शराब के खिलाफ जंग या किसी का कूटरचित खेल?

शराबबंदी की मुहिम के बीच बड़ा सवाल: महिलाओं को आगे कर कौन बना रहा टकराव का माहौल?
शिवपुरी। जिले में पिछले कुछ दिनों से शराबबंदी को लेकर जगह-जगह विरोध सामने आ रहा है। महिलाएं सड़क पर उतर रही हैं, शराब दुकानों के खिलाफ आवाज उठा रही हैं और सोशल मीडिया पर भी इससे जुड़े वीडियो लगातार सामने आ रहे हैं। शराब के खिलाफ यह मुहिम निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है। शराब ने कितने ही परिवारों को बर्बाद किया है, इसलिए इसके खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने के बजाय गंभीरता से सुना जाना चाहिए। लेकिन हाल के घटनाक्रम ने इस मुहिम के साथ एक दूसरा और बेहद जरूरी सवाल भी खड़ा कर दिया है—विरोध शराब के खिलाफ है या बात अब कानून-व्यवस्था से टकराव तक पहुंच रही है?
अमोलपठा से सामने आए सोशल मीडिया वीडियो में भीड़ और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति दिखाई देने की चर्चा है। यहां तक कहा जा रहा है कि पुलिस को भीड़ के बीच से निकलने में मुश्किल हुई। वीडियो की वास्तविकता और पूरे घटनाक्रम की पुष्टि जांच का विषय है, लेकिन यदि तस्वीरें सही हैं तो प्रशासन को इसे गंभीरता से लेना होगा। पुलिस जनता की सुरक्षा के लिए होती है। अगर पुलिस ही भीड़ के सामने असहाय नजर आने लगे तो यह किसी भी जिले के लिए अच्छी स्थिति नहीं है।
शराब की बिक्री जिले में वर्षों से चली आ रही है। अवैध शराब की शिकायतें भी नई नहीं हैं। फिर पिछले कुछ दिनों में विरोध का यह रूप अचानक इतना तेज कैसे हो गया? महिलाओं को आगे कौन कर रहा है? भीड़ जुटाने और विरोध को उग्र बनाने के पीछे कौन है? क्या यह पूरी तरह स्वत:स्फूर्त जनआक्रोश है या इसके पीछे किसी संगठन, नेता अथवा प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका है? इन सवालों का जवाब आरोप लगाकर नहीं, निष्पक्ष जांच से सामने आना चाहिए।
महिलाओं का शराब का विरोध करना अपने आप में गलत नहीं है। बल्कि शराब से सबसे ज्यादा परेशानी झेलने वाले परिवारों की महिलाओं की आवाज को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन महिलाओं की ताकत को किसी के निजी, राजनीतिक या दूसरे स्वार्थ की ढाल बनाना भी उतना ही गलत है। यदि किसी ने महिलाओं को आगे करके कानून हाथ में लेने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या पुलिस से टकराव की स्थिति पैदा करने की कोशिश की है तो उसकी पहचान होना जरूरी है।
यहां किसी समुदाय को कटघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं होगा। कुछ स्थानों पर आदिवासी महिलाओं की अधिक भागीदारी दिखाई देने की बात कही जा रही है, लेकिन केवल इससे किसी साजिश का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। हां, यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी व्यक्ति या संगठन ने महिलाओं को उकसाया, उन्हें आगे किया या भीड़ को भड़काने की कोशिश की, तो कार्रवाई उस व्यक्ति तक भी पहुंचनी चाहिए जिसने माहौल तैयार किया।
और अगर जांच में किसी नेता, संगठन या सरकारी कर्मचारी की भूमिका सामने आती है तो उसके पद या प्रभाव को देखकर कार्रवाई रुकनी नहीं चाहिए। कानून सबके लिए एक है। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि सोशल मीडिया की चर्चा को आधार बनाकर किसी निर्दोष को दोषी न ठहराया जाए।
दूसरा बड़ा सवाल अवैध शराब की बिक्री का है। जिले में यदि सरकारी दुकानों के अलावा ढाबों, होटलों या अन्य जगहों पर शराब बेचे जाने की शिकायतें हैं तो आबकारी विभाग और पुलिस को इसकी तह तक जाना होगा। केवल दुकान पर कार्रवाई करके मामला खत्म नहीं होना चाहिए। अवैध शराब कहां से आती है, कौन पहुंचाता है, कौन बेचता है और शिकायतों के बावजूद वहां तक विभाग क्यों नहीं पहुंच पाया—इन सवालों के जवाब भी जरूरी हैं।
पुलिस और आबकारी विभाग द्वारा लोगों से अवैध शराब की सूचना देने की अपील अच्छी पहल है। लेकिन अब जनता यह भी देखना चाहेगी कि सूचना मिलने के बाद कार्रवाई कितनी तेजी से होती है। कितने मामले दर्ज होते हैं, कितनी शराब पकड़ी जाती है और जिन इलाकों में बार-बार शिकायतें मिलती हैं वहां जिम्मेदारी किसकी तय होती है।
शराबबंदी की मुहिम को सफल बनाना है तो रास्ता साफ है—अवैध शराब बेचने वाले पर कार्रवाई हो, शराब के नेटवर्क पर शिकंजा कसे और कानून हाथ में लेने वाले पर भी कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।
शराब की दुकान में तोड़फोड़ करके शराब की समस्या खत्म नहीं होगी। पुलिस को घेरकर नशे की समस्या खत्म नहीं होगी। इसके लिए प्रशासन को मजबूत कार्रवाई करनी होगी और समाज को भी कानून के रास्ते पर चलना होगा।
महिलाओं को आगे आना है तो वे मजबूती से आएं, लेकिन किसी की ढाल बनकर नहीं। शराब का विरोध करना है तो खुलकर करें, लेकिन कानून के दायरे में। शिकायत है तो पुलिस, आबकारी विभाग और प्रशासन के सामने रखें। यही रास्ता आंदोलन को भी ताकत देगा और कार्रवाई को भी।
अब पुलिस के सामने भी जिम्मेदारी कम नहीं है। यदि कहीं अवैध शराब बिक रही है तो उसे रोकना होगा और यदि कहीं शराबबंदी के नाम पर भीड़ को उकसाया जा रहा है तो उसकी भी पड़ताल करनी होगी। शराब बेचने वाले और माहौल बिगाड़ने वाले—दोनों की पहचान जरूरी है।
क्योंकि सवाल केवल शराब की बोतल का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें आम आदमी सुरक्षित रहे और उसे भरोसा रहे कि कानून उसके साथ है।
शिवपुरी को शराब से मुक्ति चाहिए, लेकिन अराजकता की कीमत पर नहीं। महिलाओं की आवाज चाहिए, लेकिन उन्हें किसी के स्वार्थ की ढाल बनाकर नहीं। विरोध चाहिए, लेकिन कानून को कमजोर करके नहीं।
और अगर जांच में यह साबित होता है कि किसी ने जानबूझकर महिलाओं को आगे कर माहौल गरमाया, भीड़ जुटाई या पुलिस-प्रशासन से टकराव कराया, तो कार्रवाई केवल सामने खड़े लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जिसने माहौल बनाया, जवाबदेही भी उसकी तय होनी चाहिए।
यही शराबबंदी की मुहिम को सही दिशा देगा और यही कानून के राज को करेगा।
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