113 करोड़ की सीवर परियोजना फेल, अब नई डीपीआर की तैयारी; दो दशक बाद भी जवाब बाकी—जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?

शिवपुरी। जिस सीवर परियोजना को शिवपुरी की झीलों को गंदे पानी से बचाने और शहर को व्यवस्थित सीवरेज व्यवस्था देने के लिए खड़ा किया गया था, वही परियोजना अब अपनी उपयोगिता और क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। 19 सितंबर 2026 को केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शिवपुरी की सीवर परियोजना को विफल बताते हुए अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की जांच की बात कही। परियोजना को आगे मध्यप्रदेश अर्बन डेवलपमेंट कंपनी (MPUDC) के माध्यम से व्यवस्थित करने की बात भी सामने आई है। साथ ही पुरानी लाइन के करीब 7-8 किलोमीटर हिस्से को दशहरे तक चालू करने का लक्ष्य बताया गया।
लेकिन अब असली सवाल नई लाइन का नहीं, पुरानी व्यवस्था के उस हिसाब का है जो वर्षों से अधूरा पड़ा है।
इस कहानी की शुरुआत वर्ष 2006 से होती है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक Environmental Planning and Coordination Organisation (EPCO) ने वर्ष 2006 में National Lake Conservation Plan के तहत परियोजना स्वीकृत की थी। वर्ष 2009 में इसे लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) को सौंपा गया, 2011 में संशोधित डीपीआर तैयार हुई, 2013 में संशोधित स्वीकृति मिली और अगस्त 2013 में कार्यादेश जारी हुआ। सरकारी पक्ष के अनुसार सीवर लाइन और एसटीपी सहित काम 2019 में पूरा कर दिया गया था।

लेकिन यहीं से परियोजना की सबसे बड़ी विडंबना सामने आती है। हाईकोर्ट के समक्ष राज्य की ओर से बताया गया कि एसटीपी तक पर्याप्त सीवेज पहुंचने की व्यवस्था नहीं बन सकी, क्योंकि व्यक्तिगत घरों को मुख्य सीवर लाइन से जोड़ने का काम परियोजना में शामिल नहीं था और यह जिम्मेदारी नगर पालिका की बताई गई। 24 जून 2026 के आदेश में हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि घरों से सीवेज मुख्य लाइन तक पहुंचना ही सुनिश्चित नहीं था तो इतनी बड़ी परियोजना तैयार करने का औचित्य क्या था। अदालत ने करीब 111 करोड़ रुपये के निवेश को सार्वजनिक धन की बर्बादी की आशंका से जोड़ा और पूरी परियोजना का रिकॉर्ड तलब किया।

23 जून 2026 के आदेश में अदालत के सामने यह भी आया कि परियोजना शुरू करने से पहले नगर पालिका को विश्वास में लेकर यह तक सुनिश्चित नहीं किया गया था कि वह घरों को सीवर लाइन से जोड़ पाएगी या उसके पास इसके लिए पर्याप्त धन उपलब्ध होगा। अदालत ने इस स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए। इसी आदेश में यह भी दर्ज है कि सीवर लाइन की मरम्मत के लिए आठ करोड़ रुपये से अधिक की राशि स्वीकृत की जा चुकी है। यानी जिस व्यवस्था पर पहले ही बड़ा खर्च हो चुका था, उसे उपयोगी बनाने के लिए बाद में फिर पैसा लगाना पड़ा।
विधानसभा के रिकॉर्ड ने भी परियोजना की स्थिति पर सवाल छोड़े। 8 अगस्त 2025 के विधानसभा प्रश्न क्रमांक 3273 में सरकार से पूछा गया था कि शिवपुरी का सीवर प्रोजेक्ट पूरा हुआ या नहीं, किन क्षेत्रों में लाइन नहीं बिछी, शेष काम कब तक पूरा होगा और सड़क के बीच बने भूमिगत चैंबरों की गुणवत्ता को लेकर शिकायतों की स्थिति क्या है। यानी उस समय भी परियोजना को पूर्ण और पूरी तरह उपयोगी मानने की स्थिति साफ नहीं थी।

