचों में फायर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम लगाया जाए और हर बस में कम से कम 10 किलो क्षमता वाले अग्निशामक यंत्र अनिवार्य हों।
सबसे बड़ा सवाल अब यह उठ रहा है कि —
क्या ये नियम पहले मौजूद नहीं थे?
अगर थे, तो फिर मौत बनकर दौड़ रहीं बसों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा था?
जिले में वर्षों से फिटनेस के नाम पर चल रहे खेल, ओवरलोडिंग, जुगाड़ू बॉडी और कागजी जांचों पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं।
लोग पूछ रहे हैं कि आखिर सड़क पर चलती बसें यात्री वाहन थीं या चलते-फिरते “बारूद के डिब्बे”?
फिलहाल प्रशासन के तेवर सख्त दिखाई दे रहे हैं।
अब देखना होगा कि यह कार्रवाई केवल बैठकों और निर्देशों तक सीमित रहती है या सच में मौत के पहियों पर लगाम कसने की शुरुआत बनती है।
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