12वीं के बाद ही शुरू हो जाती है IAS बनने की असली जंग, लेकिन गरीबी सबसे बड़ी चुनौती — डिप्टी कमिश्नर ब्रह्मेन्द्र गुप्ता

“सपनों की उड़ान और संघर्ष की कहानी: UPSC की राह में गरीबी, संसाधनों की कमी और मानसिक दबाव सबसे बड़ी परीक्षा”
शिवपुरी। देश की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन प्रतियोगी परीक्षा UPSC सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी अब केवल स्नातक के बाद नहीं, बल्कि 12वीं कक्षा से ही शुरू करने की सलाह विशेषज्ञ देने लगे हैं। इसी गंभीर विषय पर जिला पंचायत शिवपुरी में पदस्थ डिप्टी कमिश्नर ब्रह्मेन्द्र गुप्ता से हुई विशेष बातचीत में उन्होंने बताया कि IAS, IPS और IFS जैसी सर्वोच्च सेवाओं तक पहुंचने का सपना देखने वाले विद्यार्थियों के लिए 12वीं के बाद का समय सबसे महत्वपूर्ण होता है।
उन्होंने कहा कि अधिकांश विद्यार्थी यह भूल कर बैठते हैं कि UPSC केवल किताबों का नहीं, बल्कि धैर्य, अनुशासन, व्यक्तित्व विकास और निरंतर संघर्ष का इम्तिहान है। यही कारण है कि कई प्रतिभाशाली छात्र केवल सही मार्गदर्शन के अभाव में पीछे रह जाते हैं।
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डिप्टी कमिश्नर श्री गुप्ता के अनुसार, गरीब परिवारों के बच्चों के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगी कोचिंग, अध्ययन सामग्री, डिजिटल संसाधनों और आर्थिक दबाव की होती है। ऐसे विद्यार्थी यदि हार मानने के बजाय NCERT की पुस्तकों, सरकारी पुस्तकालयों, समाचार पत्रों, ऑनलाइन अध्ययन सामग्री और नियमित स्वाध्याय को आधार बनाकर तैयारी करें तो सफलता उनसे दूर नहीं रहती। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि स्नातक तक के वर्षों का उपयोग बुनियादी तैयारी, NCERT, समसामयिक घटनाओं और उत्तर लेखन कौशल विकसित करने में करना लाभदायक होता है।
उन्होंने बताया कि UPSC की तैयारी शुरू करने से पहले परीक्षा का पूरा स्वरूप और पाठ्यक्रम समझना अनिवार्य है। परीक्षा तीन चरणों—प्रारंभिक परीक्षा (Prelims), मुख्य परीक्षा (Mains) और व्यक्तित्व परीक्षण (Interview)—में होती है। इसके पाठ्यक्रम में भारतीय इतिहास, भूगोल, संविधान एवं राजनीति, अर्थव्यवस्था, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, समसामयिक घटनाएं तथा वैकल्पिक विषय सहित व्यापक अध्ययन शामिल होता है।
श्री गुप्ता ने विद्यार्थियों को सलाह दी कि रोज अखबार पढ़ने की आदत विकसित करें, उत्तर लेखन का अभ्यास करें, समय प्रबंधन सीखें और सोशल मीडिया की अनावश्यक लत से दूरी बनाएं। उनका कहना था कि UPSC में सफलता केवल अधिक घंटे पढ़ने से नहीं, बल्कि सही दिशा में लगातार और योजनाबद्ध अध्ययन से मिलती है।
उन्होंने अभिभावकों से भी अपील की कि वे बच्चों पर केवल अंक लाने का दबाव न बनाएं, बल्कि उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दें। यदि परिवार का विश्वास, शिक्षक का मार्गदर्शन और विद्यार्थी की मेहनत एक साथ मिल जाए तो आर्थिक अभाव भी सफलता के रास्ते की स्थायी बाधा नहीं बन सकता।
यह विशेष साक्षात्कार उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है जो सीमित संसाधनों के बावजूद देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवाओं में पहुंचकर समाज और राष्ट्र की सेवा करने का सपना देख रहे हैं। संदेश स्पष्ट है—**सपने बड़े हों, लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत निरंतर हो, तो मंजिल अवश्य मिलती है।
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