₹306 का LED ₹11,800 में! नगरीय खरीदी में हड़कंप, 135 CMO समेत 392 अधिकारी-कर्मचारी कार्रवाई के घेरे में

₹1,134 करोड़ की खरीदी में कीमतों का भारी अंतर; 7 बर्खास्त, करोड़ों की वसूली और 80 से ज्यादा सप्लायरों पर कार्रवाई, GeM पोर्टल की निगरानी पर उठे सवाल, लोकायुक्त जांच की चर्चाओं से बढ़ी हलचल
भोपाल। मध्यप्रदेश के नगरीय निकायों में सरकारी खरीदी की दरों में सामने आए भारी अंतर ने प्रशासनिक व्यवस्था को कठघरे में ला दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार के नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामलों में कार्रवाई तेज कर दी है। विभागीय जानकारी के मुताबिक, अब तक 392 अधिकारी-कर्मचारी कार्रवाई के दायरे में आ चुके हैं। इनमें करीब 135 मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) भी शामिल हैं। सात अधिकारी-कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया है, करीब ₹3 से ₹4 करोड़ की वसूली हुई है और 80 से अधिक ठेकेदारों तथा सप्लायरों के विरुद्ध कार्रवाई की गई है। सरकारी खरीदी में पारदर्शिता के लिए बनाए गए GeM पोर्टल के इस्तेमाल और उसकी निगरानी पर भी सवाल उठने लगे हैं।
₹306 का LED, भोपाल में ₹11,800 की खरीदी
विभागीय प्रस्तुति में सामने आए आंकड़ों ने सरकारी खरीद की दरों में चौंकाने वाला अंतर उजागर किया। एक नगरीय निकाय में 60 वॉट का LED बल्ब ₹306 में खरीदा गया, जबकि भोपाल के एक नगरीय निकाय में इसी श्रेणी के बल्ब की कीमत ₹11,800 दर्ज बताई गई। कचरा वाहन की खरीदी में भी एक निकाय में करीब ₹2 लाख और दूसरे में चार डस्टबिन सहित करीब ₹6 लाख खर्च होने का उदाहरण सामने आया।

सफाई में इस्तेमाल होने वाले फिनाइल की दरों में भी बड़ा अंतर दर्ज किया गया। एक निकाय में फिनाइल ₹5 प्रति लीटर की दर से खरीदा गया, जबकि दूसरे मामले में इसी तरह के उत्पाद की कीमत ₹33,500 दर्ज बताई गई। इन उदाहरणों ने खरीद प्रक्रिया, दरों के निर्धारण और खर्च की निगरानी पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, अलग-अलग उत्पादों के मॉडल, गुणवत्ता, मात्रा और आपूर्ति की शर्तों का मिलान किए बिना केवल कीमत के अंतर को अंतिम रूप से वित्तीय अनियमितता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
तीन साल की ₹1,134 करोड़ की खरीदी का विश्लेषण
प्रदेश के 374 नगरीय निकायों में तीन वर्षों के दौरान GeM पोर्टल के माध्यम से करीब ₹1,134 करोड़ की खरीदी की गई। विभागीय प्रस्तुति में GeM और MP e-Nagar Palika के डिजिटल रिकॉर्ड का विश्लेषण कर विभिन्न निकायों में खरीदी गई वस्तुओं की दरों की तुलना की गई। इसी प्रक्रिया में कई वस्तुओं की कीमतों में बड़ा अंतर सामने आया।

