मोहन सरकार का बड़ा ‘खर्चा बंद’ अभियान: अफसरों की ऐश पर ताला, अब सरकारी खजाने से नहीं होगी फिजूलखर्ची

दो साल का सख्त फरमान—विदेश दौरे लगभग बंद, इकोनॉमी क्लास अनिवार्य, होटलों में बैठकें खत्म, वीआईपी ठाठ-बाट पर भी गिरी गाज
भोपाल/ मध्य प्रदेश में सरकारी खर्च की खुली छूट पर आखिरकार सरकार ने बड़ा ब्रेक लगा दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार ने ऐसा वित्तीय अनुशासन लागू किया है, जिसने पूरे सरकारी अमले को साफ संदेश दे दिया है कि अब सरकारी पैसा शानो-शौकत नहीं, बल्कि जनता के विकास पर खर्च होगा।

वित्त विभाग द्वारा जारी मितव्ययिता आदेशों के तहत अगले दो वित्तीय वर्षों तक सरकारी खर्च के हर बड़े मद पर कड़ी निगरानी रहेगी। सरकार का मानना है कि आर्थिक चुनौतियों और कमजोर मानसून के दौर में सरकारी खजाने का विवेकपूर्ण उपयोग ही प्रदेश की विकास योजनाओं को गति दे सकता है।
सबसे बड़ा असर अधिकारियों की सुविधाओं पर पड़ा है। अब सरकारी खर्च पर बिजनेस क्लास में उड़ान भरने का दौर खत्म हो गया है। सभी अधिकारी और कर्मचारी केवल इकोनॉमी क्लास में ही हवाई यात्रा कर सकेंगे। सरकारी खर्च पर विदेश यात्राओं पर भी लगभग पूरी तरह रोक लगा दी गई है। केवल अत्यंत आवश्यक मामलों में सक्षम प्राधिकारी की विशेष अनुमति के बाद ही विदेश दौरा संभव होगा।
सरकार ने उन बैठकों और सेमिनारों पर भी ताला लगा दिया है, जो अब तक महंगे होटलों और निजी कॉन्फ्रेंस हॉलों में आयोजित होते थे। स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि सरकारी बैठकें अब सरकारी परिसरों में होंगी और जहां संभव होगा, वहां वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए काम निपटाया जाएगा।
वीआईपी संस्कृति पर भी सरकार ने सीधा प्रहार किया है। सरकारी खर्च से छपने वाली डायरी, कैलेंडर, स्मृति-चिह्न, महंगे उपहार, स्वागत समारोह और दिखावटी आयोजनों पर रोक लगा दी गई है। कार्यालयों की सजावट और नए फर्नीचर जैसे गैर-जरूरी खर्च भी फिलहाल बंद रहेंगे।
सरकारी वाहनों के उपयोग में भी बड़ा बदलाव किया गया है। अब एक ही वाहन का उपयोग कई अधिकारी करेंगे। विभागों को वाहन साझा व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि ईंधन और रखरखाव पर होने वाला खर्च कम किया जा सके।
नई कंसल्टेंसी सेवाओं पर भी सरकार ने ब्रेक लगा दिया है। विभागों को पहले अपने उपलब्ध अधिकारियों और विशेषज्ञों से काम लेने के लिए कहा गया है। केवल अपरिहार्य परिस्थितियों में ही नए परामर्श अनुबंध स्वीकृत होंगे।
सरकार ने सरकारी निगमों और सार्वजनिक उपक्रमों को भी अधिक से अधिक लाभांश राज्य कोष में जमा कराने के निर्देश दिए हैं, ताकि विकास योजनाओं के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाए जा सकें।
सरकार का यह फैसला केवल खर्च कम करने का आदेश नहीं, बल्कि सरकारी कार्यप्रणाली में जवाबदेही और सादगी लाने की कोशिश भी माना जा रहा है। यदि इन निर्देशों का ईमानदारी से पालन हुआ तो सरकारी फिजूलखर्ची पर लगाम लगेगी और बचाई गई राशि सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, पेयजल और जनकल्याण की योजनाओं तक पहुंच सकेगी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सख्ती सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगी, या फिर वास्तव में सरकारी तंत्र अपनी पुरानी खर्चीली आदतों को बदलेगा?
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