पेट्रोल भराया, गाड़ी बंद! शिवपुरी में ‘ईंधन’ पर बड़ा सवाल—टंकी से पेट्रोल के साथ पानी निकलने की शिकायतों ने मचाई खलबली

पेट्रोल-डीजल भरवाने के बाद वाहन बंद होने की बढ़ती शिकायतों ने खड़े किए सवाल, मैकेनिकों तक पहुंच रहीं खराब बाइकें—उपभोक्ता पूछ रहा है, गुणवत्ता की जांच कौन करेगा?
शिवपुरी। पेट्रोल-डीजल की कीमतों ने पहले ही आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ा रखा है। अब वाहन में पेट्रोल या डीजल भरवाने के बाद गाड़ी खराब होने की लगातार सामने आ रही शिकायतों ने चिंता बढ़ा दी है। जिले में दोपहिया और चारपहिया वाहन चालकों की ओर से ईंधन भरवाने के बाद वाहन बंद होने, स्टार्ट नहीं होने और इंजन में खराबी आने जैसी शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है। कुछ वाहन मालिकों का दावा है कि मैकेनिक के यहां जांच के दौरान ईंधन में पानी मिला पाया गया।

यदि शिकायतों में दम है तो मामला बेहद गंभीर है। क्योंकि उपभोक्ता पेट्रोल पंप पर पूरा पैसा देकर ईंधन खरीदता है और बदले में उसे ऐसा ईंधन मिलना चाहिए जो निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरे। ईंधन में पानी या अन्य मिलावट की मौजूदगी न केवल वाहन के इंजन को नुकसान पहुंचा सकती है, बल्कि वाहन चलते समय बंद होने पर सड़क सुरक्षा का जोखिम भी पैदा कर सकती है।

टंकी से पेट्रोल कम, पानी ज्यादा निकलने की शिकायतें
वाहन मैकेनिकों के यहां पहुंच रहे कुछ वाहन मालिकों द्वारा यह शिकायत किए जाने की बात सामने आ रही है कि पेट्रोल पंप से ईंधन भरवाने के बाद उनकी बाइक या कार ने रास्ते में जवाब दे दिया। टंकी और ईंधन प्रणाली की जांच के दौरान पानी मिलने का दावा भी किया जा रहा है।
इन शिकायतों की स्वतंत्र और वैज्ञानिक पुष्टि होना जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि जब ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं तो संबंधित विभागों ने अब तक इसकी व्यापक जांच क्यों नहीं कराई?

एक वाहन खराब होना सामान्य यांत्रिक समस्या हो सकती है, लेकिन यदि एक ही तरह की शिकायतें अलग-अलग उपभोक्ताओं से लगातार सामने आती हैं और उनका संबंध ईंधन की गुणवत्ता से निकलता है, तो इसे महज संयोग मानकर छोड़ना जनता के हित में नहीं होगा।
महंगा पेट्रोल, महंगी मरम्मत और ऊपर से जिम्मेदारी तय नहीं
महंगाई के दौर में आम आदमी पहले ही पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमत का बोझ उठा रहा है। ऐसे में खराब ईंधन की वजह से वाहन में खराबी आती है तो उपभोक्ता को पेट्रोल की कीमत के अलावा मैकेनिक, पार्ट्स और मरम्मत का अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ता है।
सबसे बड़ी परेशानी यह है कि आम उपभोक्ता के पास यह जांचने का कोई आसान तरीका नहीं होता कि पंप से उसकी गाड़ी में भरा गया ईंधन वास्तव में निर्धारित गुणवत्ता का था या नहीं। वह मीटर पर दिखाई गई रकम चुकाता है और ईंधन लेकर चला जाता है। गाड़ी रास्ते में बंद हो जाए तो नुकसान उसी का।
अब सवाल नापतौल और संबंधित विभाग की निगरानी पर
ऐसी शिकायतों के बीच नापतौल और संबंधित खाद्य/आपूर्ति तंत्र की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। पेट्रोल पंपों पर माप की शुद्धता और ईंधन की गुणवत्ता की निगरानी के लिए व्यवस्था मौजूद है तो उसका असर जमीन पर दिखाई क्यों नहीं देता?
जिले में कितने पेट्रोल पंपों से हाल में ईंधन के नमूने लिए गए? कितने नमूनों की प्रयोगशाला में जांच हुई? कितने पंपों पर गुणवत्ता संबंधी कार्रवाई हुई? शिकायत मिलने पर जांच की प्रक्रिया क्या है? और सबसे अहम—क्या जिले के सभी पेट्रोल पंपों की नियमित और औचक जांच हो रही है?
प्रशासन चाहे तो एक जांच से खुल सकता है पूरा मामला
जिला प्रशासन को चाहिए कि शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए जिले के पेट्रोल पंपों की औचक जांच कराए। पेट्रोल और डीजल के नमूने लेकर अधिकृत प्रयोगशाला में जांच कराई जाए। पंपों के टैंक, स्टॉक, डिस्पेंसिंग यूनिट और माप की व्यवस्था की भी जांच हो।
सिर्फ कागजों में निरीक्षण पूरा कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि किसी पंप का ईंधन मानकों पर खरा उतरता है तो जांच से उसकी पुष्टि हो जाएगी और यदि कहीं गड़बड़ी मिलती है तो जिम्मेदारी भी तय की जा सकेगी।
उपभोक्ता का पैसा और वाहन दोनों सुरक्षित रहें
पेट्रोल पंप पर पहुंचने वाला हर व्यक्ति उपभोक्ता है और उसका अधिकार है कि उसे निर्धारित मानकों वाला ईंधन मिले। किसी भी स्तर पर मिलावट या घटिया गुणवत्ता की पुष्टि होती है तो कार्रवाई केवल कागजी नहीं, प्रभावी होनी चाहिए।
फिलहाल सबसे जरूरी है कि शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो। क्योंकि सवाल सिर्फ पेट्रोल का नहीं है—सवाल उस भरोसे का है जिसके आधार पर आम आदमी पेट्रोल पंप पर पूरा पैसा चुका रहा है।
यदि ईंधन शुद्ध है तो जांच यह साबित कर देगी। और अगर कहीं मिलावट है, तो यह भी सामने आना चाहिए कि पंप की टंकी तक पानी पहुंचा कैसे और निगरानी तंत्र की नजर वहां तक क्यों नहीं पहुंची?
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