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TET की तलवार से क्यों कांप रहा शिक्षक वर्ग? जंतर-मंतर पर गूंजा सवाल—दशकों तक पढ़ाने वाला शिक्षक अब एक परीक्षा में अपनी काबिलियत साबित करेगा!

नई दिल्ली। देश की शिक्षा व्यवस्था में TET अब महज एक परीक्षा नहीं रह गई है। यह परीक्षा सरकारी स्कूलों के उन शिक्षकों के लिए नौकरी, सम्मान, अनुभव और भविष्य की चिंता का कारण बन गई है, जिन्होंने अपनी जिंदगी के कई दशक बच्चों को पढ़ाने में लगा दिए। शिक्षक अब दिल्ली के जंतर-मंतर पर खड़े होकर सवाल पूछ रहे हैं कि जिस शिक्षक की योग्यता सरकार ने कभी परखी थी, जिसे चयन प्रक्रिया से निकालकर नियुक्त किया, जिसने वर्षों तक कक्षा में बच्चों को पढ़ाया और जिसकी सेवा के बदले हर महीने सरकार ने वेतन दिया, उसी शिक्षक को अब दोबारा पात्रता की कसौटी पर क्यों खड़ा किया जा रहा है? TET यानी Teacher Eligibility Test का मूल उद्देश्य कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए न्यूनतम पात्रता और शिक्षण क्षमता का एक समान मानक तय करना है। शिक्षा का अधिकार कानून के तहत TET को शिक्षक पात्रता से जोड़ा गया और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे RTE के दायरे वाले स्कूलों में आवश्यक न्यूनतम योग्यता के रूप में माना है। सरकार का तर्क सीधा है—बच्चों के भविष्य के साथ समझौता नहीं हो सकता और उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षक के लिए न्यूनतम गुणवत्ता मानक होना ही चाहिए। सवाल भी उतना ही सीधा है—क्या यह मानक नौकरी में आने से पहले लागू होना चाहिए था या दशकों की सेवा के बाद भी शिक्षक को उसी कसौटी पर दोबारा खड़ा किया जाना चाहिए? यही सवाल आज शिक्षक आंदोलन की चिंगारी को हवा दे रहा है। सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2025 के फैसले के बाद पुराने नियुक्त शिक्षकों पर भी TET की अनिवार्यता का रास्ता साफ हुआ। अदालत ने ऐसे शिक्षकों के लिए अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्था तय की और बाद में मई 2026 में TET उत्तीर्ण करने की समय-सीमा को बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दिया। यानी शिक्षकों को समय जरूर मिला, लेकिन TET से मूल छूट नहीं मिली। यही वह बिंदु है जहां शिक्षक संगठनों का विरोध और तेज हो गया है। शिक्षक कह रहे हैं कि समस्या परीक्षा देने के लिए मिले समय की नहीं, बल्कि उस सिद्धांत की है जिसमें वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षक को फिर से यह साबित करना पड़ेगा कि वह बच्चों को पढ़ाने योग्य है। उम्र बढ़ने के साथ पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी से दूरी, लंबे समय से प्रशासनिक और शैक्षणिक जिम्मेदारियां निभाना तथा नौकरी पर परीक्षा का भविष्य जोड़ दिया जाना शिक्षकों की चिंता बढ़ा रहा है। कई शिक्षक इसे सिर्फ परीक्षा नहीं बल्कि नौकरी बचाने की परीक्षा मान रहे हैं। डर इसलिए भी है कि परीक्षा में असफलता का असर सेवा और भविष्य की नौकरी पर पड़ सकता है। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि शिक्षक पात्रता का न्यूनतम मानक किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा के हित में है। यही सरकार और शिक्षकों के तर्कों के बीच मूल टकराव है—सरकार गुणवत्ता की बात कर रही है और शिक्षक अनुभव की कीमत पूछ रहे हैं। शिक्षक संगठनों का तर्क है कि अगर कोई शिक्षक 20-25 साल से लगातार बच्चों को पढ़ा रहा है तो उसके अनुभव, सेवा रिकॉर्ड और शिक्षण क्षमता का मूल्यांकन भी किसी परीक्षा से कम महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए। उनका सवाल है कि क्या इतने वर्षों की कक्षा, हजारों बच्चों की शिक्षा और पूरी सेवा को एक परीक्षा के परिणाम से छोटा किया जा सकता है? इसी नाराजगी ने आंदोलन का रूप लिया है और दिल्ली का जंतर-मंतर इसका केंद्र बन रहा है। अलग-अलग राज्यों के शिक्षक संगठन अपनी मांगों को लेकर दिल्ली पहुंच रहे हैं। मध्यप्रदेश में भी आंदोलन को लेकर प्रशासनिक सक्रियता देखने को मिली। छिंदवाड़ा से दिल्ली जा रहे शिक्षकों को पातालकोट एक्सप्रेस से उतारे जाने और उनके मोबाइल लिए जाने की खबर सामने आई, हालांकि बाद में मोबाइल वापस किए जाने की बात कही गई। दूसरी तरफ दिल्ली प्रशासन और पुलिस भी प्रदर्शन को लेकर सतर्क है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए अनुमति और निर्धारित नियमों का पालन आवश्यक है तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस निगरानी और भीड़ नियंत्रण की व्यवस्था करती है।