सवाल सिर्फ लाइन का नहीं, उस व्यवस्था का है जो लाइन बिछने के बाद भी चल नहीं सकी।
सीवर परियोजना का मकसद झीलों तक पहुंच रहे गंदे पानी को रोकना था, लेकिन न्यायिक रिकॉर्ड में इसके उलट तस्वीर दर्ज हुई। 25 जुलाई 2025 के राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेश में जाधव सागर और सांख्य सागर की ओर अनुपचारित पानी के प्रवाह को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए गए। अधिकरण ने संबंधित अधिकारियों को झीलों में बिना उपचारित पानी और सीवेज के प्रवाह को रोकने तथा सीवेज को एसटीपी तक पहुंचाने की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा।
NGT से जुड़े रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि एसटीपी बनने के बावजूद सीवर लाइन और घरेलू कनेक्शन पूरे नहीं हुए थे और अनुपचारित पानी जलस्रोतों में जाने की स्थिति बनी हुई थी। यही वह बिंदु है जो पूरी परियोजना की उपयोगिता पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है।
हाईकोर्ट की सुनवाई में भी स्थिति नहीं बदली। 24 जून 2026 के आदेश में अदालत ने दर्ज किया कि सांख्य सागर में सीवेज का प्रवाह रुक नहीं पाया था। नगर पालिका से पूछा गया कि वह नाले को एसटीपी की ओर मोड़ने और जाधव सागर तथा सांख्य सागर में सीवेज जाने से रोकने के लिए अब तक क्या करती रही। अदालत ने नगर पालिका और PHE को सीवेज का झीलों में विलय पूरी तरह रोकने के लिए समयबद्ध योजना देने के निर्देश दिए।
13 जुलाई 2026 की सुनवाई में भी जवाबदेही का सवाल वहीं खड़ा रहा। हाईकोर्ट ने अतिरिक्त मुख्य सचिव, नगरीय प्रशासन को उपलब्ध रिकॉर्ड की समीक्षा कर उन अधिकारियों की जवाबदेही तय करने को कहा, जिनकी वजह से भारी धनराशि के व्यर्थ जाने की स्थिति बनी। अदालत के आदेश में यह भी दर्ज है कि राज्य की ओर से पूर्व में यह कहा गया था कि जो दोषी पाए जाएंगे, उनसे राशि की वसूली की जाएगी।
अब सवाल यह है कि वर्ष 2006 से शुरू हुई इस पूरी प्रक्रिया में गलती आखिर किस मोड़ पर हुई?
डीपीआर किस आधार पर तैयार हुई? 2011 की संशोधित डीपीआर में क्या बदला? 2013 में संशोधित स्वीकृति किन परीक्षणों के बाद दी गई? कार्यादेश से पहले यह क्यों नहीं सुनिश्चित किया गया कि सीवर लाइन से घरों का कनेक्शन भी समय पर होगा? निर्माण के दौरान तकनीकी गुणवत्ता, ढाल, चैंबर और लाइन की जांच किस स्तर पर हुई? भुगतान से पहले किस अधिकारी ने काम को प्रमाणित किया? 2019 में काम पूरा बताए जाने के बाद एसटीपी चालू क्यों नहीं हो सका? नगर पालिका ने तैयार व्यवस्था का अधिग्रहण क्यों नहीं किया? और जब लाइन उपयोगी नहीं थी तो उसके संरक्षण तथा रखरखाव की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
इन सवालों के जवाब किसी एक विभाग के बयान से नहीं मिलेंगे। इसके लिए NIT से लेकर कार्यादेश, एमबी बुक, तकनीकी स्वीकृति, भुगतान बिल, पूर्णता प्रमाणपत्र, परीक्षण रिपोर्ट, हैंडओवर-टेकओवर पत्राचार और संशोधित डीपीआर तक पूरी फाइल सामने रखनी होगी।
प्रदूषण नियंत्रण की भूमिका पर भी इसी आधार पर सवाल बनता है। जब झीलों में अनुपचारित सीवेज पहुंचने की शिकायतें और न्यायिक कार्यवाही रिकॉर्ड में थीं, तब निरीक्षण कब-कब हुए? पानी के नमूने कब लिए गए? रिपोर्ट में क्या मिला? किसके खिलाफ कार्रवाई हुई? पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति कितनी तय हुई और कितनी वसूल हुई? 2023 से 2025 के बीच दिए गए निर्देशों के बाद जमीन पर क्या बदला? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों के साथ सामने आना चाहिए।
यह किसी एक अधिकारी या किसी एक सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कहानी नहीं है। यह उस पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की पड़ताल है, जिसमें योजना बनी, संशोधित हुई, पैसा खर्च हुआ, काम पूरा बताया गया, व्यवस्था चालू नहीं हुई, झीलों में गंदा पानी जाता रहा और अब उसी समस्या के समाधान के लिए नई व्यवस्था की जरूरत बताई जा रही है।
नई डीपीआर बनाना जरूरी हो सकता है। पुरानी लाइन को दुरुस्त करना भी जरूरी हो सकता है। घरों को कनेक्शन देना भी जरूरी है। लेकिन नई फाइल खोलने से पहले पुरानी फाइल का हिसाब खुलना ज्यादा जरूरी है।
शिवपुरी को सिर्फ यह नहीं बताया जाना चाहिए कि अब सीवर व्यवस्था कौन ठीक करेगा। शहर को यह भी बताया जाना चाहिए कि अब तक क्या बना, क्या नहीं बना, किसने डिजाइन किया, किसने मंजूर किया, किसने काम कराया, किसने नापा, किसने प्रमाणित किया, किस आधार पर भुगतान हुआ, किसने निगरानी की और इतने वर्षों बाद भी झीलों तक गंदा पानी पहुंचने की नौबत क्यों बनी रही।
नई लाइन की खुदाई शुरू होने से पहले पुरानी फाइलों की धूल हटनी चाहिए—क्योंकि मामला सिर्फ सीवर का नहीं, सार्वजनिक धन के इस्तेमाल और जवाबदेही का है।
Live Cricket Info








