जब पहाड़ टूटा तो पानी नहीं, मौत उतरी! नेपाल में ग्लेशियर का कहर, 165 शव बरामद—अब बिहार तक सैलाब की आहट

जब पहाड़ टूटा तो पानी नहीं, मौत का सैलाब उतरा: नेपाल की त्रासदी ने हिमालय के बदलते मिजाज पर उठाए सवाल
काठमांडू/रासुवा। नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने एक बार फिर बता दिया कि हिमालय की खामोश ऊंचाइयों में छिपा खतरा कितना भयावह हो सकता है। यह सामान्य बारिश से आई बाढ़ नहीं थी। नेपाल-चीन सीमा के ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टानों का बड़ा हिस्सा टूटकर नदी में जा गिरा। इससे नदी का रास्ता बाधित हुआ और जब पानी ने रास्ता बनाया तो वह अपने साथ बर्फ, पत्थर, मिट्टी और मलबे की ऐसी दीवार लेकर नीचे उतरा कि रास्ते में आने वाली सड़कें, पुल, मकान, वाहन और दूसरी संरचनाएं देखते ही देखते तबाह हो गईं।

रासुवा जिले के ल्हेन्दे खोला से निकला मलबा भोटेकोशी नदी में पहुंचा और आगे त्रिशूली नदी का जलस्तर अचानक खतरनाक तरीके से बढ़ गया। कई स्थानों पर नदी का पानी कुछ ही समय में कई मीटर ऊपर पहुंच गया। रासुवा के साथ नुवाकोट, धादिंग और नदी किनारे के दूसरे इलाकों में भी इसका असर दिखाई दिया। 35 मोटरेबल पुल, 45 झूला पुल और करीब 40 किलोमीटर सड़क क्षतिग्रस्त होने की जानकारी सामने आई है।

इस आपदा की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 27 अगस्त तक नेपाल में 165 शव बरामद किए जा चुके थे और बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। लापता लोगों में स्थानीय नागरिकों के अलावा सेना, पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के जवान तथा जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े लोग भी शामिल हैं। 579 पर्यटकों के भी अब तक संपर्क में नहीं आने की जानकारी है, जिनमें 466 विदेशी नागरिक हैं।

सेना के हेलीकॉप्टर बने उम्मीद की किरण
तबाही के बीच नेपाल की सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल ने मोर्चा संभाल लिया है। हेलीकॉप्टरों से प्रभावित इलाकों में पहुंचकर लोगों को निकालने, घायलों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने और राहत सामग्री पहुंचाने का काम चल रहा है। नेपाल आर्मी के हेलीकॉप्टर तिमुरे से 123 लोगों को सुरक्षित निकाल चुके हैं, जिनमें 94 नेपाली और 29 विदेशी नागरिक शामिल हैं।
लेकिन बचाव अभियान आसान नहीं है। टूटी सड़कें, बह चुके पुल, तेज बहाव, मलबे के ढेर और खराब मौसम राहत दलों की राह रोक रहे हैं। कई जगह हेलीकॉप्टर उतारना भी मुश्किल है। यही कारण है कि सेना और सुरक्षा बलों के जवान जोखिम उठाकर जमीन से भी खोज अभियान चला रहे हैं।
भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ, मोदी ने नेपाल को दिया भरोसा
नेपाल की त्रासदी पर भारत ने भी तत्काल प्रतिक्रिया दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से फोन पर बात कर जानमाल के नुकसान पर गहरी संवेदना व्यक्त की और कहा कि इस कठिन समय में भारत के लोग नेपाल के साथ खड़े हैं। मोदी ने नेपाल को हरसंभव मानवीय सहायता देने का भरोसा दिया है। भारत की संबंधित टीमें नेपाली अधिकारियों के साथ राहत और बचाव कार्यों के समन्वय में जुटी हैं।
वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों से बात कर स्थिति की समीक्षा की। केंद्र ने नेपाल से लगे और संभावित रूप से प्रभावित भारतीय क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन, राहत-बचाव दल और NDRF को हाई अलर्ट पर रखा है। गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

नेपाल में भारतीय पर्यटकों के लापता होने की खबरों को देखते हुए भारतीय दूतावास, काठमांडू ने सहायता और जानकारी के लिए आपात हेल्पलाइन भी जारी की है। यानी भारत की चिंता केवल सीमा तक आने वाले पानी को लेकर नहीं, बल्कि नेपाल में फंसे अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी को लेकर भी है।
भारत में भी खतरे की घंटी, बिहार ने संभाला मोर्चा
नेपाल की इस त्रासदी का असर भारत तक पहुंचने की आशंका ने बिहार और उत्तर प्रदेश को सतर्क कर दिया है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी प्रणाली आगे गंडक नदी तंत्र से जुड़ती है, इसलिए सीमावर्ती और निचले इलाकों पर खास नजर रखी जा रही है। केंद्र ने स्पष्ट किया है कि नेपाल में अचानक बढ़े पानी का असर आगे गंडक नदी में दिखाई दे सकता है। बिहार और उत्तर प्रदेश में जरूरत के अनुसार निकासी और स्थानीय लोगों की सहायता की तैयारी की गई है।
बिहार में प्रशासन को लगातार जलस्तर की निगरानी, संवेदनशील इलाकों में लोगों को सुरक्षित करने और जरूरत पड़ने पर राहत-बचाव अभियान शुरू करने के निर्देश हैं। NDRF को भी तैयार रखा गया है। फिलहाल केंद्र ने यह भी कहा है कि नेपाल की ओर जलाशयों का जलस्तर घट रहा है और स्थिति नियंत्रण में है, इसलिए घबराने की जरूरत नहीं, लेकिन सतर्कता में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।
खतरा अभी टला नहीं है
नेपाल की घटना ने सिर्फ एक दिन की तबाही नहीं दिखाई है, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ग्लेशियरों का सिकुड़ना, तापमान में बदलाव, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ भविष्य के लिए बड़ी चुनौती हैं। हालांकि इस घटना को पूरी तरह जलवायु परिवर्तन का परिणाम कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन हिमालयी इलाकों में ऐसी घटनाओं की बढ़ती आशंका को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
नेपाल में अभी मलबे के नीचे जिंदगी की तलाश जारी है और भारत में नदियों के जलस्तर पर निगाहें टिकी हैं। एक तरफ नेपाल में सेना और बचाव दल मौत से जिंदगी छीनने की कोशिश कर रहे हैं, दूसरी तरफ भारत अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी और सीमावर्ती इलाकों को संभावित सैलाब से बचाने की तैयारी में जुटा है।
नेपाल की यह त्रासदी इसलिए सिर्फ एक देश की खबर नहीं है। यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है—क्योंकि पहाड़ जब टूटता है तो सीमा नहीं देखता, नदी रास्ता नहीं पूछती और सैलाब को इंसानी नक्शों की कोई परवाह नहीं होती।
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