“हाईकोर्ट की अवमानना पड़ी भारी: शिवपुरी के CMHO डॉ. संजय ऋषीश्वर निलंबित, लापरवाही ने डुबोई कुर्सी!”

“कोर्ट के आदेश मजाक मे न ले अधिकारी नही तो कभी भी खिसक सकती है कुर्सी!”

शिवपुरी/ सरकारी सिस्टम की सुस्ती और अफसरशाही की लापरवाही पर एक बार फिर बड़ा प्रहार हुआ है। शिवपुरी के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. संजय ऋषीश्वर को आखिरकार अपनी ढिलाई की भारी कीमत चुकानी पड़ी—सरकार ने उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।
मामला सीधे-सीधे माननीय उच्च न्यायालय, ग्वालियर खंडपीठ के आदेशों की अनदेखी से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, सालों पुराने एक मामले में कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद समय पर पालन प्रतिवेदन (Compliance Report) पेश नहीं किया गया। नतीजा—मामला अवमानना (Contempt) तक पहुंच गया और शासन की साख पर भी सवाल खड़े हो गए।
क्या है पूरा मामला?
बताया जा रहा है कि रिट याचिका क्रमांक 7460/2010 में पारित आदेश (03 जनवरी 2018) का पालन नहीं हो सका, जिसके चलते अवमानना प्रकरण क्रमांक 1842/2018 दायर हुआ। इस पूरे मामले में विभाग की ओर से CMHO शिवपुरी को संपर्क अधिकारी बनाया गया था—यानी जिम्मेदारी सीधे उनके कंधों पर थी। लेकिन यहां से शुरू हुई लापरवाही की कहानी…
कोर्ट के सख्त तेवर, फिर भी ढिलाई!
23 मार्च 2026 को हाईकोर्ट ने साफ निर्देश दिए थे कि अगली तारीख 20 अप्रैल 2026 तक हर हाल में पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाए। साथ ही चेतावनी भी दी गई थी कि ऐसा न होने पर आरोप तय कर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
लेकिन हैरानी की बात—इतनी सख्त चेतावनी के बावजूद भी 20 अप्रैल तक रिपोर्ट पेश नहीं की गई!
नतीजा… कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए अगली सुनवाई में संबंधित पक्ष को व्यक्तिगत उपस्थिति तक के आदेश दे डाले।
शासन की छवि धूमिल, गिरी गाज
सरकार ने अपने आदेश में साफ कहा है कि डॉ. ऋषीश्वर की यह लापरवाही न सिर्फ कर्तव्यहीनता है, बल्कि
मध्यप्रदेश सिविल सेवा आचरण नियम 1965 का खुला उल्लंघन भी है। इसे कदाचरण (Misconduct) मानते हुए निलंबन की कार्रवाई की गई।
डॉ. संजय ऋषीश्वर को नियम 9 (CCA Rules 1966) के तहत निलंबित किया गया
निलंबन अवधि में उनका मुख्यालय ग्वालियर क्षेत्रीय संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं कार्यालय रहेगा उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता मिलेगा
सिस्टम पर फिर उठे सवाल!
यह कार्रवाई एक बड़ा सवाल छोड़ गई है— क्या सरकारी अफसर अब भी कोर्ट के आदेशों को हल्के में लेते हैं? और अगर हां, तो क्या ऐसे ही सख्त कदम ही सिस्टम को पटरी पर ला पाएंगे?
शिवपुरी में यह निलंबन सिर्फ एक अधिकारी पर गिरी गाज नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे के लिए एक कड़ा संदेश है—
“कोर्ट के आदेश मजाक नहीं… वरना कुर्सी कभी भी खिसक सकती है!”
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