14 आपत्तियों से सड़कों तक पहुंचा चुनाव आयोग विवाद वोटर लिस्ट की ‘छंटाई’ से उठा तूफान,

चुनाव आयोग के भीतर ही उठे सवाल तो जंतर-मंतर पर गूंजा इस्तीफे का नारा; 60 से ज्यादा हिरासत में, देशभर में प्रदर्शन और अब अदालत तक पहुंचा मामला
नई दिल्ली। आखिर ऐसा क्या हुआ कि देश में चुनाव कराने वाली सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था के मुखिया के इस्तीफे की मांग जंतर-मंतर से लेकर देश के कई शहरों तक पहुंच गई? कहानी किसी एक दिन के प्रदर्शन से शुरू नहीं हुई। इसकी जड़ Special Intensive Revision यानी SIR के जरिए मतदाता सूचियों की व्यापक जांच में है। विवाद तब भड़का जब इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में मतदाता नाम जोड़ने-हटाने, Form-6, चुनावी डेटाबेस और SIR की प्रक्रिया से जुड़े फैसलों पर आपत्तियों का उल्लेख है।

यहीं से मामला गर्म हुआ। रिपोर्ट में सामने आया कि SIR के दौरान ऑनलाइन Form-6 में अतिरिक्त घोषणा से जुड़े बदलाव को लेकर भी आपत्ति हुई थी। पहली बार मतदाता बनने वाले लोगों से अपने, माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR वाली मतदाता सूची में होने संबंधी जानकारी मांगने की व्यवस्था पर सवाल उठे। रिपोर्ट के मुताबिक एक चुनाव आयुक्त ने कुछ कदमों को “unauthorised and illegal” तक बताया। गोवा में 97 मतदाताओं का मामला भी रिपोर्ट में आया, जहां स्थानीय स्तर पर पात्र पाए गए मतदाताओं के नाम सॉफ्टवेयर संबंधी समस्या के कारण अंतिम सूची में नहीं आ सके।
इसके बाद सवाल सिर्फ SIR का नहीं रहा—सवाल चुनाव आयोग के भीतर की कार्यप्रणाली का हो गया। एक तरफ रिकॉर्ड पर 14 आपत्तियों की रिपोर्ट, दूसरी तरफ आयोग का कहना है कि अलग-अलग राय संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और महत्वपूर्ण फैसले अंततः तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए। दिलचस्प यह भी है कि इसी अवधि में आयोग ने कई मौकों पर संयुक्त प्रेस ब्रीफिंग भी कीं। यानी अंदरूनी आपत्तियों और सार्वजनिक रूप से दिखती एकजुटता—दोनों तस्वीरें एक साथ सामने आईं।
फिर सड़क पर सवाल उतर आया। 24 सितंबर को Cockroach Janta Party ने CEC ज्ञानेश कुमार को 48 घंटे में इस्तीफा देने की मांग रखी और SIR रोकने सहित अन्य मांगें उठाईं। 25 सितंबर को जंतर-मंतर पर AISA और नागरिक संगठनों से जुड़े लोगों का प्रदर्शन हुआ। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर में प्रवेश नहीं करने दिया और इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 60 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और AISA अध्यक्ष नेहा बोरा सहित कई नाम भी हिरासत में लिए गए लोगों में बताए गए।
लेकिन आंदोलन यहीं नहीं रुका। कांग्रेस ने 25 सितंबर को देशभर में प्रदर्शन किए। दिल्ली के अलावा पटना, पणजी, बेंगलुरु समेत कई जगहों से विरोध की खबरें आईं। गोवा में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर CEC के इस्तीफे की मांग उठी, जबकि कर्नाटक में भी SIR के खिलाफ प्रदर्शन हुआ। यूथ कांग्रेस ने 26 सितंबर से 15 अक्टूबर तक जंतर-मंतर पर धरने के लिए दिल्ली पुलिस से अनुमति मांगी है।
अब मामला अदालत की चौखट तक पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कथित वैधानिक उल्लंघनों की जांच और SIR से जुड़े फैसलों की जांच की मांग की गई है। वहीं बॉम्बे हाईकोर्ट में भी SIR से जुड़े 14 आदेशों को चुनौती देने और हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग वाली याचिका सामने आई है। ये याचिकाएं आरोप और मांगी गई राहत हैं—अदालत ने इनमें लगाए आरोपों को अभी अंतिम रूप से सही ठहराया है, ऐसा कहना उचित नहीं होगा।
यही वह जगह है जहां पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—अगर 14 आपत्तियां दर्ज हुईं तो उनका निपटारा कैसे हुआ? किन आपत्तियों को माना गया और किन्हें क्यों खारिज किया गया? SIR में नाम जोड़ने-हटाने के फैसलों का ऑडिट कौन करेगा? और सबसे अहम—जिस मतदाता का नाम सूची से बाहर हो गया, उसके अधिकार की अंतिम सुरक्षा किसके हाथ में है?
इस्तीफे की मांग करने वाले इन सवालों को चुनावी भरोसे का संकट बता रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण कानून और निर्धारित प्रक्रिया के तहत हो रहा है तथा अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। इसलिए अभी सबसे बड़ा तथ्य यह नहीं कि किसका आरोप सही साबित हो चुका है; बड़ा सवाल यह है कि रिकॉर्ड पर दर्ज आपत्तियों, SIR के फैसलों और मतदाता सूची में हुए बदलावों का पूरा सच सार्वजनिक जांच की कसौटी पर कब और कैसे सामने आएगा।
जंतर-मंतर पर उठी आवाज अब सिर्फ ‘इस्तीफा दो’ के नारे तक सीमित नहीं रह गई है—वह देश के उस रिकॉर्ड की तरफ इशारा कर रही है, जिसमें मतदाता का नाम, चुनावी प्रक्रिया और आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां दर्ज हैं। अब नजर इस बात पर है कि इन सवालों का जवाब सड़क देगी, संसद देगी या अदालत।
विरोध आज भी जारी रहा और यूथ कांग्रेस ने 26 सितंबर से 15 अक्टूबर तक जंतर-मंतर पर धरने की अनुमति मांगी है।
Live Cricket Info






