फर्जी दिव्यांग भर्ती घोटाले की जांच ठंडे बस्ते में! कलेक्टर के तीन-तीन आदेश, डीईओ के दो पत्र, फिर भी गायब हैं मूल रिकॉर्ड 1998 से 2014 तक की भर्तियों पर उठे सवाल, डेढ़ साल बाद भी जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं

शिवपुरी। शिक्षा विभाग में फर्जी दिव्यांग प्रमाण-पत्रों के आधार पर हुई कथित नियुक्तियों का मामला अब प्रशासनिक लापरवाही और रिकॉर्ड गायब होने के गंभीर सवालों में उलझता नजर आ रहा है। कलेक्टर द्वारा जांच समिति गठित करने, बार-बार पत्र जारी करने और जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा कई स्मरण पत्र भेजने के बावजूद आज तक संबंधित भर्तियों का मूल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया जा सका है।

दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 1998, 2003, 2005, 2008 और 2011 में हुई शिक्षक भर्तियों में फर्जी दिव्यांग प्रमाण-पत्रों के आधार पर नियुक्तियां होने की शिकायत मिलने पर कलेक्टर ने 5 दिसंबर 2024 को जिला स्तरीय जांच समिति गठित की थी। समिति को एक माह में जांच प्रतिवेदन देने के निर्देश दिए गए थे। लेकिन जांच शुरू होने से पहले ही सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया कि जिन भर्तियों की जांच होनी है, उनका मूल रिकॉर्ड आखिर है कहां?
कलेक्टर ने लिखा – रिकॉर्ड दो, अफसरों ने नहीं दिया
5 दिसंबर 2024 को कलेक्टर कार्यालय ने सभी जनपद पंचायतों, नगर पालिकाओं और नगर परिषदों को निर्देश जारी कर 1998 से 2014 तक की भर्ती संबंधी मूल फाइलें और अभिलेख उपलब्ध कराने को कहा। निर्धारित समय सीमा गुजरने के बाद भी रिकॉर्ड नहीं पहुंचा तो 13 दिसंबर को जिला शिक्षा अधिकारी ने पुनः पत्र जारी किया।
इसके बाद भी जब रिकॉर्ड नहीं मिला तो 18 दिसंबर को कलेक्टर कार्यालय को स्मरण पत्र जारी करना पड़ा। पत्र में स्पष्ट लिखा गया कि “मूल नस्तियां/रिकॉर्ड आज दिनांक तक उपलब्ध नहीं कराया गया है, जो अत्यंत खेदजनक है।”
रिकॉर्ड गायब, जांच लापता और जिम्मेदार खामोश!
जैसा की देखने मे आया की आज महीनों गुजर् जाने के बाद भी जिला पंचायत सी ई ओ कलेक्टर के आदेश के बाद भी संबंधित सभी जनपद पंचायतो से नियुक्ति से संबंधित मूल रिकॉर्ड उपलब्ध कराने मे सफलता हासील नही कर सके वही जब 19 महीनों बाद पुनः जिला पंचायत सी ई ओ को कलेक्टर द्वारा जारी पत्रों का हबाला देते हुए पुनः शिकायत दर्ज कराई तो जिला पंचायत सी ई ओ ने उन पत्रों को नजर अंदाज करते हुए पुनः वाह शिकायत कलेक्टर कार्यालय की शिकायत शाखा को भेज दी अब इससे स्वतः अंदाजा लगाया जा सकता है की इस गंभीर मामले मे किस हद तक लापरवाही बरती जा रही है।
रिकॉर्ड गायब या बचाव की कोशिश?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जांच समिति का गठन हुए महीनों गुजर चुके हैं, लेकिन जिन दस्तावेजों के आधार पर जांच होनी है, वही रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या रिकॉर्ड वास्तव में गायब है या फिर किसी बड़े घोटाले पर पर्दा डालने के लिए जानबूझकर फाइलें रोकी जा रही हैं?
यदि रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है तो संबंधित कार्यालयों में उसकी जिम्मेदारी किसकी है? और यदि रिकॉर्ड मौजूद है तो उसे जांच समिति से छिपाने वालों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
जांच समिति भी बेबस
कलेक्टर के आदेश में स्पष्ट उल्लेख है कि समिति को मूल नस्ती और दस्तावेजों का परीक्षण कर प्रतिवेदन देना था। लेकिन रिकॉर्ड के अभाव में समिति की जांच भी अधर में लटक गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर प्रशासन की मंशा जांच पूरी करने की है या मामले को समय के साथ दबाने की?
फर्जी दिव्यांग प्रमाण-पत्रों के आधार पर नौकरी पाने के आरोप कोई साधारण मामला नहीं है। यदि आरोप सही हैं तो यह वास्तविक दिव्यांग अभ्यर्थियों के अधिकारों पर डाका है। और यदि रिकॉर्ड ही गायब कर दिए गए हैं तो यह अपने आप में गंभीर प्रशासनिक अपराध माना जाएगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कलेक्टर के आदेशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी? मूल रिकॉर्ड आखिर किसके कब्जे में है? और फर्जी दिव्यांग भर्ती घोटाले की जांच कब पूरी होगी?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बना रहेगा।
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