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कि आंदोलन में मौके पर मौजूद शिक्षकों की वास्तविक संख्या को लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग दावे हैं और कोई पुष्ट आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, इसलिए हजारों या लाखों की संख्या के दावों को बिना सरकारी पुष्टि के सच मानना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा। लेकिन संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण वह सवाल है जो इस आंदोलन ने खड़ा किया है। TET का असर केवल शिक्षकों तक सीमित नहीं रहने वाला। यदि बड़ी संख्या में शिक्षक परीक्षा की तैयारी, आंदोलन या सेवा संबंधी असमंजस में उलझते हैं तो सरकारी स्कूलों की नियमित पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। पहले से शिक्षक कमी और शैक्षणिक संसाधनों की चुनौतियों से जूझ रहे स्कूलों में यदि अनुभवी शिक्षकों की उपलब्धता प्रभावित होती है तो उसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ सकता है। दूसरी ओर यदि TET के जरिए वास्तव में शिक्षकों की न्यूनतम शैक्षणिक और शिक्षण क्षमता सुनिश्चित होती है तो इसका दीर्घकालीन लाभ बच्चों को मिलने की उम्मीद भी है। इसलिए इस विवाद को केवल शिक्षक बनाम सरकार के चश्मे से देखना अधूरा होगा। असली सवाल बच्चे के भविष्य का है। सरकार को यह देखना होगा कि गुणवत्ता सुधार की नीति लागू करते समय स्कूल की कक्षा खाली न हो, अनुभवी शिक्षक हतोत्साहित न हों और बच्चों की पढ़ाई आंदोलन तथा प्रशासनिक फैसलों के बीच पिसकर न रह जाए। शिक्षक भी यह समझें कि शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठाना सरकार का अधिकार ही नहीं, जिम्मेदारी भी है; लेकिन सरकार को भी यह समझना होगा कि गुणवत्ता सुधार का मतलब केवल परीक्षा नहीं होता। प्रशिक्षण, निरंतर मूल्यांकन, विषयगत दक्षता, आधुनिक शिक्षण पद्धति और शिक्षक की वास्तविक कार्यक्षमता भी गुणवत्ता के महत्वपूर्ण पैमाने हैं। इसलिए TET विवाद अब एक ऐसी गांठ बन चुका है जिसे केवल आदेश से नहीं खोला जा सकता। एक तरफ अदालत का फैसला है, दूसरी तरफ सरकार की शिक्षा नीति है और तीसरी तरफ वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षक हैं, जिनके सामने अपने भविष्य की चिंता खड़ी है। जंतर-मंतर पर उठती आवाज इसी टकराव की आवाज है। शिक्षक पूछ रहे हैं—“जिसे हमने पढ़ाया, क्या वह हमारी डिग्री है? जिन बच्चों को हमने वर्षों तक कक्षा में तैयार किया, क्या वह हमारे अनुभव का प्रमाण नहीं? फिर अचानक एक परीक्षा हमारी पूरी सेवा से बड़ी कैसे हो गई?” यही सवाल इस आंदोलन को धार दे रहा है। अब सरकार के सामने चुनौती केवल TET लागू कराने की नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता भी सुनिश्चित हो और दशकों से सेवा दे रहे शिक्षकों के अनुभव तथा नौकरी की सुरक्षा को भी न्याय मिले। क्योंकि यदि TET शिक्षा सुधार की परीक्षा है तो सरकार की असली परीक्षा भी यही है कि वह कागज की परीक्षा और कक्षा के अनुभव के बीच ऐसा संतुलन कैसे बनाती है, जिसमें न शिक्षक हारें, न सरकार की नीति और सबसे महत्वपूर्ण—न बच्चों का भविष्य

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संजीव पुरोहित

मैं संजीव पुरोहित, शिवपुरी (मध्य प्रदेश) से हूँ और शिवपुरी मेल का चीफ एडिटर हूँ। मेरा उद्देश्य स्थानीय और जनहित से जुड़ी सच्ची, निष्पक्ष व ज़मीनी खबरें आप तक पहुँचाना है। ताज़ा अपडेट के लिए Telegram और WhatsApp पर हमारे साथ जुड़ें।

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