रक्षाबंधन स्पेशल: सलाखों से टकराया राखी का धागा, जेल की दीवारें भी हुईं बेअसर!

अपराध की सजा भुगत रहे 992 बंदियों की कलाइयों पर बंधा बहनों का प्यार; किसी आंख में आंसू, किसी दिल में उम्मीद—“भाई लौटेगा तो फिर राखी बांधूंगी”
शिवपुरी। कहते हैं कानून की सलाखें इंसान को कैद कर सकती हैं, लेकिन रिश्तों को नहीं। रक्षाबंधन के दिन शिवपुरी सर्किल की 9 जेलों में यही तस्वीर दिखाई दी। जिन भाइयों की दुनिया आज जेल की चारदीवारी तक सिमट गई है, उनकी कलाइयों पर शुक्रवार को बहनों ने राखी बांधी। 992 बंदियों तक पहुंची राखी की डोर ने जेल की कठोर दीवारों के बीच रिश्तों की ऐसी दस्तक दी कि माहौल भावुक हो उठा।
कहीं बहन की आंखें नम थीं, कहीं भाई की नजरें झुकी थीं और कहीं दोनों के बीच बिना शब्दों के ही बहुत कुछ कह दिया गया। बहन ने राखी बांधी तो शायद भाई को यह अहसास भी कराया कि कानून की नजर में उसकी गलती कितनी भी बड़ी क्यों न हो, बहन के रिश्ते में उसके लिए जगह आज भी बाकी है।
सजा भाई को मिली, लेकिन दर्द परिवार भी भुगत रहा
जेल में बंद व्यक्ति अपनी सजा भुगत रहा है, लेकिन उसकी गैरमौजूदगी का असर अक्सर पूरा परिवार झेलता है। रक्षाबंधन पर हुई मुलाकातों ने इसी अनकहे दर्द को सामने ला दिया। एक तरफ कानून का फैसला था, दूसरी तरफ बहन का अटूट रिश्ता। दोनों के बीच खड़ी जेल की दीवार उस दिन भी मौजूद थी, लेकिन राखी का धागा उससे कहीं ज्यादा ताकतवर नजर आया।
बहनों ने अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उनके बेहतर भविष्य की कामना की। कई मुलाकातों में भावनाएं इतनी गहरी थीं कि शब्द कम पड़ गए। राखी बांधने वाली बहन शायद यही चाहती थी कि अगली राखी जेल की दीवारों के भीतर नहीं, अपने घर के आंगन में बांधे।
कड़ी सुरक्षा में हुई मुलाकात, भावनाओं पर नहीं लगा पहरा
जेल प्रशासन ने रक्षाबंधन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह चाक-चौबंद रखा। जेल अधीक्षक विदित सिरवैया के अनुसार जेल मुख्यालय भोपाल के निर्देशों के तहत परिजनों की सतत तलाशी ली गई और निर्धारित सुरक्षा व्यवस्था के बीच प्रत्यक्ष मुलाकात कराई गई।
मुलाकात के बाद सभी जेलों में बंदियों का लॉकअप मिलान किया गया तथा लॉकअप बंद किए गए। पूरे सर्किल में व्यवस्था शांतिपूर्ण रही।
शिवपुरी से चांचौड़ा तक राखी की एक ही कहानी
शिवपुरी सर्किल की 9 जेलों में कुल 992 बंदियों से माताओं एवं बहनों ने मुलाकात की।
शिवपुरी सर्किल जेल में 272 बंदियों, जिनमें 9 महिला बंदी शामिल हैं, से 1,088 परिजनों ने मुलाकात की। जिला जेल गुना में 248 बंदियों से 670, अशोकनगर में 177 से 453 और श्योपुर में 37 बंदियों से 101 परिजन पहुंचे।
इसी तरह सब जेल पोहरी में 21 बंदियों से 34, कोलारस में 13 से 27, पिछोर में 86 से 197, करैरा में 98 से 303 और चांचौड़ा में 40 बंदियों से 127 परिजनों ने मुलाकात की।
राखी ने फिर याद दिलाया—गलती और रिश्ता एक चीज नहीं
रक्षाबंधन का यह दृश्य सिर्फ भावुकता की कहानी नहीं था। यह समाज के सामने एक बड़ा सवाल भी छोड़ गया—क्या किसी व्यक्ति की गलती उसके हर रिश्ते को भी खत्म कर देती है? शायद नहीं।
कानून अपना काम करता है और करना भी चाहिए। अपराध की सजा जरूरी है, लेकिन सजा के बीच भी इंसान के भीतर परिवार, मां और बहन के लिए भावनाएं जीवित रहती हैं। रक्षाबंधन ने इसी मानवीय पक्ष को सामने ला दिया।
जेल की चाबी ने दरवाजे खोले और कुछ घंटों के लिए ही सही, परिवार को परिवार से मिला दिया।
आज 992 कलाइयों पर सिर्फ राखी नहीं बंधी…
कहीं पश्चाताप बंधा, कहीं उम्मीद बंधी, कहीं बहन की दुआ बंधी और कहीं घर लौटने का सपना।
सलाखें शरीर को रोक सकती हैं, रिश्तों को नहीं।
कानून सजा दे सकता है, बहन का प्यार नहीं छीन सकता।
और शायद यही रक्षाबंधन का सबसे कड़वा-सच और सबसे खूबसूरत सच है—
“जिस भाई तक घर की चौखट नहीं पहुंच सकी, वहां आज बहन की राखी पहुंच गई।” ❤️🩹
— शिवपुरी मेल
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