“खून नहीं मिला… या इंसानियत मर गई?” 13 माह की मासूम की मौत ने शिवपुरी के स्वास्थ्य तंत्र की आत्मा को नंगा कर दिया !

शिवपुरी। सिर्फ 13 महीने की एक मासूम बच्ची…जिसे अभी “मां” शब्द भी ठीक से बोलना नहीं आया होगा…जिसकी हथेलियों में अभी खिलौनों की गर्माहट होनी चाहिए थी…वह अस्पताल के बिस्तर पर खून का इंतज़ार करते-करते मौत की गोद में चली गई। और दूसरी तरफ सिस्टम था…फाइलों में दबा हुआ…कुर्सियों पर जमे हुए लोग थे…जो बस इतना कहते रहे—“ब्लड उपलब्ध नहीं है…”
लेकिन अब सवाल यह है कि आखिर ब्लड नहीं था… या व्यवस्था की रगों में बहता इंसानियत का खून सूख चुका था…?
यह सिर्फ एक बच्ची की मौत नहीं है। यह शिवपुरी के स्वास्थ्य तंत्र के मुंह पर पड़ा ऐसा करारा तमाचा है जिसकी आवाज़ अब हर गली, हर मोहल्ले और हर संवेदनशील इंसान के दिल में गूंज रही है।
क्योंकि जिस शहर में एक फोन पर युवा रात के अंधेरे में रक्तदान करने निकल पड़ते हों…
जहाँ लोग अनजान मरीजों के लिए भी अपना खून देने को तैयार रहते हों…
जहाँ रक्तदान को सेवा नहीं, इंसानियत का धर्म माना जाता हो…
वहाँ एक मासूम बच्ची “खून नहीं मिलने” से मर जाए—
यह हादसा नहीं, सीधा-सीधा प्रशासनिक पाप है।
कहाँ था मेडिकल कॉलेज…? कहाँ था ब्लड बैंक…?
सबसे बड़ा सवाल मेडिकल कॉलेज प्रशासन, ब्लड बैंक प्रबंधन और अस्पताल की आपातकालीन व्यवस्था पर खड़ा होता है।
यदि अस्पताल में एबी पॉजिटिव रक्त उपलब्ध नहीं था तो तत्काल शहर के रक्तदाता समूहों, सामाजिक संगठनों, रेडक्रॉस, स्वयंसेवी टीमों, सोशल मीडिया नेटवर्क या रक्तदान मिशन चलाने वाले युवाओं को सूचना क्यों नहीं दी गई…?
किसके आदेश पर रोका…?या फिर किसी ने कोशिश ही नहीं की…?
क्या ब्लड बैंक अब सिर्फ रजिस्टर भरने की जगह बनकर रह गए हैं…?
क्या वहां बैठे कर्मचारियों का काम सिर्फ इतना रह गया है कि वे मरीज के परिजनों से कह दें—“ब्लड नहीं है…”और फिर अगली फाइल पलट दें…? यदि आपातकाल में भी सिस्टम जाग नहीं सकता, तो फिर ऐसे सिस्टम के अस्तित्व का मतलब क्या है…? शिवपुरी का रक्तदाता समाज भी आहत है
इस घटना ने उन सैकड़ों युवाओं और समाजसेवियों को भीतर तक झकझोर दिया है जो वर्षों से रक्तदान को मिशन बनाकर काम कर रहे हैं।
शिवपुरी में ऐसे अनेक रक्तदाता हैं जो 30-40 नहीं, बल्कि 50 से अधिक बार रक्तदान कर चुके हैं। कई लोग तो आधी रात को फोन आने पर दूसरे जिलों तक निकल जाते हैं।
लेकिन इस मामले में सबसे शर्मनाक बात यह रही कि उन सेवाभावी लोगों तक सूचना पहुँचाना भी जरूरी नहीं समझा गया। यह सिर्फ लापरवाही नहीं…यह उन तमाम सामाजिक प्रयासों का अपमान है जो मानवता बचाने के लिए किए जा रहे हैं।
ब्लड बैंक है… या संवेदनहीनता का सरकारी गोदाम…?
ब्लड बैंक कोई अनाज मंडी नहीं होता…वह जीवन बचाने का अंतिम केंद्र होता है। वहाँ मशीनों से ज्यादा इंसानियत की जरूरत होती है। वहाँ कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को सिर्फ कर्मचारी नहीं, जीवनरक्षक होना चाहिए।
लेकिन यदि किसी मासूम की सांसें टूटती रहें और जिम्मेदार लोग प्रक्रिया, कागज और औपचारिकताओं में उलझे रहें—
तो यह अक्षमता नहीं, अपराध है।
रेडक्रॉस सोसायटी की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
जिस संस्था का जन्म ही पीड़ित मानवता की सेवा के लिए हुआ, वह इस पूरे घटनाक्रम में आखिर कहाँ थी…?अब सिर्फ जांच नहीं…जवाबदेही चाहिए ! इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन जनता अब सिर्फ औपचारिक जांच नहीं चाहती। यह तय होना चाहिए कि— रक्त की व्यवस्था क्यों नहीं हुई…? आपातकालीन प्रोटोकॉल क्यों फेल हुआ…? रक्तदाता समूहों को सूचना क्यों नहीं दी गई…? जिम्मेदार अधिकारियों ने मौके पर क्या कार्रवाई की…? और आखिर किसकी लापरवाही ने एक मासूम जिंदगी छीन ली…?
दोषियों पर केवल नोटिस या विभागीय कार्रवाई नहीं, बल्कि ऐसी कठोर कार्यवाही होनी चाहिए जो भविष्य में किसी भी कर्मचारी को “ब्लड नहीं है” बोलकर जिम्मेदारी से भागने की हिम्मत न दे।
उस बच्ची की मौत सिर्फ खून की कमी से नहीं हुई…
बल्कि उस संवेदनहीन व्यवस्था ने उसकी सांसें छीनी हैं…
जो इंसान को फाइल और जिंदगी को आंकड़ा समझने लगी है।
और जब किसी शहर में मासूम बच्चे अस्पतालों में खून के इंतजार में मरने लगें…
तो समझ लीजिए कि वहाँ सिर्फ स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं, समाज की आत्मा भी बीमार हो चुकी है।
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