आठ साल में भी सूखे नल! पिछोर की जल प्रदाय योजना बनी भ्रष्टाचार, घटिया निर्माण और सरकारी तंत्र की निगरानी पर बड़ा सवाल

3 साल में पूरा होने वाला काम आठ साल बाद भी अधूरा, 3300 कनेक्शन का दावा लेकिन घर-घर पानी नहीं; खाली टंकियां, बंद इंटेक वेल-ट्रीटमेंट प्लांट और घटिया सामग्री के आरोपों पर अब सीएमओ का नोटिस
पिछोर। नगरवासियों को घर-घर नियमित और पर्याप्त पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई पिछोर की जल प्रदाय योजना अब जनता की प्यास से ज्यादा सवालों की आग में तप रही है। जिस काम को अनुबंध के अनुसार करीब तीन वर्ष में पूरा होना था, वह करीब आठ वर्ष बाद भी अधूरा बताया जा रहा है। संबंधित एजेंसी मैसर्स रियान वाटर टेक पर करीब सात वर्षों तक योजना का काम करने के बावजूद इसे अधूरा छोड़कर चले जाने के आरोप हैं। नगर परिषद के वर्तमान सीएमओ आशुतोष त्रिपाठी ने अब इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए एजेंसी को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और नल कनेक्शन, पाइपलाइन, वाल्व, इंटेक वेल, ट्रीटमेंट प्लांट, जीएसआर, ओएचटी तथा वास्तविक जल प्रदाय व्यवस्था से जुड़े सवालों पर बिंदुवार जवाब और साक्ष्य मांगे हैं। नगर परिषद के पत्र में करीब 3300 घरेलू नल कनेक्शन दिए जाने का उल्लेख है, जबकि लगभग 5000 कनेक्शन प्रस्तावित बताए गए हैं, लेकिन दूसरी ओर वार्ड क्रमांक 01 से 15 तक कई क्षेत्रों में सभी घरों को कनेक्शन नहीं मिलने, कई कनेक्शनों में पानी को नियंत्रित करने वाले वाल्व नहीं लगाए जाने और अनेक मकानों में आज दिनांक तक प्रतिदिन पानी नहीं पहुंचने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल यह है कि कागजों में हजारों कनेक्शन और जमीन पर सूखे नल—आखिर यह कैसी जल प्रदाय योजना है?

मामला केवल अधूरे काम तक सीमित नहीं है। नगर परिषद के कारण बताओ नोटिस में इंटेक वेल और ट्रीटमेंट प्लांट के उपयोग को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। पत्र में एक नवीन जीएसआर, पूर्व में निर्मित दो जीएसआर और एक ओएचटी में पानी भरकर दिसंबर 2024 से जल प्रदाय किए जाने संबंधी जानकारी को असत्य एवं भ्रामक बताया गया है तथा टंकियों के खाली पड़े होने का उल्लेख किया गया है। यदि नगर परिषद के पत्र में दर्ज यह स्थिति जांच में सही पाई जाती है तो सवाल और भी बड़ा है—जब इंटेक वेल है, ट्रीटमेंट प्लांट है, जीएसआर और ओएचटी हैं, पाइपलाइन बिछाई गई है, फिर पिछोर के घरों में नियमित पानी क्यों नहीं पहुंच रहा? क्या इतनी बड़ी जल संरचनाएं जनता को पानी देने के लिए बनी थीं या सरकारी फाइलों में उपलब्धियां दर्ज कराने के लिए?
घटिया सामग्री और गुणवत्ता पर सवाल—क्या सरकारी धन के साथ हुआ खिलवाड़?
जल प्रदाय योजना में लगाए गए पाइप, नल, टोटियों, पाइपलाइन और अन्य सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी लंबे समय से शिकायतें और गंभीर आरोप सामने आते रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाए जाते रहे हैं कि कई स्थानों पर घटिया और गुणवत्ताविहीन सामग्री का इस्तेमाल किया गया तथा काम भी निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप नहीं किया गया। यदि यह आरोप जांच में सही साबित होते हैं तो मामला महज ठेकेदार की लापरवाही का नहीं रहेगा, बल्कि यह सवाल भी उठेगा कि घटिया सामग्री को मौके पर किसने स्वीकार किया, गुणवत्ता परीक्षण किसने किया, माप पुस्तिका में कार्य का सत्यापन किस अधिकारी ने किया और भुगतान किस आधार पर किया गया? ऐसे मामलों में केवल कंपनी से जवाब मांगना पर्याप्त नहीं होगा। स्वीकृत डीपीआर और तकनीकी स्पेसिफिकेशन, सामग्री की टेस्ट रिपोर्ट, गुणवत्ता प्रमाणपत्र, माप पुस्तिका, बिल-वाउचर, भुगतान अभिलेख, कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र तथा अधिकारियों द्वारा किए गए निरीक्षण की पूरी श्रृंखला की जांच जरूरी है। यदि जांच में घटिया निर्माण अथवा सरकारी धन को नुकसान पहुंचाने के तथ्य प्रमाणित होते हैं तो लागू अनुबंधीय, नगरपालिका, वित्तीय और तकनीकी नियमों के तहत जिम्मेदारी तय करने, क्षतिपूर्ति/वसूली तथा अन्य वैधानिक कार्रवाई पर निर्णय होना चाहिए।

