“20 साल तक बच्चों का भविष्य संवारा… अब सरकार बोली- ये हमारे कर्मचारी ही नहीं!”

3 लाख शिक्षकों की नौकरी, पेंशन और पूरी सेवा पर मंडराया सबसे बड़ा संकट
हाईकोर्ट में सरकार के हलफनामे ने मचा दिया बवाल, 1997 से 2018 तक की सेवा “शून्य” होने का खतरा
भोपाल। मध्यप्रदेश में करीब 3 लाख शिक्षकों के भविष्य पर ऐसा संकट खड़ा हो गया है, जिसने पूरे शिक्षा तंत्र को हिला दिया है। जिन शिक्षकों ने गांव-गांव, स्कूल-स्कूल में 20 साल तक बच्चों को पढ़ाया, सरकारी योजनाएं लागू कराईं, चुनाव ड्यूटी से लेकर जनगणना तक हर जिम्मेदारी निभाई… अब उन्हीं के बारे में सरकार अदालत में कह रही है—“वे हमारे कर्मचारी थे ही नहीं।”
जबलपुर हाईकोर्ट में दाखिल एक हलफनामे ने लाखों शिक्षकों की पुरानी पेंशन, वरिष्ठता और पूरी नौकरी की वैधता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से कोर्ट में कहा गया कि 1997, 1998, 2001 और 2005 में भर्ती हुए शिक्षाकर्मी, संविदा शिक्षक और अध्यापक वास्तव में पंचायतों और नगरीय निकायों के कर्मचारी थे, राज्य सरकार के नहीं।
यानी जिन शिक्षकों ने दो दशक तक सरकारी स्कूलों में पढ़ाया, सरकार अब उनकी 1997 से 2018 तक की सेवा को “सरकारी सेवा” मानने से पीछे हटती दिख रही है।

“काम सरकार का, वेतन सरकार का… लेकिन कर्मचारी नहीं?”
सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो रहा है कि अगर ये शिक्षक सरकार के कर्मचारी नहीं थे, तो फिर—
- वे सरकारी स्कूलों में किसके आदेश पर पढ़ा रहे थे?
- उनका वेतन शिक्षा विभाग के बजट से क्यों दिया गया?
- ट्रांसफर, ट्रेनिंग, प्रमोशन और ड्यूटी के आदेश मंत्रालय से क्यों जारी होते रहे?
- चुनाव, सर्वे, जनगणना और सरकारी योजनाओं में इन्हें सरकारी कर्मचारी मानकर क्यों लगाया गया?
शिक्षकों का कहना है कि पंचायत और निकाय सिर्फ भर्ती कराने की “एजेंसी” थे, असली नियंत्रण हमेशा स्कूल शिक्षा विभाग के पास ही रहा।
“2018 में नया कैडर बनाकर फिर नई नियुक्ति?”
अब 20 साल की सेवा पर फेरने की तैयारी?
सरकार ने कोर्ट में दलील दी कि 2018 में अध्यापकों को नए कैडर में शामिल कर नई नियुक्ति दी गई थी। इसलिए इससे पहले की सेवा को पेंशन और वरिष्ठता के लिए नहीं जोड़ा जा सकता।
यदि सरकार का यह तर्क अदालत में स्वीकार हो गया, तो लाखों शिक्षकों की—
- पुरानी पेंशन खत्म हो सकती है
- 20 साल की वरिष्ठता शून्य हो सकती है
- प्रमोशन प्रभावित हो सकते हैं
- रिटायरमेंट लाभों पर संकट आ सकता है
यानी जिसने जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण साल स्कूलों में खपा दिए, उसकी पूरी सेवा “गायब” मानी जा सकती है।

कैग रिपोर्ट ने भी खोली परतें
2023-24 की कैग रिपोर्ट ने भी इस पूरे मामले में बड़ा खुलासा किया था। रिपोर्ट में कहा गया कि स्कूलों की चल-अचल संपत्ति और स्टाफ का वास्तविक हस्तांतरण पंचायतों और निकायों को कभी हुआ ही नहीं।
यानी कागजों में भले विकेंद्रीकरण दिखाया गया, लेकिन नियंत्रण हमेशा सरकार और शिक्षा विभाग के पास ही रहा।
विभागीय अफसरों के बयान ने बढ़ाया विवाद
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब डीपीआई डायरेक्टर केके द्विवेदी ने कहा—
“मैंने कोई हलफनामा नहीं दिया।”
जबकि हलफनामे की कॉपियां पहले से वायरल हैं और शिक्षकों के संगठनों के पास मौजूद बताई जा रही हैं। इससे अब सवाल उठ रहा है कि आखिर कोर्ट में सरकार की ओर से यह पक्ष किस स्तर पर तैयार किया गया?
“भर्ती हमने की, कर्मचारी हमारे नहीं”
सरकार के ही विभागों के बयान आमने-सामने
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग और नगरीय विकास विभाग के अधिकारियों ने भी साफ कहा कि उन्होंने केवल भर्ती प्रक्रिया कराई थी, शिक्षक उनके कर्मचारी नहीं थे।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर पंचायत के नहीं… शिक्षा विभाग के नहीं… तो आखिर ये 3 लाख शिक्षक किसके कर्मचारी थे?
3 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
लाखों परिवारों की नजर हाईकोर्ट पर टिकी
इस मामले की अगली सुनवाई 3 जुलाई को प्रस्तावित है। प्रदेश के लाखों शिक्षक और उनके परिवार अब अदालत की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।
क्योंकि यह सिर्फ पेंशन का मामला नहीं…
यह उन लोगों के सम्मान का सवाल है जिन्होंने अपना पूरा जीवन सरकारी स्कूलों में खपा दिया।
और आज वही व्यवस्था उनसे पूछ रही है—
“तुम आखिर हो किसके कर्मचारी?”
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