*सफाईकर्मी हड़ताल पर… शिवपुरी कचरे के ढेर पर! नेताओं की आवाजाही जारी, मगर शहर की गंदगी क्यों नहीं दिखती?*

400 से ज्यादा कर्मचारी हड़ताल पर, 11 सूत्रीय मांगों पर गतिरोध; समझाइश और बैठकों के बाद भी सड़कों पर बढ़ता कचरा
शिवपुरी। शहर में इन दिनों जो तस्वीर दिखाई दे रही है, वह किसी स्वच्छ शहर की नहीं है। सड़कों के किनारे कचरे के ढेर हैं, कई इलाकों में सफाई व्यवस्था प्रभावित है और सफाईकर्मियों की हड़ताल के चलते हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। नगर पालिका के 400 से ज्यादा कर्मचारी हड़ताल पर बताए जा रहे हैं। इनमें सफाईकर्मियों के साथ अन्य नगरपालिका कर्मचारी भी शामिल हैं। 11 सूत्रीय मांगों को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब लंबा खिंचता दिखाई दे रहा है।

नगरपालिका अध्यक्ष और सीएमओ के साथ कर्मचारियों की कई दौर की बातचीत हो चुकी है। स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक नगरपालिका प्रशासन 11 में से 8 मांगों पर सहमति जता चुका है, लेकिन नियमितीकरण और पदोन्नति जैसे मुद्दों पर कर्मचारी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। कर्मचारियों ने आंदोलन आगे बढ़ाने और भूख हड़ताल की चेतावनी भी दी है।
यानी एक तरफ मांगों को लेकर कर्मचारी अड़े हैं और दूसरी तरफ शहर की सफाई व्यवस्था उनके काम पर लौटने का इंतजार करती नजर आ रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर कर्मचारियों की हड़ताल लंबी चलती है तो शहर की सफाई कौन करेगा?
नगरपालिका के पास क्या कोई ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था है जिससे सफाईकर्मियों के काम पर नहीं आने की स्थिति में शहर को कचरे के ढेर में तब्दील होने से रोका जा सके? अगर व्यवस्था है तो फिर सड़कों पर कचरा क्यों दिखाई दे रहा है और अगर व्यवस्था नहीं है तो इतने बड़े शहर की सफाई व्यवस्था को केवल कर्मचारियों की मौजूदगी पर निर्भ
र क्यों रखा गया?
नेता आए, चले गए… कचरा वहीं रह गया
इन दिनों शिवपुरी में नेताओं और जनप्रतिनिधियों की आवाजाही भी हुई। कार्यक्रम हुए, बैठकों का दौर चला और शहर की व्यवस्थाओं पर चर्चा भी हुई। लेकिन शहर की दूसरी तस्वीर भी इसी दौरान सामने रही—मोहल्लों और सड़कों पर जमा कचरा।
सवाल किसी एक नेता के दौरे का नहीं है। सवाल यह है कि क्या शहर की असली तस्वीर केवल बड़े कार्यक्रमों और मुख्य मार्गों तक सीमित रह गई है?
जिस गंदगी को आम नागरिक रोज अपनी आंखों से देख रहा है, वह जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों की नजर से आखिर कैसे बच सकती है?
शिवपुरी के लोगों को नेताओं के आने-जाने से ज्यादा मतलब इस बात से है कि उनके मोहल्ले का कचरा समय पर उठे। शहर में दुर्गंध न फैले और बारिश के मौसम में कचरे के कारण नालियां और सड़कें और ज्यादा खराब न हों।
यह पहली बार नहीं है… एक साल पहले भी यही तस्वीर थी
शिवपुरी इस स्थिति को पहली बार नहीं देख रहा।
अप्रैल 2025 में भी सफाईकर्मियों की हड़ताल के दौरान शहर में गंदगी के ढेर लग गए थे। हालात ऐसे बने कि तत्कालीन सीएमओ सहित नगरपालिका के अधिकारियों को स्वयं सड़क पर उतरकर सफाई करनी पड़ी थी।
तब भी सवाल उठा था कि आखिर सफाई व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों है कि कर्मचारियों के काम बंद करते ही शहर की व्यवस्था चरमरा जाती है।
एक साल से ज्यादा समय बाद वही सवाल फिर सामने खड़ा है।
हड़ताल खत्म हो जाती है, कचरा उठ जाता है और मामला भी ठंडा पड़ जाता है… लेकिन अगली हड़ताल रोकने की स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बनती?

मांगें अपनी जगह, शहर की सफाई अपनी जगह
सफाईकर्मियों की मांगें जायज हैं या नहीं, इसका फैसला बातचीत और नियमानुसार होना चाहिए। नियमितीकरण, पदोन्नति और दूसरी मांगों पर सरकार और नगरपालिका को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
लेकिन इसके साथ शहर की सफाई व्यवस्था भी बंद नहीं रह सकती।
कर्मचारी अपनी मांगों के लिए आंदोलन कर रहे हैं और नगरपालिका अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए बाध्य है। दोनों के बीच विवाद का खामियाजा आम नागरिक क्यों भुगते?
यह केवल सफाईकर्मियों और नगरपालिका का विवाद नहीं रह गया है। अब यह शिवपुरी की सड़कों और नागरिकों की समस्या बन चुका है।
फिर वही कहानी कब तक?
शिवपुरी में सफाई व्यवस्था को लेकर एक अजीब सिलसिला बनता दिखाई दे रहा है—मांगें उठती हैं, कर्मचारी नाराज होते हैं, हड़ताल होती है, शहर में कचरा जमा होता है, बैठकों का दौर चलता है, समझाइश दी जाती है और फिर किसी तरह मामला शांत हो जाता है।
लेकिन स्थायी समाधान?
वह अगली हड़ताल तक दिखाई नहीं देता।
अगर पिछले साल भी हड़ताल के बाद शहर में यही हाल हुआ था और इस बार फिर वही तस्वीर सामने है, तो सवाल केवल कर्मचारियों से नहीं पूछा जाना चाहिए। सवाल नगरपालिका की तैयारी से भी होना चाहिए।
शिवपुरी को ऐसी सफाई व्यवस्था चाहिए जो केवल कर्मचारियों के काम पर रहने तक ही न चले। ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें किसी कर्मचारी आंदोलन के कारण पूरा शहर कचरे के हवाले न हो जाए।
फिलहाल शहर की सड़कों पर जमा कचरा बहुत कुछ कह रहा है।
कर्मचारी अपनी मांग पर अड़े हैं… नगरपालिका अपनी कोशिशों का दावा कर रही है… लेकिन इन दोनों के बीच शिवपुरी का आम नागरिक खड़ा है।
और सवाल सीधा है—
“शिवपुरी को कचरे से कौन बचाएगा—समझाइश, बैठक या कोई स्थायी व्यवस्था?”
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