कलेक्टर से पूर्व सीएमओ तक शिकायतें, फिर भी वर्षों तक कार्रवाई क्यों नहीं?
इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार कलेक्टर से लेकर नगर परिषद के पूर्व सीएमओ तक जल प्रदाय योजना की शिकायतों को लेकर लगातार पत्राचार और शिकायतें की गईं। यदि वर्षों पहले अधिकारियों के संज्ञान में योजना की कमियां, घटिया काम, अधूरी पाइपलाइन, पानी की समस्या और एजेंसी की कार्यप्रणाली संबंधी शिकायतें पहुंच रही थीं तो यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि उन शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई? क्या स्थल निरीक्षण कराया गया? क्या तकनीकी जांच हुई? क्या गुणवत्ता परीक्षण हुआ? क्या कंपनी को नोटिस दिया गया? क्या अनुबंध की शर्तों के अनुसार दंड लगाया गया? क्या भुगतान रोका गया या किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय की गई? यदि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि आखिर किस स्तर पर फाइलें रुकीं और क्यों? और यदि शिकायतें गलत थीं तो अब नगर परिषद के वर्तमान नोटिस में उठाए गए इतने गंभीर सवाल सामने कैसे आए?
तीन साल की समयसीमा, आठ साल की कहानी—कंपनी पर सवाल के साथ निगरानी तंत्र भी कटघरे में
नगर परिषद के अनुसार योजना के कार्य और संचालन में कुप्रबंधन के कारण नगर के विभिन्न हिस्सों में नियमित जल प्रदाय प्रभावित है। सीएम हेल्पलाइन एवं अन्य माध्यमों से शिकायतें प्राप्त होने, पूरे नगर में स्लूज वाल्व नहीं लगाए जाने और कई घरों तक प्रतिदिन पानी नहीं पहुंचने का उल्लेख भी कारण बताओ नोटिस में किया गया है। स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप है कि संबंधित कंपनी करीब सात वर्षों तक काम करती रही और अंततः काम अधूरा छोड़कर पीछे हट गई। यदि निर्धारित समय तीन वर्ष था और काम आठ साल तक खिंच गया तो यह केवल कंपनी की देरी नहीं, बल्कि निगरानी और अनुबंध प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है। ठेकेदार काम करता है, लेकिन काम की गुणवत्ता और प्रगति की निगरानी संबंधित विभाग और अधिकारियों की जिम्मेदारी भी होती है। इसलिए जांच यदि गंभीर अनियमितता सामने लाती है तो जिम्मेदारी केवल कंपनी तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं होगा।

अब सीएमओ के सामने सबसे बड़ी चुनौती—नोटिस से आगे बढ़ेगा मामला या फिर फाइल में दब जाएगा?
सीएमओ आशुतोष त्रिपाठी द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी करना निश्चित रूप से इस मामले में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है, लेकिन अब पिछोर की जनता की निगाह आगे की कार्रवाई पर है। सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई भी पूर्व की तरह नोटिस, जवाब और पत्राचार तक सीमित रहेगी, या इस बार पूरे मामले की तकनीकी एवं प्रशासनिक जांच कराकर जिम्मेदारी तय की जाएगी? यदि एजेंसी का जवाब संतोषजनक नहीं पाया जाता और जांच में अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन, घटिया कार्य, घटिया सामग्री, अनावश्यक देरी अथवा सरकारी धन की क्षति प्रमाणित होती है तो लागू नियमों के अनुसार अनुबंधीय दंड, क्षतिपूर्ति/वसूली, अधूरे कार्य को पूरा कराने, भुगतान की समीक्षा तथा दोषियों के विरुद्ध आवश्यक वैधानिक कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं यदि जांच में गंभीर वित्तीय अनियमितता, फर्जी अभिलेख, मिलीभगत अथवा सरकारी धन को नुकसान पहुंचाने जैसे प्रथमदृष्टया तथ्य सामने आते हैं तो सक्षम जांच/वैधानिक प्राधिकारी के स्तर पर मामला आगे ले जाने की जरूरत भी सामने आ सकती है।
पिछोर की प्यासी जानता का भरोसा अब सिर्फ महज आंकड़े पर नहीं, नल में पानी चाहिए
आठ साल किसी योजना के लिए मामूली समय नहीं है। इस दौरान अधिकारी बदले, शिकायतें हुईं, पत्राचार हुए, आश्वासन मिले और योजना पर काम चलता रहा—लेकिन यदि आज भी कई घरों में नियमित पानी नहीं पहुंच रहा है तो यह व्यवस्था की सफलता नहीं, बल्कि जवाबदेही का सबसे बड़ा सवाल है। पिछोर की जनता अब यह जानना चाहती है कि योजना पर कितना पैसा खर्च हुआ, कितना काम स्वीकृत था, कितना वास्तव में हुआ, कितने कनेक्शन चालू हैं, कितनी टंकियां वास्तव में उपयोग में हैं, इंटेक वेल और ट्रीटमेंट प्लांट क्यों नहीं चल रहे, घटिया सामग्री की शिकायतों की जांच क्यों नहीं हुई और निर्धारित समय से पांच वर्ष अधिक लगने के बावजूद जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
अब मामला सिर्फ पानी का नहीं है—मामला जनता के पैसे, जनता के अधिकार और आठ साल से चले आ रहे इंतजार का है। सीएमओ आशुतोष त्रिपाठी ने कार्रवाई की शुरुआत कर दी है, अब पिछोर देख रहा है कि यह कार्रवाई सिर्फ नोटिस की स्याही तक रहती है या जांच की मेज से निकलकर जिम्मेदारी, वसूली और वैधानिक कार्रवाई तक पहुंचती है। क्योंकि जनता को कागज पर 3300 कनेक्शन नहीं चाहिए—उसे अपने घर की टोंटी से रोज पानी चाहिए। और यदि योजना में भ्रष्टाचार, घटिया एवं गुणवत्ताविहीन काम या सरकारी धन की अनियमितता जांच में साबित होती है, तो जनता अब सिर्फ पानी नहीं, पूरे आठ साल का हिसाब भी मांग रही है।
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