विभागीय आकलन के मुताबिक, यदि वस्तुओं की खरीदी औसत दरों पर की जाती, तो लगभग ₹200 से ₹250 करोड़ तक की बचत संभव थी। यह संभावित बचत का अनुमान है, प्रमाणित वित्तीय नुकसान का अंतिम आंकड़ा नहीं। इसके बावजूद इतनी बड़ी राशि की संभावित बचत सामने आना खरीद की जरूरत, दरों के निर्धारण और भुगतान से पहले होने वाली जांच की अहमियत को रेखांकित करता है।
अप्रैल में 146 से अब 392 अधिकारी-कर्मचारी कार्रवाई के दायरे में
नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने बताया कि अप्रैल 2026 में विभागीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के समय तक 146 अधिकारी-कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई शुरू हो चुकी थी। अब यह संख्या बढ़कर 392 हो गई है। कार्रवाई में अलग-अलग स्तर के अधिकारी-कर्मचारी शामिल हैं। सात लोगों को सेवा से बर्खास्त किया गया है, जबकि अन्य मामलों में वेतनवृद्धि रोकने, पदावनति और वसूली जैसी कार्रवाई भी की गई है।
विभाग ने कथित अनियमितताओं से जुड़े मामलों में 80 से अधिक ठेकेदारों और सप्लायरों के विरुद्ध भी कदम उठाए हैं। इससे स्पष्ट है कि जांच केवल निकायों के भीतर पदस्थ अधिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि खरीदी और आपूर्ति से जुड़े पक्षों की भूमिका भी जांच के दायरे में है।
135 CMO पर कार्रवाई, खरीदी की फाइलों से तय होगी जिम्मेदारी
कार्रवाई के दायरे में करीब 135 मुख्य नगरपालिका अधिकारियों का शामिल होना इस पूरे मामले का महत्वपूर्ण पहलू है। नगरीय निकायों में CMO की भूमिका प्रशासनिक और वित्तीय प्रक्रिया में अहम होती है। खरीद प्रस्ताव, स्वीकृति, दरों की तुलना, सामग्री प्राप्त होने का सत्यापन और भुगतान से जुड़े अभिलेख प्रत्येक मामले में जिम्मेदारी तय करने के महत्वपूर्ण आधार हैं।
जिन निकायों में सामान की कीमतों में असामान्य अंतर सामने आया है, वहां संबंधित खरीद आदेशों, तकनीकी विवरणों, स्वीकृति अभिलेखों, आपूर्ति प्रमाणपत्रों और भुगतान की जांच से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। हर अधिकारी की भूमिका उसके पद के बजाय संबंधित फाइल और निर्णय प्रक्रिया में निभाई गई जिम्मेदारी के आधार पर तय होनी चाहिए। इसी तरह सप्लायरों की दरों और आपूर्ति संबंधी दस्तावेजों की जांच भी जरूरी है, ताकि प्रमाणित अनियमितता और सामान्य मूल्य-अंतर के बीच स्पष्ट फर्क किया जा सके।
GeM पोर्टल बना खरीदी का जरिया या गड़बड़ियों की खुली खिड़की?
सरकारी खरीद में पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से GeM पोर्टल की व्यवस्था लागू की गई, लेकिन नगरीय निकायों में सामने आए कीमतों के भारी अंतर ने इसी व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऑनलाइन खरीद का मकसद प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाना और सरकारी धन का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना है। इसके बावजूद यदि एक ही श्रेणी की वस्तुओं की खरीद में इतना बड़ा अंतर सामने आता है, तो खरीद की शर्तों, दरों की तुलना और स्वीकृति प्रक्रिया की पड़ताल जरूरी हो जाती है।
सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, कुछ मामलों में अधिकारियों और सप्लायरों के बीच संभावित मिलीभगत की आशंका भी जताई जा रही है। हालांकि, इसकी पुष्टि जांच और संबंधित दस्तावेजों से ही हो सकेगी। ऑनलाइन पोर्टल पर खरीद दर्ज होना अपने आप में इस बात की गारंटी नहीं है कि हर वस्तु सबसे उचित दर पर खरीदी गई या पूरी प्रक्रिया में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं हुई।
यदि किसी अधिकारी या सप्लायर ने निजी लाभ के लिए नियमों का दुरुपयोग किया है, तो उसकी भूमिका और जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। सवाल यह भी है कि डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बावजूद असामान्य दरों पर समय रहते प्रभावी निगरानी क्यों नहीं हो सकी और भुगतान से पहले खरीद की पर्याप्त जांच क्यों नहीं हुई?
भोपाल में CMO की आवाजाही, वसूली पर भी नजर
कार्रवाई का दायरा बढ़ने के बीच भोपाल में नगरीय निकायों के अधिकारियों की आवाजाही को लेकर भी चर्चाएं हैं। हालांकि, अधिकारियों के भोपाल पहुंचने का उद्देश्य और उसका इन मामलों से सीधा संबंध आधिकारिक पुष्टि के बाद ही स्पष्ट होगा।
करीब ₹3 से ₹4 करोड़ की वसूली की जानकारी भी सामने आई है। अब यह स्पष्ट होना जरूरी है कि किन अधिकारियों या सप्लायरों से कितनी राशि वसूल की गई, किन मामलों में वसूली के आदेश जारी हुए और कितनी राशि वास्तव में जमा हुई। वेतन से वसूली की कार्रवाई जहां लागू की गई है, वहां संबंधित आदेशों और वसूली की स्थिति सामने आने से जवाबदेही की तस्वीर अधिक साफ हो सकती है।
लोकायुक्त जांच की चर्चाएं भी तेज
इस पूरे मामले को लेकर सोशल मीडिया पर भी चर्चाएं तेज हैं। वायरल हो रही जानकारियों के बीच नगरीय निकायों की खरीदी में कथित अनियमितताओं को लेकर लोकायुक्त जांच की चर्चाएं भी सुनने को मिल रही हैं। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि सामने आना बाकी है। यदि जांच की औपचारिक पुष्टि होती है, तो खरीद के रिकॉर्ड, दरों में अंतर के कारण और संबंधित अधिकारियों तथा सप्लायरों की भूमिका की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी।
सरकारी खरीदी में खर्च होने वाला धन जनता से प्राप्त राजस्व और सार्वजनिक संसाधनों का हिस्सा है। इसलिए केवल कार्रवाई की संख्या या वसूली की राशि से जवाबदेही पूरी नहीं होती। जांच में प्रत्येक मामले की वास्तविक स्थिति सामने आना, प्रमाणित अनियमितताओं पर नियमानुसार कार्रवाई होना और खरीद व्यवस्था में ऐसी गड़बड़ियों की पुनरावृत्ति रोकना जरूरी है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि विभागीय कार्रवाई के साथ खरीद प्रक्रिया की खामियों को दूर करने और जिम्मेदार लोगों की भूमिका स्पष्ट करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।
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