ग्वालियर-चंबल में सियासी भूचाल: विजयपुर में गिरी कुर्सी, दतिया में गई सदस्यता—दो कांग्रेस विधायकों पर गिरी गाज

हलफनामे में जानकारी छुपाना पड़ा भारी, धोखाधड़ी केस में सजा ने छीनी विधायकी; अब दतिया में उपचुनाव की सरगर्मी तेज
संजीव पुरोहित —-
ग्वालियर/ मध्यप्रदेश के ग्वालियर-चंबल अंचल में राजनीति ने ऐसा मोड़ लिया है, जिसने सत्ता के समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। कुछ ही दिनों के भीतर दो बड़े घटनाक्रम सामने आए—विजयपुर में विधायक की कुर्सी चली गई, तो दतिया में विधायकी ही खत्म हो गई।
विजयपुर: जीत के बाद भी नहीं बची कुर्सी
विजयपुर में कांग्रेस से विधायक बने मुकेश मल्होत्रा की विधायकी एक कानूनी चूक के चलते चली गई। आरोप है कि उन्होंने चुनाव के दौरान अपने हलफनामे में आपराधिक मामलों की पूरी जानकारी नहीं दी। विरोधियों ने जब दस्तावेज खंगाले, तो मामला उजागर हुआ और उनकी कुर्सी चली गई।
इस सीट की कहानी और भी दिलचस्प है। पहले यहां कांग्रेस के रामनिवास रावत विधायक थे, लेकिन पार्टी बदलकर भाजपा में जाने के बाद जनता ने उपचुनाव में उन्हें नकार दिया था। इसके बाद मुकेश मल्होत्रा भारी मतों से जीतकर विधायक बने थे।
लेकिन अब हालात ऐसे बने कि जनता द्वारा नकारे गए रावत को फिर से मौका मिल गया—और राजनीति ने एक बार फिर करवट बदल ली।
दतिया: सजा ने खत्म कर दी सदस्यता
दूसरी तरफ दतिया में कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता अदालत के फैसले के बाद समाप्त कर दी गई। भारती को एक धोखाधड़ी के मामले में 3 साल की सजा सुनाई गई है।
कानून साफ कहता है कि यदि किसी जनप्रतिनिधि को 2 साल से अधिक की सजा होती है, तो उसकी सदस्यता स्वतः खत्म हो जाती है। यही कारण रहा कि भारती को जेल भले ही तत्काल न जाना पड़ा हो, लेकिन उनकी विधायकी चली गई।
गौरतलब है कि भारती ने पिछली बार भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को हराकर यह सीट जीती थी। अब एक बार फिर मिश्रा सक्रिय हो गए हैं और उपचुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं।
दतिया में फिर सजेगा चुनावी रण
दतिया में अब उपचुनाव तय माना जा रहा है। भाजपा जहां अपने मजबूत चेहरे के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है, वहीं कांग्रेस के सामने नया उम्मीदवार तलाशने की चुनौती खड़ी हो गई है।
“समय चक्र” का खेल—जनता, कानून और राजनीति
विजयपुर और दतिया की ये घटनाएं बताती हैं कि राजनीति में सिर्फ जीत ही सबकुछ नहीं होती। कानून, रणनीति और समय—तीनों मिलकर कब किसकी कुर्सी खींच लें, कहा नहीं जा सकता।
अब नजरें दतिया उपचुनाव पर टिक गई हैं, जहां एक बार फिर जनता का फैसला तय करेगा कि सत्ता की बागडोर किसके हाथ में जाएगी।
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