लोअर उर परियोजना में मुआब्जे का महाघोटाला! करोड़ो की बंदरबाट,सरकारी जमीन भी बनी कमाई का जरिया।

लोअर उर परियोजना में भू अर्जन घोटाला : नियमों की धज्जियाँ उड़ा खेला करोड़ो का खेल, “शाशकीय जमीन भी बिकी कागजो में”
शिवपुरी जिले की बहुचर्चित लोअर उर परियोजना अब विकास नहीं, बल्कि घोटालों की गंगा बनती नजर आ रही है। मुआवज़ा वितरण में ऐसा खेल खेला गया कि नियम-कायदे ताक पर रख दिए गए और करोड़ों रुपये का बंदरबांट कर दिया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि शासकीय भूमि पर भी लाखों रुपये का मुआवज़ा बांट दिया गया, जबकि नियम साफ कहते हैं कि सरकारी जमीन पर किसी प्रकार का मुआवज़ा देय नहीं होता। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखें मूंदकर भुगतान कर दिया।
इतना ही नहीं, नहर लाइन के बाहर की जमीनों को भी अवार्ड में शामिल कर लिया गया और वहां भी मुआवज़ा लुटाया गया। कई मामलों में तो वास्तविक रकबे से कहीं ज्यादा भुगतान किया गया, जिससे साफ संकेत मिलता है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित खेल है।
छोटे रकबे पर बड़े भुगतान और किसी के नाम अवार्ड, किसी और के खाते में पैसा—इस तरह की अनियमितताओं ने जल संसाधन और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर यह संभव कैसे हुआ कि कागजों में रकबा कुछ और और भुगतान कुछ और?
इधर, निर्माण एजेंसी मांटेना पर भी सवालों का अंबार है। आरोप है कि मटेरियल के नाम पर करोड़ों का भुगतान किया गया, लेकिन जमीन पर काम न के बराबर। स्थानीय लोगों का कहना है कि कंपनी ने मटेरियल तक बेच डाला और विभाग ने आंख मूंदकर बिल पास कर दिए।
अब सवाल उठता है—
👉 क्या यह महज लापरवाही है या फिर मिलीभगत का बड़ा खेल?
👉 सरकारी खजाने को चूना लगाने वालों पर कब होगी कार्रवाई?
👉 और सबसे अहम, किसानों के हक का पैसा आखिर किन जेबों में चला गया?
लोअर उर परियोजना अब विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का जीता-जागता उदाहरण बनती जा रही है। यदि समय रहते जांच नहीं हुई, तो यह घोटाला और भी बड़े खुलासों का दरवाजा खोल सकता है।
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