जय जगन्नाथ के जयघोष से गूंजा विश्व… भक्ति के महासागर में उतरे करोड़ों श्रद्धालु

धरती पर निकले जग के नाथ, रथ की एक झलक पाने उमड़ा जनसैलाब – पुरी धाम बना साक्षात वैकुण्ठ
पुरी (ओडिशा)। आस्था, श्रद्धा और सनातन संस्कृति के सबसे विराट महापर्व श्रीजगन्नाथ रथयात्रा ने गुरुवार को पूरी दुनिया को भक्ति के रंग में रंग दिया। जैसे ही भगवान श्रीजगन्नाथ, बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने दिव्य एवं भव्य रथों पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से निकले, पूरा पुरी धाम “जय जगन्नाथ… हरि बोल… जय बलभद्र… जय मां सुभद्रा” के गगनभेदी जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं की आंखें नम थीं, हाथ जुड़े थे और हजारों-लाखों श्रद्धालु प्रभु के रथ की रस्सियां खींचने को अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मान रहे थे।

यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि सनातन धर्म की वह जीवंत परंपरा है, जिसमें भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। मान्यता है कि रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने मौसीबाड़ी (गुंडिचा मंदिर) की यात्रा करते हैं और जो श्रद्धालु इस दिन उनके दर्शन कर लेते हैं, उन्हें विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के अनेक देशों से श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।
Kiरथयात्रा की शुरुआत प्राचीन वैदिक परंपराओं के अनुरूप ‘पहंडी विजय’ से हुई। इसके बाद गजपति महाराज ने स्वर्ण झाड़ू से भगवान के रथों की सफाई कर ‘छेरा पहरा’ की परंपरा निभाई। यह अनुष्ठान सनातन संस्कृति का वह अद्वितीय संदेश देता है कि भगवान के समक्ष राजा और सामान्य जन सभी समान हैं।
विशाल नंदीघोष रथ पर भगवान श्रीजगन्नाथ, तालध्वज रथ पर भगवान बलभद्र और दर्पदलन रथ पर देवी सुभद्रा के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। पुरी की बड़दांडा सड़क मानो आस्था के महासागर में बदल गई, जहां हर ओर शंखध्वनि, घंटों की गूंज, हरिनाम संकीर्तन और वैदिक मंत्रोच्चार से वातावरण दिव्य हो उठा।
इस वर्ष भी श्रद्धालुओं की अभूतपूर्व भीड़ को देखते हुए व्यापक सुरक्षा प्रबंध किए गए। प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य सेवाओं और स्वयंसेवकों ने व्यवस्थाओं को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भीड़ अधिक होने के कारण कुछ स्थानों पर दबाव की स्थिति भी बनी, जिसके बाद प्रशासन ने अतिरिक्त सतर्कता बरती।
सनातन आस्था का सबसे बड़ा संदेश
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समानता, सेवा, करुणा, समरसता और मानवता का शाश्वत संदेश है। यह पर्व बताता है कि जब भगवान स्वयं अपने भक्तों के द्वार तक आते हैं, तब जाति, वर्ग, भाषा और सीमाओं का हर भेद समाप्त हो जाता है। यही कारण है कि पुरी की रथयात्रा आज केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व की सबसे महान आध्यात्मिक यात्राओं में गिनी जाती है।
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“रथ की रस्सी थामना माना जाता है परम सौभाग्य”
सनातन मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सी खींचने और रथयात्रा के दर्शन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। इसी आस्था ने इस महापर्व को विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में स्थान दिलाया है।
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