एमपी में मानसून ने बदला अपना मिजाज, कहीं खेत लबालब तो कहीं किसान बारिश को तरसे; आखिरी दौर में फिर भारी बारिश के संकेत

भोपाल। मध्यप्रदेश में मानसून अब विदाई की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इस बार बारिश ने पूरे प्रदेश में एक जैसा व्यवहार नहीं किया। कहीं लगातार बारिश से खेतों में पानी भरने और फसल प्रभावित होने की चिंता रही तो कहीं बारिश की कमी ने सोयाबीन समेत खरीफ फसलों और आने वाली रबी की बोवनी पर सवाल खड़े कर दिए। ऐसे में प्रदेश के औसत बारिश के आंकड़े से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका जिला-दर-जिला असमान वितरण है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के 21 सितंबर के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में मानसून की संचयी स्थिति अभी भी सामान्य से कम है, हालांकि पिछले दिनों हुई बारिश से कमी कुछ कम हुई है। 18 सितंबर तक प्रदेश की बारिश करीब 7 प्रतिशत कम बताई गई थी। 21 सितंबर की स्थिति में भी कई जिले सामान्य से पीछे हैं, जबकि दूसरी ओर 23 जिले ऐसे हैं जहां मौसमी बारिश सामान्य से अधिक दर्ज हुई है।
यानी प्रदेश में बारिश की कमी से ज्यादा बड़ी कहानी उसका असमान बंटवारा है। श्योपुर और शिवपुरी समेत कुछ जिलों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज हुई है, जबकि अलीराजपुर, धार, रतलाम, नीमच, मंदसौर, इंदौर, उज्जैन सहित कई जिलों में सामान्य से कम बारिश रही।
किसान के लिए आंकड़े नहीं, बारिश का समय मायने रखता है
खेती में कुल बारिश का आंकड़ा पूरी कहानी नहीं बताता। सोयाबीन और दूसरी खरीफ फसलों के लिए बारिश का समय और अंतराल महत्वपूर्ण है। कई इलाकों में बारिश के लंबे अंतराल ने खेतों की नमी प्रभावित की, वहीं कुछ स्थानों पर कम समय में तेज बारिश से जलभराव और फसल नुकसान की स्थिति बनी।
धार इसका स्पष्ट उदाहरण है। 19 सितंबर तक वहां सामान्य 833.1 मिमी के मुकाबले औसत बारिश केवल 488.9 मिमी दर्ज हुई। जिला प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार निसरपुर में महज 189.1 मिमी बारिश दर्ज हुई। ऐसे इलाकों में किसानों के सामने सोयाबीन की फसल के साथ रबी की बोवनी और जलस्रोतों की स्थिति को लेकर भी चिंता बनी हुई है।
कम बारिश वाले जिलों में खरीफ के बाद रबी की चिंता
मानसून की कमी का असर केवल मौजूदा फसल तक सीमित नहीं रहता। जिन क्षेत्रों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई, वहां खेत की नमी, कुएं-तालाब और अन्य स्थानीय जलस्रोतों की स्थिति रबी की गेहूं-चना जैसी फसलों की बोवनी और सिंचाई को प्रभावित कर सकती है।
यही कारण है कि बारिश का सरकारी औसत सामान्य के करीब पहुंच भी जाए तो हर किसान की स्थिति सामान्य नहीं मानी जा सकती। जिस खेत को समय पर पानी नहीं मिला, उसके लिए प्रदेश का औसत आंकड़ा कोई राहत नहीं है।
अब आखिरी दौर में मौसम फिर करवट ले सकता है
मानसून की विदाई के बीच भी मौसम विभाग ने प्रदेश में बारिश की संभावना खत्म नहीं मानी है। IMD भोपाल के 21 सितंबर के पूर्वानुमान में पश्चिमी मध्यप्रदेश में 24 सितंबर को भारी तथा 25-26 सितंबर को बहुत भारी बारिश की चेतावनी दी गई है। पूर्वी मध्यप्रदेश में 23-24 सितंबर को भारी और 25-26 सितंबर को बहुत भारी बारिश की संभावना बताई गई है।
मौसम विभाग के मुताबिक बंगाल की खाड़ी में बने सिस्टम के प्रभाव से मानसून का यह आखिरी सक्रिय दौर बन सकता है। इसका असर प्रदेश के कई हिस्सों में देखने को मिल सकता है।
बारिश की कमी और ज्यादा बारिश—दोनों एक साथ
इस मानसून की सबसे बड़ी विडंबना यही रही कि मध्यप्रदेश में एक ही समय पर दो अलग तस्वीरें दिखाई दीं। एक तरफ सामान्य से कम बारिश वाले जिले किसान को आसमान की ओर देखने को मजबूर करते रहे, तो दूसरी तरफ अधिक बारिश वाले क्षेत्रों में खेतों में पानी भरने, फसल बचाने और नुकसान से निपटने की चुनौती सामने आई।
इसलिए 2026 के मानसून को सिर्फ “कम बारिश” या “अच्छी बारिश” कहकर खत्म करना आंकड़ों के साथ न्याय नहीं होगा। असल तस्वीर यह है कि बारिश हुई, लेकिन उसका समय, मात्रा और वितरण किसान के लिए बराबर नहीं रहा।
अब सितंबर के अंतिम दिनों की बारिश पर नजर है। यह बारिश जहां कम वर्षा वाले इलाकों में मिट्टी की नमी और जलस्रोतों को कुछ राहत दे सकती है, वहीं पहले से अधिक बारिश झेल चुके इलाकों में तेज बारिश हुई तो जलभराव और फसल नुकसान की चिंता भी बढ़ सकती है।
मानसून की अंतिम पारी अब सिर्फ मौसम का सवाल नहीं है। यह खरीफ की बची फसल, खेत की नमी और आने वाली रबी की तैयारी—तीनों का हिसाब तय करेगी।
स्रोत: भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), राज्यवार/जिलावार वर्षा आंकड़े, 21 सितंबर 2026; IMD भोपाल, 21 सितंबर 2026 का उपखंडवार मौसम चेतावनी बुलेटिन; धार जिला प्रशासन के 19 सितंबर 2026 तक के वर्षा आंकड़े।
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